मालवा क्षेत्र जीतने से मिलती है पंजाब की सत्ता, प्रदेश की सियासत से जुड़ी 4 रोचक बातें
पंजाब के चुनावी नतीजों के बाद सियासी गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। कई मिथकों पर भी चर्चा ज़ोरों पर है जैसे कि जिसने मालवा क्षेत्र में जीत दर्ज की वह पार्टी को पंजाब की सत्ता पर क़ाबिज़ होती है।
चंडीगढ़,12 मार्च 2022। पंजाब के चुनावी नतीजों के बाद सियासी गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। कई मिथकों पर भी चर्चा ज़ोरों पर है जैसे कि जिसने मालवा क्षेत्र में जीत दर्ज की वह पार्टी को पंजाब की सत्ता पर क़ाबिज़ होती है। इसी तरह की और भी कई चर्चाएं हो रही हैं जैसे कि 1966 के बाद पंजाब में कोई भी गैर सिख सीएम नहीं बना। आपको कुछ इसी इस तरह की रोचक तथ्यों से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जो कि चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद से चर्चा का विषय बनी हुई है।

22 मुख्यमंत्रियों में से कांग्रेस के रहे हैं 14 मुख्यमंत्री
पंजाब के सियासी गलियारों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि ज़्यादातर पंजाब कांग्रेस का गढ रहा. इसके बाद भी कांग्रेस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कांग्रेस में गुटबाज़ी और पार्टी के खिलाफ़ बयानबाज़ी है। पंजाब की सत्ता में होने के बाद कांग्रेस से ऐसा प्रदर्शन की उम्मीद बहुत कम थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में 66% कांग्रेस का वोट शेयर था। ग़ौरतलब है कि ये कांग्रेस का दूसरा बड़ा वोट शेयर था। इससे पहले 1992 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 74% था। आपको बता दें कि पंजाब के 22 मुख्यमंत्रियों में से 14 मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के ही रहे हैं।

पंजाब की सियासत पर जट सिख हावी
पंजाब में इस बार के विधानसभा चुनाव में सियासी समीकरण पूरी तरह से बदले हुए थे। चुनाव प्रचार के दौरान कई तरह के आंकलन और क़यास लगाए जा रहे थे। इन सबके बीच सभी राजनीतिक पार्टियां दलित मतदाताओं को लुभाने की पुरज़ोर कोशिश कर रही थीं। कांग्रेस ने दलित मतदाताओं को लुभाने के लिए तो मास्ट स्ट्रोक खेलते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी पर बैठाया। इसके साथ ही उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित किया लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। आपको बता दें कि पूरे हिंदुस्तान की अनुसूचित जाति की तादाद में सबसे ज़्यादा आबादी पंजाब में बसती है। पूरे देश की अनुसूचित आबादी की 31.9% जनसंख्या पंजाब में बसती है। इसके बावजूद पंजाब की सियासत पर जट्ट सिख हावी है। उनकी जनसंख्या सिर्फ़ 20% ही है।

मालवा क्षेत्र जीतने से मिलती है पंजाब की सत्ता
पंजाब के सियासी जानकारों का मानना है कि मालव क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करने वाली पार्टी ही पंजाब की सत्ता पर क़ाबिज होती है। आपको बता दें कि मालवा रीजन सतलुज नदी के साउथ बेल्ट पर स्थित है। यहां पंजाब विधानसभा की 69 सीटें हैं। पंजाब में आमतौर पर यह देखा गया है कि इस क्षेत्र में जीत दर्ज करने वाली पार्टी ही सत्ता पर वीराजमान हुई है। अभी तक ऐसा ही होता आया है, पिछले बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां से 40 सीटों पर क़ब्ज़ा जमाया था। सत्ता में कांग्रेस ही आई थी। इस बार यहां कि 69 में से 64 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने क़ब्ज़ा जमाया है और प्रचंड बहुमत से जीत भी दर्ज कर चुकी है। हालांकि 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां से जीत दर्ज की थी लेकिन शिअद-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी।

पंजाब में अभी तक सिर्फ़ एक गैर-सिख CM
संसद ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 में पारित किया था। इस वजह से मॉडर्न स्टेट ऑफ पंजाब के साथ-साथ नए प्रदेश हरियाणा के निर्माण नींव पड़ी। इसके बाद से पंजाब में एक मुख्यमंत्री को छोड़ कर अभी तक सभी सिख मुख्यमंत्री ही रहे हैं। पंजाब के आखिरी गैर-जाट सिख मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह थे, जिन्होंने 1972से लेकर 1977 तक सीएम की गद्दी संभाली थी। उसके बाद ज्ञानी जैल सिंह 1982 से 1987 तक हिंदुस्तान के राष्ट्रपति रहे थे। ग़ौरतलब है कि हिंदुस्तान के पहले और अभी तक के एकलौते सिख राष्ट्रपति थे।
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