राजस्थान के पूलासर गांव में दूल्हा घोड़ी पर नहीं होता सवार, बारात के साथ चलता है पैदल, जानिए वजह
नई दिल्ली । शादी की अन्य रस्मों के साथ ही दूल्हे का घोड़ी पर सवार होकर बारात के साथ दुल्हन के घर तक पहुंचने का रिवाज भी वर्षों पुराना है। अब तो वो दिन भी नहीं रहे, जब किसी गांव-कस्बे में कोई दबंग किसी जाति विशेष के दूल्हे को घोड़ी पर ना बैठने दें, परन्तु राजस्थान के चूरू जिले में एक गांव ऐसा भी है। जहां आज भी दूल्हे घोड़ी पर सवार नहीं होते। इसके पीछे कोई डर नहीं बल्कि एक परम्परा है, जो करीब चार सौ साल से निभाई जा रही है। यह अनूठी परम्परा चूरू जिले के सरदारशहर उपखंड मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित गांव पूलासर और 15 किलोमीटर दूर स्थित गांव सवाई छोटी से जुड़ी है।

प्रो. ओपी बोहरा ने किया रिसर्च
चूरू जिले के प्रो. ओपी बोहरा बताते हैं कि उन्होंने पूलासर गांव में दूल्हे के घोड़ी पर नहीं बैठने की परम्परा पर शोध किया है, जिसके चलते कई बार ग्रामीणों से इस विषय में बात हुई। गांव के बुजुर्गों से बातचीत में एक कहानी सामने आई जो इस प्रकार कि करीब चार सौ साल पहले चूरू जिला बीकानेर रियासत के अधीन हुआ करता था, मगर चूरू जिले का पूलासर गांव स्वतंत्र था। यहां पर अधिकांश परिवार ब्राह्मणों के थे।

बीकानेर सेना ने की चढ़ाई
बीकानेर रियासत के राजा ने पूलासर के लोगों से कर मांगा, मगर ब्राह्मण परिवार पूजा-पाठ करके जीवन यापन करते थे। कर देने में असमर्थ थे। ऐसे में राजा ने अपनी सेना के साथ गांव पूलासर पर चढ़ाई कर दी। यह खबर लगते ही गांव का उगाराम घोड़ी पर सवार होकर राजा की सेना से भिड़ने निकल पड़ा। बीकानेर राजा की सेना और उगाराम का पड़ोस के गांव सवाई छोटी में आमना-सामना हुआ।

उगाराम के सम्मान में शुरू हुई परम्परा
उगाराम ने राजा से विनती की कि वे पूलासर के लोगों से कर ना लें, मगर राजा नहीं माना और उसने कर के बदले उगाराम से उसका शीश मांग लिया। उगाराम ने अपना शीश काटकर राजा को दे दिया। तभी से उगाराम के सम्मान में गांव पूलासर में किसी दूल्हे के घोड़ी पर नहीं बैठने की परम्परा शुरू हो गई, जिसे ग्रामीण आज भी बड़ी शिद्दत से निभा रहे हैं। गांव में जब भी कोई आती है या बारात रवाना होती है तो दूल्हा बारातियों के साथ पैदल चलता है। घोड़ी पर सवार नहीं होता।












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