महाराष्ट्र चुनाव विश्लेषणः दबी ज़ुबान भाजपा-शिवसेना का बंधन
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले ही भाजपा-शिवसेना मुख्यमंत्री बनने को लेकर जो जंग छिड़ी है उसमें बहुत गहराई छिपी है। भाजपा औऱ शिवसेना दबी ज़ुबान भले ही गठबंधन तोड़ने के लिए साफ तौर पर नहीं कह पा रही है लेकिन इसका टूटना तय माना जा रहा है। चाहे चुनाव से पहले टूटे या चुनाव के बाद। इसका फैसला काफी हद तक चुनाव नतीजे भी कर सकते हैं।

भाजपा-शिवसेना को महागठबंधन की संज्ञा दी जा रही है। दरअसल, यह कभी महागठबंधनों की तरह मजबूत बंधन था ही नहीं। यह सिर्फ सत्ता की आस में बैठी दोनो पार्टियों के बीच हुआ समझौता भर था। द इकॉनोमिक्स टाइम्स के मुताबिक 1989-90 में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के बीच सीटों को लेकर समझौता हुआ था। जिसके बल पर शिवसेना-भाजपा अपने मजबूरी के बंधन में बंधे हैं।
सीटों को लेकर जो विवाद दोनों में छिड़ा वह सिर्फ उस मजबूरी के गठबंधन से छुटकारा पाने की छटपटाहट औऱ छुटकारा पाने की एक जद्दोजहद ही कही जा सकती है।
जिस तरह से संकेत अभी मिल रहे हैं उससे कहा जा सकता है कि यह बंधन चुनाव बाद नतीजों के आधार पर तमाम से मुक्त हो सकता है। करीब पच्चीस वर्ष से शिवसेना के साथ गठबंधन में बंधुआ मजदूर की तरह बंधी भाजपा महाराष्ट्र में सरकार बनाने में नाकाम रही है। यही वह वजह है जिससे आज भी भाजपा आशंकित है। यही आशंका भाजपा की गठबंधन की मजबूरी को बनाए हुए है।
यह कहने में कोई ज्यादती नहीं कि भाजपा अगर इस बार महाराष्ट्र में थोड़ी ज्यादा सीटों पर जीत हासिल कर लेती है तो शिवसेना से सालों पहले हुआ समझौता तोड़ देगी। शिवसेना महाराष्ट्र लोकल बॉडी में जनाधार रहा है, वो शायद रहेगा। लेकिन राज्य की सत्ता तक पहुंचने के लिए शिवसेना को मराठा वोट ही नहीं बल्कि मुस्लिम तथा वहां जाकर बसे उत्तर भारतीय लोगों का भी जनाधार हासिल करने की जरूरत होगी।
रही बात भाजपा की तो यह मानो या न मानो नरेंद्र मोदी युवाओं के बीच में ब्रांड बन चुके हैं। ऐसा ब्रांड जो कुछ भी कहे उसे सुनने के लिए सभी के कान खड़े हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी के चेहरे के पीछे भाजपा आगे बढ़ रही है। इसका नमूना लोकसभा चुनाव में दिख चुका है।
पूरी संभावनाओं को तलाशते हुए भाजपा ने पूरे विवाद पर अब अपनी जो शतरंजी चाल चली है। शिवसेना की ओर से अधिक सीटें नहीं दिए जाने के बाद और मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए विवाद का राजनीतिक रूप से सुलझाने के लिए भाजपा ने छोटे सहयोगी दलों से लगातार मुलाकात की है। जिसके बाद से ही छोटे दल प्रस्तावित 7 से ज्यादा 18 पर चुनाव लड़ने को लेकर अड़ गए हैं।












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