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Khatu Shyam Ji History: राजस्थान के सीकर में क्यों लगता है खाटू फाल्गुन लक्खी मेला? जानिए इतिहास

Khatushyamji Falgun Mela Story: खाटूश्यामजी फाल्गुन लक्‍खी मेला और निशान यात्रा राजस्थान के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है। राजस्थान के सीकर जिले के दांतारामगढ़ उपखंड के खाटू कस्बे में वर्ष 2025 का खाटू मेला 28 फरवरी से शुरू होकर 12 दिन तक भरेगा। इस बार के खाटू मेला 2025 में VIP दर्शनों पर रोक रहेगी। खाटूश्यामजी मेले के मौके पर आइए जानते हैं सीकर के खाटू कस्‍बे में ही क्यों भरता है बाबा श्‍याम का फाल्गुन लक्खी मेला। खाटू मेले का महत्व और खाटू मेले से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

कौन हैं बर्बरीक जो बने बाबा श्याम

कौन हैं बर्बरीक जो बने बाबा श्याम

खाटूश्यामजी को पहले बर्बरीक के नाम से जाना जाता था। बर्बरीक से खाटूश्यामजी बनने के पीछे कई दशकों से प्रचलित कथा महाभारत काल की बताई जाती है। किंवदंती है कि भीम के बेटे घटोत्कच और दैत्य मूर की बेटी मोरवी के पुत्र बर्बरीक ने अपनी मां से वादा किया था कि वो महाभारत के युद्ध में कमजोर पक्ष का साथ देंगे। उन्होंने कौरवों के लिए लड़ने का फैसला किया। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक कौरवों का साथ देंगे तो पांडवों की हार तय है। ऐसे में श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान में उसका सिर मांग लिया। उन्होंने तुरंत अपना शीश दान कर दिया। बर्बरीक के इस बलिदान से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे कलयुग में उनके नाम 'श्याम' से पूजे जाएंगे।

 खाटूश्यामजी में ही क्यों पूजे जाते हैं बर्बरीक

खाटूश्यामजी में ही क्यों पूजे जाते हैं बर्बरीक

प्रचलित कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान कटा बर्बरीक का शीश राजस्थान के सीकर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित छोटे से कस्बे खाटू में दफनाया गया। एक गाय उस स्थान पर आकर रोजाना अपने स्तनों से दूध की धारा स्वत: ही बहाती थी। बाद में खुदाई के बाद वहां एक शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। तब उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया। कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया। इस दिन बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कँवर द्वारा बनाया गया था। खाटू कस्बे में बर्बरीक की पूजा श्याम नाम से होने के कारण इस जगह को खाटूश्यामजी भी कहा जाने लगा।

देशभर से पहुंचते हैं लाखों श्याम भक्त

देशभर से पहुंचते हैं लाखों श्याम भक्त

खाटूश्यामजी के वार्षिक मेले में देशभर से श्याम भक्तों का सैलाब उमड़ता है। भक्त शीश के दानी से दरबार में सिर झुकाकर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं। बाबा श्याम की एक झलक पाने के लिए श्याम भक्तों लंबी लंबी कतारों में कई घंटों तक खड़े रहते हैं। फाल्गुन माह में भरने वाले लक्खी मेले में तो खाटूश्यामजी में पग-पग पर सिर्फ श्याम दीवाने ही नजर आते हैं।

 क्या है बाबा श्याम की​ निशान यात्रा

क्या है बाबा श्याम की​ निशान यात्रा

श्याम भक्तों की निशान और पद यात्राएं सालभर जारी रहती हैं। यूं तो अमूमन खाटूश्यामजी से पहले रींगस कस्बे में ही पद यात्राएं शुरू होती हैं, मगर फाल्गुन मेले के मौके पर लोग अपने घरों से ही कई किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करके खाटूश्यामजी पहुंचते हैं। मान्यता है कि बाबा श्याम के दरबार में केसरिया रंग का यह निशान चढ़ाने से हर मनोकामना पूरी होती है। फाल्गुन मेले के दौरान लाखों निशान बाबा श्याम को चढ़ाए जाते हैं।

 क्या है श्याम कुंड, क्यों लगाते हैं इसमें डुबकी

क्या है श्याम कुंड, क्यों लगाते हैं इसमें डुबकी

फाल्गुन मेला के दौरान श्याम कुंड में डुबकी लगाना अत्यधिक शुभ माना जाता है। खाटू स्थित श्याम कुंड वाली जगह पर ही बर्बरीक का शीश पहली बार प्रकट हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि श्याम कुंड में स्नान करने से भक्तों में सकारात्क ऊर्जा का संचार होता है। वह बीमारियों और व्याधियों से मुक्त हो जाता है। इसलिए बड़ी संख्या में फाल्गुन मेले के दौरान भक्त श्याम कुंड में स्नान करते हैं।

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