आयकर छूट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उबल रहा है सिक्किम

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पश्चिम बंगाल, नेपाल, भूटान और तिब्बत की सीमा से सटा छोटा-सा लेकिन सामरिक रूप से बेहद अहम पर्वतीय राज्य सिक्किम अमूमन आंदोलन या बंद के लिए सुर्खियां नहीं बटोरता. लेकिन अब बीते सप्ताह से ही यह शांत प्रदेश उबल रहा है. इसके पीछे राज्य के निवासियों को आयकर में मिली छूट और इससे संबंधित एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है.

सिक्किम में भारतीय मूल का विवाद

सत्तारूढ़ सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) से लेकर विपक्षी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) और तमाम सामाजिक संगठन शीर्ष अदालत के फैसले के विरोध में सड़क पर उतर आए हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिकाएं दायर की हैं. एसडीएफ ने शनिवार और रविवार को इस मुद्दे पर 48 घंटे को बंद रखा. अब एक अन्य संगठन ने बुधवार को राज्य में बंद बुलाया है.

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सिक्किम में जहां आयकर लागू नहीं है, वहीं पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में देश के दूसरे हिस्से के लोगों के लिए संपत्ति या जमीन खरीदने पर पाबंदी है. सिक्किम समेत ऐसे राज्यों को संविधान की धारा 371 ए के तहत विशेष दर्जा मिला है.

क्या है मामला

दरअसल, सिक्किम के मूल निवासियों को आयकर अधिनियम की धारा, 1961 की धारा 10 (26एएए) के तहत आयकर से छूट हासिल है. यानी राज्य के लोगों को अपनी आय पर कोई कर नहीं देना होता. अब शीर्ष अदालत ने 26 अप्रैल 1975 यानी (विलय के एक दिन पहले तक) सिक्किम में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों के लिए भी आयकर में छूट का सुविधा मुहैया करा दी है. इस तरह राज्य की करीब 95 फीसदी आबादी आयकर के दायरे से बाहर है. पहले की छूट सिक्किम सब्जेक्ट सर्टिफिकेट रखने वालों और उनके वंशजों के लिए लागू थी और उन्हें सिक्किम नागरिकता संशोधन आदेश, 1989 के तहत भारतीय नागरिक बनाया गया था.

सिक्किम में तेज हो रहा है आंदोलन

इससे पहले सिक्किम में स्थायी तौर पर बसे भारतीय मूल के लोगों को कर देना होता था. अदालत ने अपने इसी फैसले में सिक्किम में रहने वाले नेपाली लोगों को आप्रवासी करार दिया था. राज्य की करीब 80 फीसदी आबादी नेपाली मूल की है. इसी टिप्पणी का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है.

अदालत के फैसले के बाद इस मुद्दे पर विरोध तेज होने लगा. स्वास्थ्य मंत्री मणि कुमार शर्मा ने अदालत के फैसले पर सरकार की चुप्पी के विरोध में बीती 2 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था. उसके बाद पूरे राज्य में विरोध तेज हो गया. एसकेएम के एक प्रतिनिधिमंडल के अलावा मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग ने दिल्ली जाकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और किरण रिजिजू से मुलाकात की और राज्य के लोगों की भावनाओं से अवगत कराया था.

राजधानी गंगटोक स्थित वरिष्ठ पत्रकार पेमा वांगचुक कहते हैं कि सिक्किम और यहां कई पीढ़ियों से रहने वाले लोगों के लिए एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है. वह कहते हैं, "नेपाली एक जाति है, राष्ट्रीयता नहीं."

सिक्किम का इतिहास

इस छोटे-से पर्वतीय राज्य की स्थापना वर्ष 1642 में हुई थी और वर्ष 1975 में भारत में विलय होने तक करीब 333 साल तक यह एक संप्रभु देश रहा. स्थापना के समय इसमें मौजूदा बिहार, पश्चिम बंगाल. नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के कई हिस्से भी शामिल थे. लेकिन बाद में ब्रिटिश शासकों के साथ कई दफे की लड़ाई के बाद इसका ज्यादातर हिस्सा ब्रिटिश शासकों के कब्जे में चला गया. वर्ष 1888 में ब्रिटिश सरकार ने सिक्किम पर कब्जा कर लिया था. लेकिन युद्ध के बाद 1890 में ग्रेट ब्रिटेन और चीन ने सिक्किम और तिब्बत सीमा विवाद सुलझाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

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सिक्किम के शासक चोग्याल ने वर्ष 1948 में सिक्किम इनकम टैक्स मैनुअल जारी किया था. वर्ष 1950 में भारत-सिक्किम शांति समझौते के मुताबिक सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य बन गया. राज्य में विदेशियों की घुसपैठ रोकने के लिए चोग्याल ने सिक्किम सब्जेक्ट रजिस्टर, 1961 लागू किया. इसमें राज्य के मूल निवासियों के अलावा उन लोगों के नाम भी शामिल थे जो किसी दूसरे देश की नागरिकता छोड़ कर सिक्किम की प्रजा बनने के इच्छुक थे.

जिन पांच सौ परिवारों ने आयकर से छूट की मांग में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी उन्होंने कई पीढ़ियों से सिक्किम में रहने के बावजूद भारतीय नागरिकता नहीं छोड़ी थी और मौजूदा कानून के मुताबिक सिक्किम की प्रजा नहीं थे. लंबे समय तक चली बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने वर्ष 2008 में सिक्किम सब्जेक्ट प्रमाणपत्र रखने वाले लोगों और उनके उत्तराधिकारियों को आयकर भुगतान से छूट दे दी थी. उसके बाद ही पुराने बाशिंदों ने अदालत की शरण ली थी.

शीर्ष अदालत ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद बीती 13 जनवरी को अपने फैसले में राज्य के सभी पुराने निवासियों को आयकर छूट का विस्तार करते हुए सिक्किमी नेपाली समुदाय को 'अप्रवासी' बताया था. इसके बाद मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग ने रविवार को दिल्ली में अमित शाह समेत कई नेताओं से मुलाकात कर राज्य की परिस्थिति से अवगत कराया. उसके बाद ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की. लेकिन बावजूद इसके राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इस पर लंबे समय तक सरकार की चुप्पी के खिलाफ विरोध के स्वर लगातार तेज हो रहे हैं.

Source: DW

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