Exclusive: तिरंगे के सम्मान में सीने पर खाई थी गोलियां,1942 की क्रांति में शहीद होने वाले की कहानी
Independence Day 2024: 12 अगस्त 1942 को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र लाल पद्मधर सिंह अंग्रेजों की गोली का सामना करते हुए शहीद हो गए थे। विंध्य के इस सपूत ने अपने देश की आन-बान और शान के लिए छोटी उम्र में अपने जीवन का बलिदान कर दिया था। आज आजादी के गुमनाम नायक और अनसुनी कहानियों में सतना के क्रांतिकारी लाल पद्मधर सिंह के बलिदान की कहानी जाननें वन इंडिया की टीम उनके घर कृपालपुर पहुंची है।
दरअसल, देश की आजादी के लिए 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी। गांधी के आह्वान पर 12 अगस्त 1942 को इलाहाबाद में छात्रों और युवाओं के साथ पद्मधर सिंह भी अंग्रेजों के खिलाफ वह प्रदर्शन कर रहे थे। वह तिरंगा लेकर सबसे आगे चल रहे थे। तभी अंग्रेजों की गोली उनके सीने में लगी और वह शहीद हो गए थे। आज भी उनके नाम से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के चुनाव में शपथ ली जाती है।

भारतीय सेना से ब्रिगेडियर पद से रिटायर हुए पद्मधर सिंह के भतीजे देवेन्द्र सिंह वन इंडिया हिंदी से खास बातचीत करते हुए बताया लाल पद्मधर का जन्म 14 अगस्त 1914 को सतना के समीप कृपालपुर गांव में हुआ। उस समय यह क्षेत्र रीवा जिले में आता था। सबसे बड़े भाई का नाम लाल गदाधर सिंह, दूसरे नंबर के लाल चक्रधर सिंह, तीसरे नंबर के शंखधर सिंह और शहीद लाल पद्मधर सिंह सबसे छोटे थे। उनकी कक्षा 8वीं तक की पढ़ाई माधवगढ़ के सरकारी स्कूल से हुई।
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जानिए प्रिंसिपल को क्यों मारी थी गोली
देवेन्द्र सिंह ने बताया लाल पद्मधर सिंह जुल्म बर्दाश्त करने वाले लोगों में से नहीं थे। इसकी एक बानगी रीवा के सरकारी स्कूल में पता चलती है, जब वे हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए वहां पहुंचे थे। एक बार स्कूल की फिजिक्स के लैब से प्रिज्म चोरी हो गया था। बिना जाने इसका आरोप लाल पद्मधर पर लगा दिया। इसके बाद प्राचार्य उनके कमरे में पहुंचे और तलाशी लेने लगे, लेकिन उन्हें प्रिज्म नहीं मिला। इस मामले से लाल इतने व्यथित हुए कि उन्होंने कमरे में रखी 12 बोर की बंदूक उठाई और प्रिंसिपल को गोली मारी दी। गनीमत रही कि गोली प्रिंसिपल के पैर में लगी और वो घायल हो गए।

जेल में रहकर की पढ़ाई
इसके बाद पुलिस प्रिंसिपल को गोली मारने के आरोप में 7 वर्ष की सजा सुना दी। लाल के अच्छे आचरण की वजह से उन्हें 3 साल में ही रिहा कर दिया गया। उन्होंने जेल में रहकर ही 10वीं की परीक्षा पास की। इसके बाद दरबार इंटर कॉलेज रीवा में एडमिशन लिया। यहां से हायर सेकंडरी की पढ़ाई पूरी कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गए और यही उनकी शहादत हुई।

सतना में ही भुला दिये गए पद्मधर
स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद होने वालों में सतना कृपालपुर के लाल शहीद पद्मधर सिंह को जो सम्मान इलाहाबाद में मिलता है वह आज तक उन्हें सतना में नहीं मिल पाया है। जिले के अग्रणी महाविद्यालय का नाम कहने को तो पद्मधर सिंह के नाम पर है लेकिन न तो यह नाम महाविद्यालय के दरवाजे पर नजर आता है और न ही उनके कागजों में। यहां माधवगढ़ के पास एक पार्क है जहां शहीद पद्मधर सिंह के नाम पर खानापूर्ति भरा एक आयोजन कर दिया जाता है। इनका जन्म 14 अक्टूबर सन् 1914 को सतना के कृपालपुर गांव में हुआ था, जो वर्तमान सतना नगर निगम के अन्तर्गत आता है।












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