यहां 40 साल से नहीं गूंजी शहनाई, कुंवारों की संख्या 95

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इन दोनों गांवों में न तो लड़की की शादी होती है और ना ही लड़कियाें के हाथ पीले हो पाते हैं। मुसीबत इतनी भी बड़ी नहीं है, जितनी कि बन चुकी है। यहां सड़क ना होना इस समस्या का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि जब यहां के कुछ युवाओं ने जंगल काटकर सड़क निकालने की हिम्मत दिखाई तो उन पर वन्य अधिकारियों ने केस कर दिया व काम बंद हो गया।
कहानी कुछ ऐसी है -
2005 में इस गांव में एक बीएसपी उम्मीदवार आए थे, जिन्होंने सारी समस्याओं को चट सुलझाने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि यदि उन्हें एमपी बनाया जाता है, तो वे इस क्षेत्र की काया-पलट कर देंगे। सभी कुंवारों ने उन्हें वोट दिया। जीतने के बाद वो नजर नहीं आए। अब यहां के लोगों को नरेंद्र मोदी से उम्मीद बंधी है।
6000 देकर बाहर की शादी -
इस गांव के कई कुंवारों ने शादी ना होने की वजह से गांव छोड़कर झारखंड में अपना बसेरा जमा लिया। जहां, आने-जाने का कोई रास्ता तक नहीं है, वहां कौन अपनी बेटी का कन्या दान करेगा। गौर करने वाली बात है कि यहां पहुंचने के लिए चार घंटे का लंबा वक्त् लगता है। पहाड़ की पगडंडी के सहारे लोग उतरते-चढ़ते हैं।जंगल काटकर यदि सड़क बन जाती तो यह दूरी घंटे भर में ही तय की जा सकती है। एक युवा ने बताया कि उसने रूपए देकर बाहर अपना घर बसाया।
इसे सियासत की लापरवाही कहें या हुक्मरानों की कशिश, सत्ता जब अपने चरम पर आती है, तो बेबसी और ज्यादा मजबूती के साथ उभरती है। खासकर तब, जब वोट के वादे भुला दिए जाते हैं, जनता नजरंदाज कर दी जाती है और इलाकों की उंगली ना पकड़कर कुर्सी पर कब्जा जमा लिया जाता है।












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