Devendra Jhajharia : पैरालंपिक से तीसरे गोल्ड की 'उम्मीद' देवेंद्र झाझड़िया की पूरी कहानी उन्हीं की जुबानी
नई दिल्ली 21 अगस्त। मुझे पूरी उम्मीद है कि टोक्यो पैरालंपिक में भी स्वर्ण पदक पक्का है। वो भी नए विश्व रिकॉर्ड के साथ। 2004 एथेंस व 2016 रियो की तरह 2020 टोक्यो पैरालंपिक में भी भाला फेंककर अपना ही विश्व रिकॉर्ड तोड़ने में सफल रहूंगा। करोड़ों भारतीयों की दुआएं लेकर 24 को टोक्यो जा रहा हूं। 30 अगस्त को सुबह 8 बजे बाद आपको खुशखबरी मिल जाएगी। गर्व होगा कि देवेंद्र झाझड़िया ने एक बार फिर कमाल कर दिखाया है।

राजस्थान के चूरू में पैदा हुआ
मैं मूलरूप से राजधानी दिल्ली से 250 किमी दूर राजस्थान के चूरू जिले की राजगढ़ तहसील की देवीपुरा ग्राम पंचायत की झाझड़ियों की ढाणी का रहने वाला हूं। यहां किसान रामसिंह झाझड़िया व जीवनी देवी के घर जन्म हुआ। मेरे दो भाई जोगेंद्र झाझड़िया व महेंद्र झाझड़िया और चार बहन मायावती, निरमा, धनपति व किरोड़पति हैं। पांच किमी दूर स्थित पड़ोसी गांव रतनपुरा के सरकारी स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया गया था।

आठ साल की में करंट की चपेट में आया
साल 1989 में मैं आठ साल का था तब झाझड़िया की ढाणी के पास जोहड़ में अन्य बच्चों के साथ खेल रहा था। खेल के दौरान मैं एक पेड़ पर चढ़ा। पेड़ के पास से गुजर रहे बिजली के तारों के सम्पर्क में आने से झुलसकर नीचे आ गिरा। एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया। परिजन मुझे तुरंत सरकारी अस्पताल लेकर गए। प्राथमिक उपचार के बाद जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में रैफर किया गया।

बायां हाथ खोना पड़ा
15 दिन तक ना दवा लगी और ना ही दुआ काम आई। आखिर डाॅक्टरों को बायां हाथ काटना पड़ा। मैं अस्पताल से घर आ गया। सबको लगने लगा था कि बदनसीब देवेंद्र अब एक हाथ से जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा। चाहता तो मैं हार मान सकता था। निराश हो सकता था, मगर मुझे यह सब मंजूर नहीं था।

पीटीआई ने सिखाया भाला फेंकना
मैंने हादसे के कुछ समय बाद ही रतनपुरा के स्कूल में पीटीआई अमरसिंह से भाला फेंकना यानी (जेवलीन थ्रो) सीख लिया। स्कूल से आने के बाद खेत में अभ्यास किया करता था। स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगा था। दसवीं के बाद की पढ़ाई करने के लिए राजगढ़ के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में चला गया।

आरडी सिंह ने प्रतिभा को निखारा
यहां भी भाला फेंकना जारी रखा। 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद राजगढ़ के मोहता कॉलेज में दाखिला लिया। यहां से प्रथम वर्ष उत्तीर्ण कर हनुमानगढ़ आ गया। हनुमानगढ़ के एनएम पीजी कॉलेज से स्नातक किया। यहां कोच आरडी सिंह ने मेरी प्रतिभा को निखारा। मैं जमकर मेहनत करने लगा। फिलहाल 2014 से कोच सुनील तंवर हैं।

इंटरनेशनल लेवल पर जीतने लगा था मेडल
साल 2002 में आठवीं फेसपिक गेम्स बुसान (पैरा एशियन) मैंने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। तब देशभर की सुर्खियों में आ गया। मुझसे लोगों की उम्मीद बढ़ गई। अगले ही साल 2003 में ब्रिटिश ओपन एथलेटिक्स चैम्पियशिप प्रतियोगिता हुई। उसमें में जेवलिन थ्रो, ट्रिपल जम्प और शॉट पुट में स्वर्ण पदक मिला।

2004 में पहला पैरालंपिक गोल्ड मेडल व रिकॉर्ड
साल 2004 में मेरी जिंदगी में बड़ा मोड़ आया। एथेंस में पैरालंपिक गेम्स हुए। 62.15 मीटर भाला फेंककर विश्व रिकॉर्ड के साथ पहली बार स्वर्ण पदक जीता और व्यक्तिगत रूप से पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाला पहला भारतीय खिलाड़ी बना। लोग मेरी मिसाल देने लगे कि कमजोरी को ताकत बनाकर मुकाम हासिल किया जा सकता है।

2016 में दूसरा पैरालंपिक गोल्ड मेडल
रियो ओलंपिक 2016 में खुद का एथेंस वाला रिकॉर्ड तोड़कर 63.97 मीटर के साथ नए विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर लाया। अब टोक्यो पैरालंपिक 2020 में नया विश्व रिकॉर्ड बनाने की उम्मीद है।
2005 में मिला अर्जुन अवार्ड
मैंने हर बार इंटरनेशनल लेवल की प्रतियोगिताओं में देश की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास किया है। सफल भी रहा हूं। मुझे खूब लाड-प्यार और मान-सम्मान भी मिला। 3 दिसम्बर 2004 में राष्ट्रपति ने प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। इसी साल महाराणा प्रताप राज्य खेल पुरस्कार मिला। 29 अगस्त 2005 में अर्जुन अवार्ड और पीसीआई उत्कृष्ट खिलाड़ी पुरस्कार से नवाजा गया।

2014 में पद्मश्री से नवाजा गया
2014 में पद्मश्री और पैरा स्पोर्ट्स पर्सन ऑफ द ईयर अवार्ड मिला। 2016 में जीक्यू मैगजीन ने बेस्ट प्लेयर और 29 अगस्त 2017 को राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड प्राप्त किया। खुद पीएम मोदी भी कई बार हौसला अफजाई चुके हैं।












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