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पंजाब : 84 की टीस की दवा 22 में खोज रहे ‘घायल’ कप्तान

चंडीगढ़, 09 दिसंबर। 'कप्तान' घायल हैं। अच्छी भली कप्तानी चल रही थी। लेकिन टीम प्रबंधन ने मियाद से पहले कप्तानी छीन ली। जाहिर है कप्तान को घायल होना था और हुए। पूरा करियर दांव पर लग गया। मैदान में वापसी तो कर ली लेकिन लय कैसे हासिल करेंगे ? बैटिंग जमाने के लिए कुछ न कुछ तो करना था। सो घायल कप्तान को 1984 की टीस सताने लगी। वे 1984 की टीस की दवा 2022 में खोज रहे हैं ताकि इंजुरी से उबर कर परफॉर्म कर सकें।

captain amarinder singh raised a issue of 1984 sikh riots in punjab election 2022

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब चुनाव में सिख दंगे (1984) का मुद्दा उठा कर सत्तारुढ़ कांग्रेस को उखाड़ने की मुहिम शुरू कर दी है। कांग्रेस की पारी बिखरेगी तो कैप्टन की निखरेगी। कांग्रेस को 1984 के जख्म की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। दिल्ली में 15 साल तक राज करने वाली कांग्रेस का अब वहां सफाया हो चुका है। पंजाब में अकाली दल कांग्रेस के खिलाफ इस मुद्दे का फायदा उठाता रहा है। लेकिन 2022 में कांग्रेस ने खुद ही कैप्टन को ये मुद्दा थमा दिया है।

पंजाब चुनाव में ‘1984’ की गूंज

पंजाब चुनाव में ‘1984’ की गूंज

जिस सिद्धू के लिए कांग्रेस ने 'कप्तान' को कुर्बान किया था अब वह उनके पर कतरने पर उतर आयी है। पंजाब चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू फ्रीहैंड चाहते थे। लेकिन कांग्रेस ने सिद्दू के अधिकार को कम करने के लिए कई वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतार दिया है। अजय माकन स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष हैं। अंबिका सोनी को चुनाव समन्वय समिति का चेयरमैन बनाया गया है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को चुनाव प्रचार समिति की कमान सौंपी गयी है। उम्मीदवारों के चयन में स्क्रीनिंग कमेटी की भूमिका सबसे अहम होती है। यानी अब सिद्धू की मनमानी नहीं चलेगी। लेकिन सिद्धू के तेवर को ढीला करने की कोशिश में कांग्रेस खुद विवादों में फंस गयी है। कैप्टन अमरिंद सिंह ने अजय माकन को स्क्रीनिंग कमेटी का हेड बनाये जाने पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कैप्टन ने कहा है, "अजय माकन उस ललित माकने के भतीजे हैं जो 1984 के सिख दंगे के प्रमुख आरोपी थे। अजय माकन को स्क्रीनिंग कमेटी का हेड बनाना पंजाब के सिखों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा है। कांग्रेस ने माकन को पंजाब भेज कर सिखों को अपमानित किया है।"

कैप्टन की चुनावी फिरकी

कैप्टन की चुनावी फिरकी

माना जा रहा है कि कैप्टन ने कांग्रेस के सिख वोटरों को अपने पाले में करने के लिए ही 1984 के मुद्दे को उछाला है। उनकी नयी पार्टी को राजनीति के लिए कोई मजबूत आधार चाहिए था। वे इसकी तलाश में थे ही कांग्रेस ने उनकी राह आसान कर दी। अजय माकन के बहाने उन्होंने 1984 के सिख दंगे के जख्म को कुरेद दिया। खेल में बने रहने के लिए कैप्टन को हर हाल में इस लाइफलाइन का इस्तेमाल करना था। इसके लिए उन्होंने अपने पुराने स्टैंड को बदल दिया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ही वह नेता हैं जो कभी सिख दंगे पर कांग्रेस का पुरजोर बचाव करते थे। जब अकाली दल के नेता इसे मुद्दा बना कर कांग्रेस पर हमला करते थे तब कैप्टन ढाल बन कर खड़ा हो जाते थे। वे कहते थे, 1984 में जब ये घटना हुई थी तब राहुल गांधी की उम्र सिर्फ 10 साल की थी। इस मामले में भला उनका क्या दोष है। उन्हें इस मुद्दे से दूर रखा जाना चाहिए। लेकिन अब वही कैप्टन अपने राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस के खिलाफ ये मुद्दा उछाल रहे हैं।

क्या पंजाब चुनाव में 1984 कोई मुद्दा है ?

क्या पंजाब चुनाव में 1984 कोई मुद्दा है ?

अजय माकन 2015 से लेकर 2019 तक दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उनके अध्यक्ष रहते कांग्रेस दिल्ली में लगातार दो चुनाव हारी। जब वे दिल्ली में पार्टी को जीत नहीं दिला पाये तो फिर पंजाब में कैसे कमाल कर पाएंगे ? जब कि पंजाब की राजनीति पर उनकी पकड़ भी नहीं है। क्या माकन को पंजाब भेजकर कांग्रेस ने कोई गलती की है? क्या पंजाब के चुनाव में '1984' कोई मुद्दा रहा है ? 1984 सिख दंगे के बाद 1985 में पंजाब विधानसभा के चुनाव हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकासन पहुंचा था। 1980 में 63 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को 32 सीटों पर लुढ़क गयी थी। कांग्रेस के खिलाफ गुस्से का फायदा अकाली दल को मिला था और उसे 73 सीटों पर जीत मिली थी। धीरे-धीरे जब इस मुद्दे का असर कम हुआ तो 1992 में कांग्रेस ने वापसी की। जाहिर है 1984 की दुखद घटना एक भावनात्मक मुद्दा है। पिछले कुछ चुनावों में इस मुद्दे को अहमियत नहीं मिली। इसलिए 2002 और 2017 में कांग्रेस को जीत मिली। लेकिन इस पुराने जख्म को फिर कुरेदा गया तो सियासी हालात बदल सकते हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह सिख स्वाभिमान के लिए स्टैंड लेने वाले नेता रहे हैं। वे ऑपरेशन ब्लू स्टार से इतने आहत हुए थे कि 1984 में कांग्रेस कर अकाली दल का दामन थाम लिया था। वे एक बार फिर कांग्रेस से अलग हैं और 1984 को अपनी राजनीति का आधार बना रहे हैं। इससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

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