स्वाभिमानी आदिवासियों की शर्त-'कोरोना संकट में फ्री राशन तभी लेंगे जब लॉकडाउन यह 'ऋण' चुकाने का मौका दो'

सिरोही। 'साहब! हमारे लिए भूख नहीं...। स्वाभिमान बड़ा है...। वर्षों से चली आ रही परम्परा को कोरोना संकट में भी नहीं भूल सकते...। लॉकडाउन के समय 'मुफ्त'में उपलब्ध करवाया जा रहा रा​शन एक ही शर्त पर लेंगे...जब हमें लॉकडाउन के बाद इस ऋण की पाई-पाई चुकाने का मौका मिले...' यह कहना है राजस्थान के सिरोही जिले के उन आदिवासी परिवारों का जिन्होंने लॉकडाउन के चलते स्वयंसेव संस्थाओं द्वारा मुहैया करवाए जा रहे राशन किट लेने से इनकार कर दिया।

Tribals of Rajasthan Showing self respect in Corona crisis

मरत दम तक निभाएंगे स्वाभिमान की परंपरा

दरअसल, लॉकडाउन के चलते लोगों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया। राज्य सरकार, स्वयंसेवी संस्थाएं और आमजन जरूरतमंद लोगों के लिए राशन की व्यवस्था कर रहे हैं। राजस्थान के सिरोही जिले के गांव मिंगलवा फॉल और होक्कफाली में जब स्वयंसेवी संस्थाएं राशन किट उपलब्ध करवाने पहुंची तो अजीब स्थिति का सामना पड़ा। आदिवासी बाहुल्य इन गांवों के लोगों ने फ्री में मिल रहे राशन किट को नकार दिया और बरसों से चली आ रही अपने स्वाभिमान की परंपरा को मरते दम न छोड़ने की जिद पर अड़े रहे हैं।

चोपड़ा के लिए रजिस्टर में लिखे नाम

न्यूज 18 की खबर के मुताबिक स्वयंसेवी संस्था के लोगों ने जरूरतमंद आदिवासियों से संकट की इस घड़ी में रा​शन लेने की समझाइश की तो उन्होंने शर्त कि हम यह राशन दया नहीं बल्कि ऋण समझकर ले सकते हैं। इस ऋण को भी लॉकडाउन के बाद मजदूरी करके लौटा देंगे। आदिवासियों ने यह सिर्फ नहीं कहा बल्कि बाकायदा एक रजिस्टर में राशन लेने वालों के नाम भी लिखे गए ताकि सब बाद में अपना अपना यह ऋण उतार सकें। आदिवासियों की परम्परा के मुताबिक इस ऋण को 'चोपड़ा' कहा जाता है।

क्या कहते हैं आदिवासी परिवार

सिरोही के वासा गांव के 27 वर्षीय किसना राम देवासी कहते हैं कि लॉकडाउन के चलते अहमदाबाद में कुक की नौकरी छूट गई। 9 लोगों के परिवार के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया। स्वय सेवी संस्था ने मदद की, लेकिन हमें दान में कुछ भी स्वीकार करना हमारे पुरखों की सीख के खिलाफ है। लेकिन बेसहारा जानवरों के लिए रोटियां बनाकर बदले में राशन पाकर मेरा परिवार खुश है। जबकि गांव की दिहाड़ी मजदूर वरजू देवी भी हर दूसरे दिन तकरीबन 100 रोटियां बेसहारा जीवों के लिए बना रही हैं ताकि पेट भी भरे और स्वाभिमान भी न मरे।

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