महा संग्रामः वंशवाद का होगा खात्मा या रहेगा बोलबाला
मुंबई। देश के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत के साथ चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही देशवासियों को वंशवाद की राजनीति खत्म करने की बात कही थी। चुनाव से पहले भी भाजपा के कई वरिष्ठ नेता वंशवाद की राजनीति के लिए नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना करते आए हैं।

लेकिन इस बार विधानसभा के महासंग्राम में वंशवाद की राजनीति चरम सीमा पर है। हलांकि यह जनता पर निर्भर करता है कि वह वंशवाद की राजनीति को बनाए रखेगी या उसका खात्म कर देगी।
नेहरू के समय से वंशवाद के लिए जानी गई कांग्रेस पार्टी की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे कुदल से और उनके पुत्र कंकावली से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री रहे विलासराव देशमुख के पुत्र अमिस विलासराव को लातूर सिटी से चुनाव से टिकट दिया है।
इन पार्टियों के भी वही हाल
एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार इस चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। भाजपा की बात करें तो भाजपा ने भावनात्मक कार्ड खेलते हुए भाजपा के पूर्व किंगमेकर गोपीनाथ मुंडे की दोनो बेटियों को टिकट दिया है। मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे मुंबई में परली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हैं। वहीं मनसे पार्टी ने बालासाहब की बहू और राज ठाकरे के भाई जितेंद्र यादव की पत्नी शालिनी ठाकरे को डिंडोसी से मैदान में उतारा है।
वैसे हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी वंशवाद की राजनीति चरम पर है। लेकिन फिलहाल अगर महाराष्ट्र की बात करें तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में आठ लाख से ज्यादा मतदाता मतदाता हैं। इन मतदाताओं के हाथों में ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पनपे वंशवाद जड़ के खात्में और पालन पोषण है।












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