Maharashtra: क्या शरद पवार की पार्टी टूटने की एक वजह कांग्रेस भी है ?
महाराष्ट्र में एनसीपी की टूट से विपक्षी एकता की मुहिम को झटका लगा है। चर्चा के मुताबिक इस टूट की एक वजह कांग्रेस भी है। एनसीपी के नेता कांग्रेस के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। उन्हें राहुल गांधी की लीडरशिप पर भरोसा नहीं था। महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं के बयान से भी एनसीपी का अजीत पवार गुट असहज था। एनसीपी में सुप्रिया सुले के बढ़ते कद से खुद अजीत पवार नाराज थे। वे मुनासिब वक्त का इंतजार कर रहे थे। जब एनसीपी के अधिकतर विधायक शिंदे-भाजपा के साथ जाने के लिए तैयार हो गये तो उन्होंने पार्टी को खंडित कर दिया।
कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को स्वभाविक भागीदार नहीं मानती
कांग्रेस का राज्यस्तरीय गठबंधन में भी क्षेत्रीय दलों के साथ विश्वासपूर्ण रिश्ता नहीं है। कांग्रेस परिस्थितियों से मजबूर हो कर क्षेत्रीय दलों के साथ गंठबंधन करती है। मौका मिलने पर वह घटक गलों को धमकी भी देने लगती है। अगस्त 2022 में विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के सवाल कांग्रेस और शिवसेना में झगड़ा हो गया था। तब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने कहा था, शिवसेना के साथ हमारा प्राकृतिक और स्वभाविक गठबंधन नहीं है। यह अलग परिस्थितियों में किया गया गठबंधन था। नेता प्रतिपक्ष का पद कांग्रेस को मिलना चाहिए था। शिवसेना ने कांग्रेस को ध्यान में रखे बिना फैसला लिया जो चिंता की बात है। कांग्रेस की यह धमकी परोक्ष रूप से एनसीपी के लिए भी थी। यानी राज्यस्तर के गठबंधन में भी क्षेत्रीय दल कंग्रेस को लेकर सशंकित रहते हैं। जब शिवसेना में टूट के बाद शिंदे-भाजपा की सरकार बनी थी उस समय भी एनसीपी का एक गुट इस सरकार में शामिल होना चाहता था। लेकिन उस समय बात नहीं बनी।

राजनीतिक उत्थान के लिए तोड़ दी पार्टी
मई 2023 में शरद पवार ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने का एलान किया था। इसके बाद जून महीने में उन्होंने अपनी बेटी सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को एनसीपी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। शरद पवार समर्थक सुप्रिया सुले को भावी मुख्यमंत्री के रूप में भी पेश करने लगे। तब शरद पवार के भतीजे अजीत पवार को अपना राजनीतिक भविष्य अंधकारमय लगने लगा। वे बगावत की कोशिश पहले भी कर चुके थे। लेकिन इस बार तीर निशाने पर मारा है।
खबरों के मुताबिक एनसीपी के 53 में 40 विधायक उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के साथ हैं। यानी इन पर दलबदल का नियम लागू नहीं होगा। दरअसल पार्टी को तोड़ कर राजनीति में आगे बढ़ना कोई शर्म की बात नहीं। बड़े बड़े नेता भी इसी राह पर चले हैं। इंदिरा गांधी, चरण सिंह, शरद पवार, लालू यादव, नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने अपने मूल दल को तोड़ कर ही अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी की है। इंदिरा गांधी ने अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए 1969 में मूल कांग्रेस को तोड़ दिया था। शरद पवार 1967 में पहली बार बारामती से कांग्रेस के विधायक चुने गये थे। 1969 में जब कांग्रेस में विभाजन हुआ तो शरद पवार इंदिरा गांधी के साथ थे। 1972 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला और उसकी सरकार बनी। शरद पवार 1975 से 1977 तक गृह राज्य मंत्री रहे।
शरद पवार- कभी इंदिरा गांधी का समर्थन तो कभी विरोध
1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की करारी हार हुई। उन्होंने राजनीति में दोबारा पांव जमाने के लिए जनवरी 1978 में फिर कांग्रेस तोड़ दी। इसके बाद कांग्रेस आई और काग्रेस यू का जन्म हुआ। यहां आई का मतलब इंदिरा और यू का मतलब अर्स था। एक धड़े का नेतृत्व इंदिरा गांधी कर रही थीं और दूसरे का देवराज अर्स। इस बार शरद पवार ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ कर देवराज अर्स का हाथ थाम लिया। मार्च 1978 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव हुआ। इस चुनाव में जनता पार्टी के मुकाबले कांग्रेस आई और कांग्रेस यू ने अलग अलग चुनाव लड़ा। किसी दल को बहुमत नहीं मिला।
मार्च 1978 में जनता पार्टी को 288 सीटों में से 99 पर जीत मिली और वह सबसे बड़ी पार्टी बनी। इस चुनाव में कांग्रेस यू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में चुनाव लड़ा था और उसे 69 सीटें मिलीं थीं। इंदिरा कांग्रेस को 62 सीटें मिली थीं और वह तीसरे स्थान पर रही थी। चुनाव तो कांग्रेस यू और कांग्रेस आई ने एक दूसरे के खिलाफ लड़ा था लेकिन सरकार बनाने के लिए दोनों ने गठबंधन कर लिया। वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने। शरद पवार उद्योग और श्रम मंत्री बने। वे कांग्रेस यू के विधायक थे।
मुख्यमंत्री बनने के लिए पवार ने पार्टी तोड़ दी थी
सरकार बनने के करीब तीन महीना (जुलाई 1978) बाद ही शरद पवार ने कांग्रेस यू को तोड़ दिया। अपने समर्थक विधायकों के साथ उन्होंने जनता पार्टी से हाथ मिला कर नयी सरकार बना ली। तोड़फोड़ के दम पर शरद पवार 38 साल की उम्र में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गये। डेढ़ साल तक वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। शरद पवार ने सत्ता के लिए कंग्रेस आइ और कांग्रेस यू को छोड़ने और तोड़ने में तनिक भी देर नहीं लगायी थी। जनवरी 1980 में जब इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं तो उन्होंने फरवरी में शरद पवार की सरकार बर्खास्त कर दी थी। फिर मौका देख कर वे 1987 में कांग्रेस में आ गये। यह साथ भी लंबा नहीं चला। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए उन्होंने 1999 में कांग्रेस छोड़ दी और अलग पार्टी बना ली- नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी। आज इस पार्टी पर कब्जा के लिए अजीत पवार और शरद पवार में में राजनीतिक संघर्ष शुरू हो चुका है। अगर पार्टी को तोड़ना धोखा है तो शरद पवार ये काम कई बार कर चुके हैं।Ajit












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