'सत्तू' के दम पर देश-विदेश में अपनी पहचान बनायेगा नालंदा
नालंदा (मुकुंद सिंह)। जिस सत्तू के बिना लिट्टी चोखा अधूरा है, अब वही सत्तू बिहार के एक जिले की पहचान गढ़ने जा रहा है। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो जुलाई के अंत तक नालंदा का सत्तू सिर्फ राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरर्राष्ट्रीय मार्केट में भी एक ब्रांड के रूप में उभर कर आएगा। इसकी ब्रांडिंग व मार्केटिंग करने का जिम्मा अमेजन कंपनी को दिया गया है। इसकी खासियत यह होगी कि यह इस सत्तू को मिली में नहीं बनाया जायेगा, बल्कि महिलाएं अपने हाथों से इसे तैयार करेंगी।
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सत्तू का नाम है 'नालंदा सत्तू'। चने का यह सत्तू सामान्य सत्तू से अधिक लाभकर होगा। 13 जुलाई से इसके निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की योजना है। तत्काल जीविका की 150 महिलाओं के बूते 'नालंदा सत्तू' के निर्माण से लेकर पैकेजिंग की जायेगी। डीडीसी कुंदन कुमार ने बताया कि महिलाओं को स्थायी रोजगार दिलाकर उनकी आय बढ़ाने की मुहिम के तहत पहले चरण में इससे 150 महिलाओं को जोड़ा गया है।
पायलेट प्रोजेक्ट के तहत होगा काम
पायलट प्रोजेक्ट के तहत चंडी के अनंतपुर गांव में कॉमन सेंटर की स्थापना की गयी है। महिलाओं को सत्तू बनाने से लेकर पैकेजिंग तक की ट्रेनिंग दी गयी है ताकि सत्तू की गुणवत्ता बरक़रार रह सके।उन्होंने बताया कि स्थानीय महिलाओं द्वारा निर्मित सत्तू को बेचने के लिए क्षितिज एग्रोटेक ने ऑनलाइन बिक्री के लिए अमेजन से करार किया है।
मिल में सत्तू की पिसाई से उसमें मौजूद पोषक तत्व जल जाते हैं। लेकिन जांता में पिसाई से ऐसा नहीं होता है। साथ ही जांता चलाने वाली महिलाओं की सेहत ठीक रहेगी। बीमारियां कम होंगी। महिलाओं को दीर्घकालिक रोजगार मिलेगा।
डीडीसी कुंदन कुमार ने बताया कि सरकार के जीविका उद्यम विकास कार्यक्रम (एलईडीपी, लाइवलीहूड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम) के तहत नाबार्ड फंडिंग कर रही है।
नावार्ड के डीडीएम अशोक कुमार सिंह ने बताया कि एलईडीपी को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सूबे के चार जिलों नालंदा, जमुई, मुंगेर व नवादा में लागू किया गया है। नालंदा में सत्तू उत्पादन की योजना है। इसकी स्वीकृति मिल चुकी है। जुलाई के अंत तक 'नालंदा सत्तू' बाजार में होगा।












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