खेतों में 'पीला सोना' बचाने सरकार सिखा रही 'रिज एंड फैरो मेथड', किसान बनेंगे मालामाल
'रिज एंड फैरो मेथड' (Ridge and Farrow Method) को अब MP में लागू किया जा रहा है। यह तकनीक खेती-किसानी में उपयोग की जाती है। मप्र सरकार के कृषि विभाग के माध्यम से किसानों को इस पद्धति से सोयाबीन की खेती करने का प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है वहीं इसमें मदद की जा रही है। मूलत: बारिश के दौरान सोयाबीन की फसल नष्ट होने व नुकसान से बचाने के लिए यह 'रिज एंड फैरो मेथड' कारगर है।

सोयाबीन की फसल की लगातार नुकसान होने के कारण जिले में किसानों का सोयाबीन की खेती को लेकर निराशाजनक भाव आता जा रहा है। सोयाबीन के अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकी 'रिज एंड फैरो विधि' के 20 एकड़ में प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए थे। एसएसआई जो आजीविका मिशन की सहयोगी संस्था है की फील्ड ऑफिसर दिव्यांशु शर्मा गोपाल करात ने बताया कि कृषि अभियांत्रिकी विभाग के सहयोग से यह प्लॉट तैयार किए गए। कृषि अभियांत्रिकी विभाग के माध्यम से इन किसानों के खेत में यह मॉडल बनाए गए हैं।
बीज के लिए समूहों के माध्यम से वित्तीय सहयोग दिया जा रहा
किसानों ने बीज खरीदा जो उन्हें आजीविका मिशन के वित्तीय सहयोग से समूह के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने वाले ऋण की सहायता से लिया गया अनूप तिवारी जिला प्रबंधक कृषि ने बताया कि इस विधि में ऊंचे बेड बनाकर सोयाबीन की बोनी की जाती है। जबकि प्रत्येक बेड के बाजू से नालियां होती है जो बारिश के अतिरिक्त पानी को ड्रेन आउट कर देती है इसके कारण पौधे को बारिश से नुकसान नहीं होता सोयाबीन की खेती की यह बहुत ही कारगर और प्रभावशाली तकनीक है रैली विकासखंड के ग्राम बेरखेड़ी कला ग्राम पंचायत विजयपुरा के किसानों ने आगे आकर इस तकनीकी को अपनाने की पहल की। समूह से जुड़ी श्रीमती अंजू लोधी गीता लोधी द्रोपती पटेल श्रीमती ललिता जाटव गोमती जाटव समिति समूह से जुड़ी 20 महिलाओं ने इस तकनीकी को अपनाया है
आमदनी बढ़ाने के लिए उच्च तकनीक कारगर
कलेक्टर दीपक आर्य का कहना है कि जिले के किसानों को आमदनी बढ़ाने के लिए और उच्चतम तकनीकी से अवगत कराने की दृष्टि से ऐसे प्रयोग उपयोगी और कारगर होते हो कृषि अभियांत्रिकी विभाग के द्वारा बनाया गया रिच एंड पैरों मॉडल को देखकर किसान सोयाबीन के माध्यम से फिर से अपनी आमदनी को बढ़ाने में सफल होंगे।
क्या है 'रिज एंड फेरो' तकनीक
'रिज एंड फेरो' पद्धति से फसल बोने के लिए एक विशेष प्रकार की सीड ड्रिल का उपयोग किया जाता है, जिसमें बुवाई करते समय बीचों-बीच एक मेड़ बनाई जाती है। इस सीड ड्रिल से बीज मेड़ के ऊपर बोए जाते हैं। इससे बीज भी सामान्य बुवाई की तुलना में कम लगता है और पैदावार भी अधिक होती है।
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