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Mumbai Local Train: क्‍या मुंबई लोकल ट्रेन में गेट लगाना ही काफी होगा? ये हैं बड़ी चुनौतियां

Mumbai Local Train: मुंबई की लोकल ट्रेनें शहर की लाइफ लाइन मानी जाती हैं। रोजाना लाखों लोग इन ट्रेनों से यात्रा करते हैं। मुंबई के लोगों के लिए लोकल ट्रेनें सिर्फ एक परिवहन का साधन नहीं हैं, बल्कि उनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इनमें सफर करने वाले यात्रियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

9 जून की सुबह ठाणे के दिवा और मुंब्रा (कोपर क्षेत्र) के बीच सेंट्रल रेलवे लाइन पर दो अत्यधिक भीड़ वाली लोकल ट्रेनें खतरनाक रूप से करीब आ गईं। फुटबोर्ड पर लटके या खुले दरवाजों के पास खड़े कुछ यात्री ट्रेनों के स्‍पीड से पास आने पर हिल गए, जिससे कम से कम आठ लोग ट्रैक पर गिर गए और चार यात्रियों की मौत हो गई। ये ट्रैक ऐसा है जहां ट्रेनें अक्सर एक-दूसरे को करीब से पार करती हैं और दरवाजे पर लटके लोगों को खतरा होता है। ये जानने के बावजूद यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर यात्रा करने के लिए मजबूर हैं।

Mumbai Local Train

बता दें इस घटना के बाद महाराष्‍ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार और रेलवे ने अब गैर-एसी कम्यूटर ट्रेनों में सुरक्षा बढ़ाने के लिए गेट लगाने का फैसला किया है, साथ ही यह सुनिश्चित किया है कि सवारी भरी न हो। लेकिन मुंबई की लोकल ट्रेनों को अपने यात्रियों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए, केवल ट्रेनों में गेट लगाने से ही समस्‍या का समाधान नहीं होगा, कई अन्‍य चुनौतियां और समस्‍याएं हैं जिसको हल करना बेहद जरूरी है।

ट्रेनों में क्षमता से अधिक यात्री

मुंबई की सेंट्रल और वेस्टर्न लाइनों की लोकल ट्रेनें पीक आवर्स के दौरान अपनी क्षमता से तीन गुना अधिक यात्रियों को लेकर सफर तय करती हैं। यदि किसी लोकल ट्रेन की क्षमता लगभग 1,500 लोगों की है, तो यह व्यस्त समय में आमतौर पर दोगुनी संख्या में यात्रियों को लेकर चलती है। ट्रेनों में पीक-ऑवर में यात्रियों की भीड़ को कम करने के लिए ब्रैकेट के भीतर ट्रेनों की संख्‍या रेलवे बढ़ा सकता है लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं किया जाना संभव नहीं है क्‍योंकि इसके लिए ट्रैक उपलब्ध नहीं है।

यात्रियों की संख्‍या को प्रतिबंधित कर पाना है असंभव?

ट्रेन में चढ़ने वाले लोगों की संख्या को शारीरिक रूप से प्रतिबंधित करना भी लगभग असंभव है। पहले ये प्रयास असफल रहा है। इसकी वजह है कि किसी को भी टिकट से वंचित नहीं किया जा सकता है और दैनिक यात्रियों के पास आमतौर पर मासिक पास होते हैं।

रेलवे कॉरिडोर प्रोजेक्ट

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एक दशक पहले रेलवे ने पश्चिमी लाइन पर लोकल ट्रेन मार्ग के साथ एक और रेल कॉरिडोर का विचार रखा था। जिसमें चर्चगेट से विरार तक, 63 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए, कुछ हिस्सों को ऊपर, कुछ को अंडरग्राउंड और कुछ ऊपर ट्रैक बनाने की प्‍लानिंग की गई थी। अनुमानित राइडरशिप (यात्रियों की संख्‍या) लगभग 1.68 मिलियन प्रति दिन आंकी गई थी। यह मौजूदा लोकल ट्रेनों से एक बहुत बड़ा भार है जो प्रतिदिन 7 मिलियन से अधिक लोगों को ले जाती हैं।

इन वजहों से ठंडे बस्‍ते में बंद हो गया ये प्रोजेक्ट

नए रेल कॉरिडोर की लागत लगभग 21,000 करोड़ रुपये आंकी गई थी लेकिन जैसा कि अक्सर हमारे देश में होता है राज्य और केंद्र इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि प्रोजेक्‍ट को शुरू करने के लिए इस बात की भी चिंता थी कि किसे कितना और क्यों भुगतान करना होगा? कितनी जमीन की जरूरत होगी और कहां और कैसे उसका मूल्यांकन किया जाए? इन सभी बहसों के बीच प्रोजेक्‍ट को वैचारिक बहस के बाद ही छोड़ दिया गया और मुंबई को अपने लोकल ट्रेन नेटवर्क को अपग्रेड करने का मौका भी रेलवे ने गंवा दिया गया। जिस कारण समस्‍या जस की तस है।

क्या होगा समाधान?

मुंबई की मेट्रो रेल सिस्‍टम, जिसे यात्रियों को अधिक बेहतर और तेज मास ट्रांजिट अनुभव देने के लिए डिजाइन किया गया है, में अनुमानित संख्या की तुलना में केवल आधी ही राइडरशिप देखी जा रही है। उम्मीद है कि पूरी 523 किलोमीटर लंबी नेटवर्क चालू होने के बाद यह शायद अधिक उपयोगी होगी ओर लोकल यात्रियों का सफर वाकई में सुहाना होगा।

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