Ground report: सतना लोकसभा में छाया रोजगार का मुद्दा, काम न मिलने से मजदूर पलायन को मजबूर
Satna News: मध्य प्रदेश के सतना लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा, कांग्रेस और बीएसपी के उम्मीदवार मैदान में आ गए हैं। भाजपा से गणेश सिंह पांचवीं बार सांसद बनने के लिए चुनावी मैदान में हुंकार भर रहे हैं तो दूसरी ओर दो बार के विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है। [वीडियो नीचे हैं]
इसके अलावा बीएसपी प्रत्याशी नारायण त्रिपाठी के उतरने से सतना का मुकाबला त्रिकोणी हो गया है। 26 अप्रैल को सतना लोकसभा सीट में मतदान होना है। लोकसभा चुनाव माहौल को जानने के लिए वन इंडिया हिंदी के रिपोर्टर राकेश पटेल ने जिले के अमरपाटन में लोगों से बातचीत की। कुछ लोगों का कहना था कि जिले में रोजगार के उपयुक्त व्यवस्था नहीं की गई है। वहीं, कुछ लोगों का कहना था कि विकास सार्थक हुआ है और उसे देखकर जनता मतदान करेगी।

पलायन करने को मजबूर
अमरपाटन क्षेत्र में सैकड़ों ग्रामीण आदिवासी के सामने रोजगार का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया हैं। जिसके लिए सैकड़ों युवा महिलाएं एवं नाबालिग बच्चे काम और रोजगार की तलाश में शहर की तरफ पलायन कर रहे हैं। मजदूरों ने बताया कि आज मशीनी दौर में अब मजदूरों को काम मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है। सरकार योजनाओं के तहत गांवों में मजदूरों को काम देने का दावा तो कर रही है। मगर, हकीकत उससे बिल्कुल विपरीत है, जिसके चलते मजदूरों को काम नहीं मिलने के कारण मजदूर शहर की और पलायन करने को मजबूर है।
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मनरेगा योजना का नहीं मिल रहा लाभ
दरअसल, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों को उनके गांव में ही रोजगार मिल सके, इस उद्देश्य से मनरेगा कानून बनाया था, जिसके तहत साल भर में कम से कम 100 दिन गांव के मजदूरों को रोजगार मिल सके, लेकिन ग्रामीण अंचलों से प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर अपने घरों में ताला लगाकर रोजी रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
सतना चौक में काम की तलाश
इस समय सुबह से ही पलायन करने वालों मजदूरों को अमरपाटन के सतना चौक सहित कई जगहों में देखा जा सकता है। जो अलग-अलग क्षेत्रों में से काम की तलाश में शहर आ रहे हैं। जहां काम की तलाश में चौराहे पर खड़े हो जाते है। यदि काम नहीं मिला तो ऐसे ही घर जाना पड़ता है। जैसे-तैसे शहर में अगर काम मिल भी जाए तो परिवार का भरण पोषण करना मुश्किल हो रहा है।
महंगाई के दौर में नहीं हो रहा गुजरा
क्योंकि महंगाई के समय में आने जाने में ही ऑटो और बसों में सौ डेढ़ सौ रुपए खर्च हो जाते है। वहीं, सरकार द्वारा भले ही ग्रामीणों को उनके गांव में ही रोजगार देने के लिए योजना बनाई, ताकि गांव के लोगों को उन्हें मनरेगा योजना के तहत रोजगार उपलब्ध कराया जा सके, मगर लोगों को रोजी रोटी के अभाव में शहरों की ओर रुख करना पड़ता है।
मशीनरी उपयोग से काम मिलना मुश्किल
लेकिन हालात इतने खराब है कि मजदूरों को क्षेत्र में काम नहीं मिल रहा है। उनमें स्थानीय मजदूरों की जगह मशीनों का उपयोग हो रहा है। इसके कारण गरीब मजदूर महिलाएं अपने बच्चों को साथ लेकर शहर आ रही है, जिस कारण मजदूरों के पलायन के कारण उनके बच्चे स्कूल शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।
अमरपाटन में कोई उद्योग नहीं
राम सजीवन आदिवासी ने जानकारी देते हुए बताया सतना के अमरपाटन में कोई बड़ा उद्योग नहीं होने से मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है। शिकायत करने के बाद भी गरीबों की कोई सुनवाई नहीं होती है। सरकार की योजनाओं का किसी प्रकार से लाभ नहीं मिलता जो भी लाभ मिलता है बड़े लोग उसे बंद कर देते हैं। प्रेमलाल साकेत ने बताया गरीबों को प्रधानमंत्री आवास का लाभ नहीं मिलता बड़े लोगों को उसका लाभ मिलता है। शिकायत करने नगर पालिका जाते हैं तो वहां से भगा देते हैं।
भूपेंद्र ने बताया कि अमरपाटन में कोई सुनवाई नहीं है चाहे विधायक के पास जाएं चाहे संसद के पास जाएं चाहे राज्य मंत्री के पास जाएं झुगी,झोपड़ी बनाकर गरीब रह रहा है। उसे भी अवैध अतिक्रमण बात कर गिरने का काम किया गया है। लेकिन बड़े आदमी के पास 25 एकड़ जमीन 75 एकड़ बन जाती है कब्रिस्तान भी हड़प लेते हैं। प्रशासन उन पर कोई कार्यवाही नहीं करता। वहीं स्थानीय जिले रीवा में मजदूरी ज्यादा मिलती है। लेकिन सतना जिले में कोई उद्योग नहीं होने की वजह से मजदूरों को रोजगार नहीं मिलता।












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