Maharashtra Chunav: OBC वोट के लिए BJP ने 175 सीटों पर बनाई कैसी खास रणनीति?
Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मराठा मुद्दे की वजह से कड़ी चुनौती मिल रही है। इसके लिए पार्टी ने अपने आजमाए हुए सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को नई धार देने की योजना पर काम शुरू कर दिया है, जिससे उसे अपने ओबीसी वोट बैंक में व्यापक विस्तार होने की उम्मीद है। बीजेपी इस बार सिर्फ ओबीसी की गिनी-चुनी बड़ी जातियों पर ही सीमित नहीं रह रही है, बल्कि छोटी-छोटी पिछड़ी जातियों पर भी पूरा फोकस कर रही है।
दरअसल, लोकसभा चुनावों के नतीजे देखने के बाद बीजेपी को अंदाजा लग गया है कि वह सिर्फ अपने महादेव (MADHAV) फॉर्मूले के भरोसे ही नहीं बैठ सकती है। शुरू में उसने इसी को फिर से सहेजने-समेटने की कोशिशें शुरू की थीं। महादेव शब्द तीन प्रमुख ओबीसी जातियों माली, धनगर और वंजारी के लिए इस्तेमाल की जाती है।

महादेव फॉर्मूले से आगे सभी ओबीसी जातियों पर फोकस
लेकिन, भाजपा ने महसूस किया है कि अब उसे महादेव फॉर्मूले से भी आगे निकलकर अपने ओबीसी जनाधार में विस्तार करने की जरूरत है। महाराष्ट्र में ओबीसी की कुल 341 जातियां और उपजातियां हैं। इनमें से कई छोटी-छोटी जातियां अलग-अलग सीटों पर इतनी तादाद में हैं, जो चुनाव परिणामों को उस सीट पर अकेले प्रभावित करने में सक्षम हैं। बीजेपी ने इसी हिसाब से हर सीट के हिसाब से इन छोटी-छोटी जातियों को भी जोड़ने पर काम किया है।
बीजेपी-महायुति ने 175 सीटों की खास पहचान
इसके लिए सत्ताधारी महायुति में शामिल बीजेपी ने 175 विधानसभा क्षेत्रों की पहचान की है और इनके लिए बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर बहुत ही विशाल ओबीसी वोट प्रबंधन का काम हाथ में लिया है। क्योंकि, पार्टी को लग रहा है कि सिर्फ बड़ी ओबीसी जातियों के भरोसे रहने में समझदारी नहीं है, इसलिए उन सभी छोटी-छोटी जातियों के बीच इलेक्शन मैनेजमेंट का काम हो, जो अपनी-अपनी सीटों पर बहुतायत में हैं।
ओबीसी वोट बैंक के लिए महायुति सरकार की पहल
बीजेपी के खिलाफ मराठा आरक्षण आंदोलनकारियों की एकजुटता को देखते हुए ही महायुति सरकार केंद्र सरकार को सात नई ओबीसी जातियों को केंद्रीय सूचि में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा है। इसके साथ ही ओबीसी जातियों के क्रीमी लेयर की सीलिंग भी 8 लाख से 12 लाख रुपए सालाना करने की सिफारिश की है।
'विधानसभा चुनावों में जाति फैक्टर प्रमुख मुद्दा'
भाजपा ओबीसी मंच के अध्यक्ष प्रकाश शेंडगे ने कहा है, 'ओबीसी कोटे के अंदर मराठा आरक्षण की जारांगे पाटिल की मांग ने ओबीसी के अंदर बहुत ज्यादा बेचैनी पैदा की है। विधानसभा चुनावों में जाति फैक्टर प्रमुख मुद्दा होगा। ओबीसी न तो मराठा को वोट देंगे और न ही वे ओबीसी को। जारांगे-पाटिल बीजेपी के खिलाफ रणनीति बनाकर काम कर रहे हैं, यह तो साफ है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र जातिगत संरचना के आधार पर ही फैसला लेगा।'
एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर के प्रभावी रहने की संभावना नहीं
जहां तक एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर की बात है तो महाराष्ट्र में यह इस बार गायब लग रहा है। क्योंकि, 2022 से अगर महायुति गठबंधन की सरकार है तो 2019 से लेकर 2022 तक तो महा विकास अघाड़ी (MVA) की ही सरकार थी। इसलिए कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एससीपी) के लिए एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी की महायुति सरकार के खिलाफ भुना पाना आसान नहीं है।
मराठा बनाम ओबीसी ध्रुवीकरण से ही तय होगा चुनाव!
तथ्य यह है कि गांवों से लेकर तालुकाओं तक में मराठा आरक्षण की मांग और उसे ओबीसी कोटे से देने के विरोध ने दोनों वोट बैंक में बहुत ही ज्यादा ध्रुवीकरण कर दिया है। अब यह दोनों ही गठबंधनों पर निर्भर है कि वह इस जातिगत गोलबंदी को अपने पक्ष में किस हद तक भुनाने में सफल हो पाते हैं।
वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, 'मराठाओं और ओबीसी के बीच ध्रुवीकरण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, इससे महाराष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने पर खराब असर पड़ रहा है। प्रदेश की राजनीति मराठा बनाम ओबीसी के बीच गोलबंदी से संचालित और निर्धारित होती है।'
उनका कहना है, '2019 के विधानसभा चुनावों में 288 में से 160 से ज्यादा मराठा एमएलए बने थे। 2024 के लोकसभा चुनावों में 48 सांसदों में से मराठाओं की संख्या 30 से अधिक है। राज्य की राजनीति में मुख्यधारा के दलों में मराठाओं का वर्चस्व स्पष्ट तौर पर दिखता है।'
बीजेपी के लिए इस चुनौती से निपटना मुश्किल
हालांकि, ओबीसी जातियों की संख्या इतनी ज्यादा है और ये इतने छोटे-छोटे हिस्से में बिखरे हुए हैं कि उन सबको एक मुद्दे के लिए एकजुट करना बीजेपी के लिए बहुत आसान साबित नहीं होने वाला। दूसरी तरफ विपक्षी महा विकास अघाड़ी भी अलग-अलग क्षेत्रों में ओबीसी जातियों पर डोरे डालने की कोशिशों में जुटी हुई है।
मसलन, विदर्भ का उदाहरण ले सकते हैं। यहां 62 विधानसभा सीटें हैं। इस क्षेत्र में मराठा कोई फैक्टर नहीं है। इसलिए, दोनों ही गठबंधनों का लक्ष्य ओबीसी वोट बैंक ही है। प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले की अगुवाई वाली कांग्रेस कुनभी-दलित-मुस्लिम वोट बैंक से उम्मीद लगाए बैठी है। वहीं बीजेपी तेली, वनजारी, पवार, भोयर, कोमती, सोनार और गोंड समेत दो दर्जन ओबीसी जातियों में पहुंच बनाने की कोशिश में है।












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