महाराष्ट्र में नुकसान उठाकर भी ट्रिपल इंजन सरकार चलाने के लिए क्यों मजबूर है बीजेपी?
महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी ने दो बार सरकार बनाई है। एक बार 80 घंटे की सरकार थी। अभी शिवसेना के एकनाथ शिंदे की अगुवाई में पिछले करीब एक साल से सरकार चला रही है, जिसमें रविवार को अजित पवार गुट की एनसीपी शामिल हुई। राज्य विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है।
288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के 105 एमलए हैं। उसे 10 निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों का भी समर्थन हासिल है। लेकिन, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सरकार में पार्टी के सिर्फ 10 ही मंत्री हैं। उनमें से भी दो वे हैं, जो पार्टी के मूल कैडर नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस से आए हुए हैं।

मंत्रियों की संख्या सहयोगियों के बराबर
तथ्य यह है कि सदन और सरकार में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा के महज 8 समर्पित नेताओं को ही मंत्री पद मिल पाया है। जबकि, इस सरकार को चलाने में मुंबई से लेकर दिल्ली तक असल रोल में बीजेपी के ही नेता रहे हैं। दूसरी तरफ शिंदे की शिवसेना के सिर्फ 40 एमएलए हैं और सीएम समेत 10 को मंत्री पद मिला हुआ है।
एनसीपी के भी 9 विधायक मंत्री बने
रविवार को इस सत्ताधारी गठबंधन में एनसीपी के अजित पवार की भी डिप्टी सीएम के तौर पर एंट्री हुई है। उनके पास भी दावे के मुताबिक लगभग शिंदे सेना जितने ही विधायक हैं। लेकिन, उनकी पार्टी को भी उपमुख्यमंत्री समेत 9 मंत्री पद मिला है। मतलब साफ है कि भाजपा छाती पर पत्थर रखकर ऐसी सरकार चलाने को मजबूर है, जिसमें सबसे बड़ी दावेदार होकर भी वह अपनी से आधी से भी छोटी पार्टियों जितना ही हिस्सेदारी ले पाई है।
कार्यकर्ताओं से त्याग क्यों चाहती है बीजेपी?
पार्टी के एक पदाधिकारी के मुताबिक पिछले साल देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र कार्यकारिणी की बैठक में कार्यकर्ताओं से कहा था कि त्याग करने के लिए तैयार रहें। तब राज्य के डिप्टी सीएम ने कहा था,'यह ट्वेंटी-ट्वेंटी सरकार है, लेकिन लोगों की उम्मीदों पर उतरने के लिए बहुत ज्यादा काम करना है। इसलिए पार्टी कार्यकर्ताओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हें क्या मिलेगा। जब मुझे क्या मिलेगा से बाहर निकल जाएंगे तो जनता आपको और देगी। अगर पार्टी कार्यकर्ता यह सोचेंगे कि उन्हें क्या मिलेगा तो उनके कार्य करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।'
2024 है बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक विश्लेषक बिरजू मुंद्रा का कहना है कि बीजेपी में कई तीन से चार बार के विधायक हैं। वे 2014 से ही मंत्री बनने के इंतजार में हैं। लेकिन, अब राज्य का राजनीतिक समीकरण बदल गया है। उनके अनुसार, 'इसे ये सुनिश्चित करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है कि महा विकास अघाड़ी 2024 तक एक मजबूत ताकत के रूप में बरकरार न रह पाए, जो यह बन गया था।' संभवत: इसी वजह से वहां कैबिनेट विस्तार को भी लगातार टाला जा रहा था।
बिहार की भरपाई की रणनीति!
असल में महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं। यह यूपी की 80 सीटों के बाद सबसे अधिक है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा इस बार यहां कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। क्योंकि, बिहार में नीतीश कुमार पहले ही पलटी मारकर इसे दबाव में ला चुके हैं, जहां 2019 में एनडीए को 40 में से 39 सीटें मिली थीं। कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी बीजेपी अधिकतम सीटें जीती थी।
तो ये है बीजेपी की असल मजबूरी?
दरअसल, कुछ रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में एमवीए गठबंधन का अच्छा प्रभाव देखा जा रहा था। इसलिए बीजेपी नेतृत्व हर हाल में महाराष्ट्र में अपनी स्थिति को और भी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है। क्योंकि, बिहार या कर्नाटक जैसे राज्यों में थोड़ा-बहुत भी डैमेज हुआ तो महाराष्ट्र में उसे कंट्रोल किया जा सकता है। यही मजबूरी है कि शायद राज्य में भाजपा को अपने समर्पित एमएलए से समर्पित होकर कार्य करने की उम्मीद है, क्योंकि असल लड़ाई तो 2024 में पहले लोकसभा और फिर महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में होनी है।












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