पंजाब विधानसभा चुनाव में चलेगा 'मोदी मैजिक' या दूसरी पार्टी मारेगी बाज़ी, समझिए सियासी गणित
सभी राजनीतिक पार्टियां खुद को 'दलित-हितैषी' साबित करने में जुटी हुई हैं। पंजाब में किसान आंदोलन काफी असर देखने को मिल रहा है।
चंडीगढ़, 27 दिसंबर 2021। पंजाब में सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए सभी सियासी दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुटी हुई है। विधानसभा चुनाव के जिस तरह के समीकरण बनते हुए नज़र आ रहे हैं, इससे क़यास लगाए जा रहे हैं कि मुक़ाबला काफ़ी दिलचस्प हो सकता है। सभी राजनीतिक पार्टियां खुद को 'दलित-हितैषी' साबित करने में जुटी हुई हैं। पंजाब में किसान आंदोलन काफी असर देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि दलितों और अन्य समुदायों के बीच जट सिखों के खिलाफ वोटों का ध्रुवीकरण भी हो सकता है। ग़ौरतलब है कि पंजाब में जट सिख मतदाताओं की तादाद सिर्फ़ 18 फ़िसद है लेकिन सियासी ज़मीन पर उनकी पकड़ अच्छी है। शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भारतीय जनता पार्टी रविदास और वाल्मीकि समुदायों के बीच अपनी पैठ को मज़बूत करने की लगातार कोशिश कर रही है। वहीं आम आदमी पार्टी इन सब रणनीतियों से दूर दिल्ली मॉडल की तर्ज़ पर चुनावी रण में उतरी है।

दलित मतदाताओं की अच्छी पकड़
पंजाब के दोआबा क्षेत्र के जालंधर, कपूरथला, नवांशहर और होशियारपुर जिलों में दलित वोटरों की अच्छी पकड़ है। वही इन क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी की भी सियासी ज़मीन काफ़ी मजबूत है। किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता में क़ाबिज़ होने के लिए दलित समुदाय को साथ लेकर ही चलना होगा। भाजपा के दो प्रमुख नेता केंद्रीय मंत्री सोम प्रकाश और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला रविदास समुदाय से हैं और इसी क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। वहीं सियासी पार्टियों की निगाह हिंदू वोट बैंक पर टिकी हुई हैं। इसी बाबत शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी हिंदू वोट बैंक को अपने पाले में करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। चूंकि भारतीय जनता पार्टी को किसान आंदोलन की वजह से हर तरफ़ से विरोध का सामना करना पड़ा रहा है, इसलिए वह ख़ास तौर से हिंदू आबादी वाले क्षेत्र में ज़्यादा मेहनत कर रही है।

हिंदू वोट बैंक पर सियासी दलों की निगाह
पंजाब में हिंदू वोट बैंक की बात की जाए तो करीब 39 फ़ीसद हिंदू और 33 फीसद अनुसूचित जाति (हिंदू और सिख) चुनाव में जीत दर्ज करने में अहम किरदार अदा करते हैं। पंजाब की सियासत में यह देखा भी गया है कि हिंदू वोट बैंक जिस पाले में जाता है सरकार उसी पार्टी की बनती है। हालांकि पंजाब कांग्रेस के पास जट्ट नेताओँ की कमी नही हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जब से अपनी सियासी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस बनाई है, तब से पंजाब में कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाने से पंजाब कांग्रेस के पास अनुसूचित जाति का चेहरा तो आ गया, लेकिन कैप्टन की कमी पूरा करने के लिए कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। ऐसा चेहरा जो पूरे पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसी पकड़ रखता हो। पंजाब कांग्रेस में हिंदू चेहरे के तौर पर अगर भारत भूषण आशु की बात जाए तो उनका दायरा सिर्फ़ लुधियाना तक ही सीमित है। हिंदू चेहरा के तौर पर पंजाब में कांग्रेस ने उन्हें प्रोजेक्ट भी करेगी तो ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिलेगा । कांग्रेस के लिए हिंदू वोटर को अपने पाले में बनाए रखना एक चुनौती साबित हो सकती है।

BJP कर रही डैमेज कंट्रोल
भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो उनक ज़्यादातर चुनावी एजेंडा हिंदुत्व पर रहता है। किसान आंदोलन की वजह से भारतीय जनता पार्टी का पक्ष कमज़ोर तो हुआ लेकिन भाजपा डैमेज कंट्रोल में कामयाब होती नज़र आ रही है। इसी के साथ अपनी पार्टी में किसान नेताओं को भी जोड़ने की क़वायद तेज़ कर रही है। किसान आंदोलन की शुरूआत पंजाब से ही हुई थी, भारतीय जनता पार्टी बहुत ही अच्छे से जानती है कि कृषि कानून के विरोध की वजह से उन्हें गांवों में और सिखों के वोट नहीं मिलेंगे । इसलिए भाजपा ने पंजाब की उन सीटों को चुना है जहां पर हिंदू और दलित आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। ग़ौरतलब है की पंजाब 73 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर हिंदू और दलित वोटर की भूमिका अहम रहती है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी इन्हीं सीटों पर अपना खास ज़ोर लगा रही है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी की नज़र उन 45 सीटों पर है जहां पर हिंदू आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। इसके अलावा 28 ऐसी सीटें है जहां पर हिंदू और दलित की आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। ग़ौरतलब है की यहा की बड़ी आबादी किसान आंदोलन की वजह से ज़्यादा प्रभावित भी नहीं हुई।

SAD की चुनावी रणनीति
शिरोमणि अकाली दल की बात की जाए तो शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हिंदु वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। चूंकी शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन में एक साथ चुनाव लड़ रही है। तो इस बाबता सुखबीर सिंह बादल ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी की सरकार में एक अनुसूचित जाति और एक हिंदू मुख्यमंत्री होगा। वहीं सुखबीर सिंह बादल ने हिंदू वोट बैंक का साधने की कोशिश में अपनी घोषणाओं में भी हिंदूओं पर ख़ास ध्यान दे रहे हैं। भाजपा से निकाले जाने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने अनिल जोशी को पार्टी में शामिल लिया। पंजाब में अनिल जोशी की छवी बतौर हिंदू नेता काफ़ी अच्छी रही है। हिंदू वोट बैंक को साधने के लिए हि सुखबीर सिंह बादल हिंदुत्व छवी को तरजीह दे रहे हैं। भाजपा के साथ गठबंधन में शिरोमणि अकाली दल को बिना मेहनत किए ही हिंदू समुदाय के वोट मिल जाते थे, लेकिन भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद समीकरण बदले चुके हैं।

AAP मजबूत कर रही सियासी ज़मीन
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सियासी पकड़ की बात की जाए तो पहले पंजाब मे आम आदमी पार्टी अपनी पकड़ नहीं बना पाई थी। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अपनी रैलियों गारंटी घोषणाओं का पिटारा खोलना शुरू किया आप की सियासी पकड़ मजबूत होती चली गई। केजरीवाव लोगों के बीच दिल्ली मॉडल को भुनाने में कामयाब होते हुए नज़र आ रहे हैं। यही वजह है कि चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब की 32 फीसदी आबादी आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाती दिख रही है। पंजाब विधानसभा चुनाव में जिस तरह के समीकरण बनते हुए नज़र आ रहे हैं। इससे यह तो साफ़ लग रहा है कि कोई भी सियासी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार नहीं बना पाएगी। यह देखने वाली बात होगी की भारतीय जनता पार्टी अपना हिंदुत्व कार्ड को किस तरह से कैश करती है। कांग्रेस सीएम चन्नी के कार्य को कितना भुना पाती है। शिअद-बसपा दलित गठबंधन वजूद में आता है या फिर आम आदमी पार्टी दिल्ली मॉडल की तर्ज़ पर सत्ता में काबिज़ होती है।
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