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Pune Land Deal: पार्थ पवार का नाम FIR से बाहर क्यों? विपक्ष ने लगाया 'BJP-NCP' के मिलीभगत का आरोप

Pune Land Deal Row: महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों पुणे की ₹300 करोड़ की मुंधवा लैंड डील ने भूचाल ला दिया है। मामला सिर्फ जमीन के कागज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में हलचल मचा रहा है, क्योंकि इस विवाद के केंद्र में हैं डिप्टी सीएम अजित पवार के बेटे पार्थ पवार।

बताया जा रहा है कि पार्थ की कंपनी Amadea Enterprises LLP ने यह विवादित जमीन खरीदी, जिसमें उनका 99% हिस्सा है। हैरानी की बात यह है कि इस कंपनी के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज हुईं, लेकिन पार्थ पवार का नाम इनमें कहीं नहीं है।

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सवाल उठ रहे हैं आखिर क्यों नहीं जोड़ा गया उनका नाम, जब वही कंपनी के मुख्य मालिक हैं? मामला अब सियासी तूफान में बदल चुका है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद पुणे के मुंधवा इलाके में 40 एकड़ जमीन के ट्रांसफर से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि इस जमीन में 272 छोटे-छोटे प्लॉट शामिल हैं। जमीन को 19 मई 2025 को अमाडिया एंटरप्राइजेज एलएलपी (Amadea Enterprises LLP) नामक कंपनी को बेचा गया, जिसमें पार्थ पवार के पास 99% हिस्सेदारी है और उनके बिजनेस पार्टनर दिग्विजय पाटिल के पास 1% शेयर है। जमीन की बाजार कीमत करीब ₹1,800 करोड़ बताई जा रही है, जबकि कागजों में इसे ₹300 करोड़ में बेच दिया गया। इतना ही नहीं, इस पर लगने वाली ₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी भी माफ कर दी गई।

FIR में किनके नाम हैं?

इस केस में दो एफआईआर दर्ज की गई हैं। इनमें शामिल हैं दिग्विजय पाटिल (अमाडिया एंटरप्राइजेज में 1% हिस्सेदार), शीटल तेजवानी, जो जमीन के असली मालिकों (272 व्यक्तियों) का पावर ऑफ अटॉर्नी धारक था। इसके अलावा और दो राजस्व अधिकारी रविंद्र तारू, उप-पंजीयक (Sub-Registrar), जिन पर आरोप है कि उन्होंने बिना स्टांप ड्यूटी वसूले दस्तावेज पंजीकृत किए। सूर्यकांत येवले, तहसीलदार (Pune City Tehsildar), जिन्होंने अवैध आदेश जारी कर निजी पक्षों को स्वामित्व अधिकार दिलाए। एफआईआर में पार्थ पवार का नाम नहीं है क्योंकि, सरकार के अनुसार, "सिर्फ उन्हीं को नामजद किया गया है जिन्होंने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे।"

CM फडणवीस का बयान - "कोई नहीं बचेगा"

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर में मीडिया से कहा, "जो लोग यह भी नहीं समझते कि एफआईआर क्या होती है, वही बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। जब एफआईआर दर्ज होती है, तो उसमें केवल उन्हीं को नामजद किया जाता है जो दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हैं या सीधे तौर पर संलिप्त होते हैं। अगर जांच में नए नाम सामने आते हैं, तो उन पर भी कार्रवाई होगी।"

उन्होंने आगे कहा किसी को भी छोड़ा नहीं गया है। जांच रिपोर्ट आने के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। फडणवीस ने यह भी कहा कि एफआईआर में कंपनी और उसके अधिकृत सिग्नेचरियों को शामिल किया गया है।

अजित पवार ने किया बचाव

डिप्टी सीएम अजित पवार ने अपने बेटे का बचाव करते हुए कहा कि पार्थ पवार का नाम इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि उन्होंने किसी भी पंजीकरण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। पवार ने कहा कि पार्थ को इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि जिस जमीन की डील हो रही है, वह अवैध है। जब पूरी सच्चाई सामने आई तो हमने डील रद्द कर दी।

क्या है 'महार वतन भूमि'?

मामले के केंद्र में जिस जमीन का जिक्र है, वह 'महार वतन भूमि' है। यह ऐसी जमीन होती है जो पहले महार समुदाय (अनुसूचित जाति) को गांव की सेवाओं के बदले दी जाती थी। आज़ादी के बाद इस व्यवस्था को भेदभावपूर्ण माना गया और समाप्त कर दिया गया। इसके बाद ऐसी जमीनें सरकारी स्वामित्व में आ गईं और उन्हें बिना सरकारी अनुमति के बेचा या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

घोटाला कैसे सामने आया?

मामला उस समय खुला जब पुणे के सामाजिक कार्यकर्ता दीनकर कोटकर ने 5 जून 2025 को रजिस्ट्रेशन विभाग के महानिरीक्षक (IGR) को शिकायत दी। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टांप ड्यूटी में ₹21 करोड़ की छूट देकर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। IGR कार्यालय ने शिकायत मिलने के बाद जांच शुरू की। जांच में यह सामने आया कि जमीन के रिकॉर्ड में गैरकानूनी बदलाव किए गए थे, जबकि यह जमीन मूलतः सरकारी थी। इसके बाद उप जिला पंजीयक संतोष अशोक हिंगाने ने आपराधिक शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर 6 नवंबर 2025 को दो एफआईआर दर्ज हुईं।

विपक्ष का आरोप - "ऊपर तक मिलीभगत"

शिवसेना (UBT) और कांग्रेस ने इस मामले को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि"₹1,800 करोड़ की जमीन को ₹300 करोड़ में बेचा गया और ₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी माफ कर दी गई - यह सब ऊपर से मिलीभगत के बिना संभव नहीं।"

विपक्ष का यह भी आरोप है कि एफआईआर से पार्थ पवार का नाम जानबूझकर हटाया गया ताकि उन्हें राजनीतिक सुरक्षा दी जा सके। मुंधवा लैंड डील केस अब महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है - क्या पार्थ पवार का नाम भी इसमें शामिल होता है, या यह मामला केवल 'दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने वालों' तक ही सीमित रह जाता है।

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