सचिन के 50 साल: वो मास्टर ब्लास्टर जो एक जेनरेशन के लिए सिर्फ खिलाड़ी नहीं, उनकी जिंदगी का एक इमोशन है
सचिन तेंदुलकर 24 अप्रैल को 50 साल के हो जाएंगे। एक पूरी पीढ़ी के लिए वो उनकी जिंदगी का बड़ा चैप्टर रहे हैं। 80 के दशक से 2010 के दशक तक सचिन ने देश के जेहन पर बड़ा ही असर छोड़ा।

Sachin Tendulkar turn 50: सचिन तेंदुलकर 24 अप्रैल को 50 साल के होने जा रहे हैं। जब जब 14 साल के थे तब लोगों ने उनकी रनों के प्रति भूख को पहचानना शुरू कर दिया था। उनके बल्लेबाजी का जलवा इस कदर आगे बढ़ता गया कि वह महज 16 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल हो गए थे।
1989 का वह दौर कोई नहीं भूल सकता जब सचिन ने पेशावर में अब्दुल कादिर की गेंदों पर रन बनाए और सियालकोट में वकार यूनिस की गेंद पर नाक से खून निकलने के बावजूद डटकर बल्लेबाजी की। 1990 का दशक आते-आते सचिन युवा भारतीय दिलों की धड़कन बन गए थे। एक पूरी पीढ़ी खुद को सचिन से जोड़ चुकी थी।
सचिन ने भी अपनी बल्लेबाजी से जैसे पूरे देश को जोड़ दिया। अलग-अलग धर्म, जगह, भाषा, पंथ, राजनीतिक विश्वास के लोगों के बीच अगर कोई एक चीज बांधती थी तो वह थी सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाजी। 1990 के दशक के अगले अगले दो दशकों में भी भारत में कई बदलाव हुए लेकिन सचिन एक कांस्टेंट की तरह मौजूद रहे।
आज भी 1998 में ऑस्ट्रेलिया को हिला कर रख देने वाला शारजाह में डेजर्ट स्टॉर्म लोगों के जेहन में जिंदा है। फिर चाहे भारत में चेन्नई टेस्ट के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ अकेले योद्धा की तरह लड़ने का उनका जज्बा हो या फिर 2004 में सिडनी में उनकी 241 रनों की पारी हो, हर बार सचिन ने अपनी बल्लेबाजी की कला से मुग्ध किया।
सचिन ने ग्वालियर में वनडे फॉर्मेट में बल्लेबाजी को अगले लेवल पर ले जाते हुए डबल सेंचुरी लगाई फिर अपने रिटायरमेंट से पहले 2011 में वर्ल्ड कप जीता और 40 साल की उम्र में अपने होम ग्राउंड पर इस खेल को अलविदा कह दिया। उस पल मानों धड़कनें थम सी गई थी। कल्पना करना मुश्किल था कि हमारी जिंदगी में सचिन की कमी कैसे पूरी हो पाएगी।
सचिन- एक इमोशन: सचिन एक खिलाड़ी नहीं बल्कि कई लोगों की जिंदगी का एक बहुत बड़ा चैप्टर हैं। ये बात उन 80 के दशक के बच्चों को पता है जिन्होंने तब सचिन को खेलते देखा। 90 के दशक में वे यंग एडल्ट के तौर पर सचिन की बैटिंग के दुनिया में खुद को बड़ा होते देख रहे थे।
2000 के दशक में इन युवाओं का नया करियर शुरू हो रहा था और साथ-साथ सचिन भी चल रहे थे। 2010 के दशक में 80's के वे बच्चे मैनेजर बन गए और सचिन रिटायर हो गए। उस उम्र के लोगों से पूछा जाए कि उनके जीवन में सचिन के रिटायरमेंट के बाद क्या कमी आई है तो इसको शायद शब्दों में वह बता नहीं पाएंगे।
एक पूरी पीढ़ी सिर्फ सचिन नाम के जज्बात के नाम पर एक दूसरे से आज भी जुड़ी हुई है फिर चाहे उनका जीवन बाकी लेवल पर एक दूसरे से कितना ही अलग क्यों ना हो।
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