आखिर केजरीवाल को ना और अमित शाह को हां क्यों किया किरण बेदी ने?
नयी दिल्ली। देश की पहली महिला आईपीएस और अन्ना आंदोलन की समर्थक किरन बेदी ने आखिरकार राजनीति का दामन थाम ही लिया। किरन ने भारतीय जनता पार्टी के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। किरन बेदी दिल्ली में भाजपा का चेहरा होगी और उम्मीद की जा रही है कि वो आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ नई दिल्ली सीट से विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगी।

किरन के भाजपा में आने से बाजपा की रणनीति में एक बड़ा बदलाव होना तय है। अभी तक भाजपा हर जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय चेहरे पर ही चुनाव जीतते जा रही है। चाहे महाराष्ट्र हरियाणा, झारखंड या फिर कश्कीमीर हो, भाजपा ने हर जगह मोदी के नाम पर वोट मांगी है और जीत भी हासिल की है, लेकिन दिल्ली में उसे मोदी के अलावा किसी और चेहरे की भी ज़रूरत है।
केजरीवाल की चाल
भले ही पार्टी ये कह रही हो कि मोदी से बड़ा चेहरा कोई नहीं है, लेकिन आप इसे कमज़ोरी बता रही है। आप ने इसी कमजोरी को जगजाहिर करने के लिए दिल्ली चुनाव को केजरीवाल बनाम जगदीश मुखी कर दिया, लेकिन मुखी आप के सामने टिक नहीं पाएं। चुनाव की तारिखों के ऐलान के साथ ही आप ने फिर चाल चली और अरविंद केजरीवाल ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय को घेर लिया।
शाह को हां, केजरी को ना
सतीश उपाध्याय के बैकफुट पर जाते ही पार्टी ने फौरन किरण बेदी का नाम उछाल दिया और उन्हें केजरीवाल के सामने ला खड़ा कर दिया। किरन बेदी ने भी भाजपा को निराश नहीं किया और मोदी का हवाला देते हुए भाजपा की सदस्यता हासिल कर अपनी हामी भर दी। ऐसे में सवाल भी उठा कि आखिर किरन ने भाजपा को हां कह दिया जबकि अपने पुराने साथी अरविंक केजरीवाल के बार-बार आग्रह करने के बावजूद भी उन्होंने आप का साथ देने की बात से इंकार कर दिया।
किरण बेदी राजनीति नहीं करना चाहती। उन्होंने इसी को आदार बनाकर आम आदमी पार्टी से किनारा किया था, लेकिन ट्विटर पर नरेंद्र मोदी का समर्थन करती रही हैं। जवाब किरण बेदी को देना पड़ेगा कि राजनीति में आने का फैसला किसी बड़े पद के वादे के साथ रुका हुआ था।
बराबरी का होगा मुकाबला
अब तक दिल्ली का मुकाबला मोदी बनाम केजरीवाल का था, लेकिन किरन के भाजपा में आने के बाद ये मुकाबला बराबरी का हो जाएगा। लेकिन देखने वाली बात होगी कि आमतौर पर केजरीवाल को लेकर संयम का परिचय देने वाली सियासी मैदान में उतरने के बाद अरविंद केजरीवाल पर कैसे निशाना लगाएगी। ईमानदार शख्सियतों के बीच मुकाबला ज़ोरदार होगा। बस फर्क यह होगा कि एक राजनीति के मैदान में दो साल से है। जबकि दूसरे के पास कोई अनुभव नहीं।
सिर्फ उम्मीदवार नहीं
किरण बेदी भाजपा में सिर्फ एक उम्मीदवार के तौर पर नहीं देखी जाएंगी। भाजपा भले घोषणा न करे, लेकिन मान ही लिया जाएगा कि भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री की उम्मीदवार वही हैं। डॉ हर्षवर्धन के केंद्रीय राजनीति में चले जाने के बाद भाजपा को एक मजबूत शख्सित की तलाश थी जो उसे किरन बेदी के तौर पर मिल गई है।












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