Arun Gawli vs Dawood Ibrahim: डॉन ‘Daddy’ ने क्यों बनाया था दाऊद की बहन को बेवा? फिर हो गई थी ठनी, कांपी मुंबई
Arun Gawli Vs Dawood Ibrahim: मुंबई की गलियों में एक दौर था जब 'डैडी' अरुण गवली का नाम सुनकर बड़े-बड़े गैंगस्टर के पसीने छूट जाते थे। दगड़ी चॉल का ये 'अभेद्य किला' न सिर्फ अंडरवर्ल्ड का गढ़ था, बल्कि वो जगह थी जहां दाऊद इब्राहिम जैसे डॉन को चुनौती देने का हौसला पैदा हुआ। लेकिन इस कहानी का सबसे सनसनीखेज मोड़ तब आया, जब गवली गैंग ने दाऊद की बहन हसीना पारकर के पति इब्राहिम पारकर की हत्या कर दी।
इस खूनी वारदात ने मुंबई को हिलाकर रख दिया और गवली-दाऊद की दुश्मनी को चरम पर पहुंचा दिया। 4 सितंबर 2025 को जब अरुण गवली 17 साल की सजा के बाद जेल से रिहा होकर दगड़ी चॉल लौटे, तो उनकी वापसी ने फिर से पुरानी यादें ताजा कर दीं। आइए, इस खतरनाक गैंगवॉर को करीब से जानते हैं...

Haseena Parkar Husband Murder- इब्राहिम पारकर की हत्या: दाऊद की बहन को बेवा बनाने की साजिश
1992 में मुंबई के नागपाड़ा इलाके में एक सनसनीखेज वारदात हुई। दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर (Dawood Ibrahim Sister Husband Murder)के पति इब्राहिम पारकर की गवली गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस हत्या में गवली गैंग के चार गुर्गों - श्रेलेश हडलनकर, बिपिन शेरे, और दो अन्य - का नाम सामने आया। इब्राहिम की हत्या का कारण था दाऊद और गवली के बीच बढ़ता तनाव। दरअसल, गवली ने दाऊद के दबदबे को चुनौती दी थी और मुंबई के अंडरवर्ल्ड में अपनी अलग सत्ता कायम की थी। इस हत्या ने दाऊद को गहरी चोट पहुंचाई, क्योंकि हसीना पारकर दाऊद की सबसे करीबी बहन थीं और उनके कारोबार में अहम भूमिका निभाती थीं।
इस हत्या ने दोनों गैंग्स के बीच खूनी जंग को और भड़का दिया। 1992 का जेजे हॉस्पिटल शूटआउट इसका सबसे बड़ा सबूत है, जहां गवली गैंग ने दाऊद के गुर्गों पर ताबड़तोड़ फायरिंग की। इस वारदात ने मुंबई को हिलाकर रख दिया और पुलिस को भी हाई अलर्ट पर ला दिया।
Arun Gawli Dawood Ibrahim Gang War Story: कैसे शुरू हुई गवली-दाऊद की दुश्मनी?
1970 के दशक में अरुण गवली ने बायकुला कंपनी के साथ अंडरवर्ल्ड में कदम रखा। शुरू में वो दाऊद इब्राहिम के लिए काम करते थे, जो उस वक्त मुंबई के सबसे बड़े डॉन थे। लेकिन 1988 में गवली के करीबी दोस्त और गैंग मेंबर रामा नाइक की हत्या ने सब कुछ बदल दिया। गवली ने इस हत्या का इल्जाम दाऊद पर लगाया और उससे अलग हो गए। गवली ने दगड़ी चॉल को अपने साम्राज्य का गढ़ बनाया और BRA (बाबू रेशम-अरुण गवली) गैंग की नींव रखी।
गवली ने न सिर्फ दाऊद के मटका और सट्टा कारोबार को चुनौती दी, बल्कि पारसनाथ पांडे जैसे मटका किंग की हत्या कर अपनी ताकत दिखाई। इसके बाद वो गरीबों की मदद कर 'रॉबिनहुड' बन गया, जिससे दाऊद की मुंबई में बादशाहत को खतरा होने लगा। इब्राहिम पारकर की हत्या उसी जंग का हिस्सा थी, जिसने दाऊद को व्यक्तिगत तौर पर आहत किया।
Dagdi Chawl- दगड़ी चॉल: गवली का अभेद्य किला
दगड़ी चॉल सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि गवली का किला थी, जहां उनका हर आदेश कानून माना जाता था। 1980 के दशक में गवली ने इसे अपने गैंग का हेडक्वार्टर बनाया। यहां से वो हफ्ता वसूली, सट्टा, और स्मगलिंग का धंधा चलाते थे। लेकिन साथ ही वो गरीबों को मुफ्त राशन, स्कूल फीस, और मेडिकल मदद देकर जनता का दिल भी जीतते थे। यही वजह थी कि दाऊद के मुकाबले गवली को स्थानीय लोगों का ज्यादा समर्थन मिला।
दाऊद ने भी गवली को खत्म करने की कई कोशिशें कीं। 1990 में गवली के भाई किशोर की हत्या दाऊद गैंग का काम मानी गई। इसके जवाब में गवली ने इब्राहिम पारकर की हत्या कर दाऊद को करारा जवाब दिया। इस जंग में छोटा राजन और रवि पुजारी जैसे अन्य गैंगस्टर भी शामिल हो गए, जिससे मुंबई की सड़कें खून से लाल हो गईं।
आशा गवली: 'Mummy' का साथ
इस खूनी जंग में गवली की सबसे बड़ी ताकत थीं उनकी पत्नी आशा गवली, जिनका असली नाम जुबैदा मुजावर था। बायकुला की गलियों में अरुण और जुबैदा की नजरें मिलीं, और प्यार की शुरुआत हुई। लेकिन जुबैदा का मुस्लिम परिवार और गवली गैंग के सीनियर मेंबर्स (रामा नाइक और बाबू रेशम) इस रिश्ते के खिलाफ थे। फिर भी, गवली ने हार नहीं मानी। दोनों ने भागकर शादी कर ली, और जुबैदा ने हिंदू धर्म अपनाकर नाम बदल लिया।
आशा सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि गवली की सबसे बड़ी सहयोगी बनीं। जब 1984 में गवली को जेल हुई, तब आशा ने गैंग की कमान संभाली। वो पुलिस की गाड़ियों का पीछा करती थीं, ताकि गवली को 'एनकाउंटर' में न मारा जाए। दगड़ी चॉल में उन्हें 'मम्मी' का खिताब मिला, और उनका हर फैसला कानून बनता था। 2004 में आशा ने गवली के विधायक चुनाव में प्रचार की कमान संभाली, और उनकी बेटी गीता गवली ने भी BMC पार्षद बनकर परिवार की सियासी विरासत को आगे बढ़ाया।
Don Daddy Return- 17 साल बाद 'डैडी' की वापसी
4 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरुण गवली को 2007 के एक हत्या मामले में जमानत दी। 17 साल बाद जब वो दगड़ी चॉल लौटे, तो समर्थकों ने गुलाब की पंखुड़ियां बरसाकर उनका स्वागत किया। लेकिन उनकी रिहाई ने पुरानी यादें ताजा कर दीं। क्या गवली की वापसी से अंडरवर्ल्ड फिर सक्रिय होगा? या ये सिर्फ अतीत की गूंज है?
अरुण गवली और दाऊद इब्राहिम की दुश्मनी मुंबई के अंडरवर्ल्ड की सबसे खतरनाक जंग थी। इब्राहिम पारकर की हत्या ने दाऊद को गहरी चोट दी, और गवली ने दगड़ी चॉल को अपने किले में बदलकर दाऊद को खुली चुनौती दी। इस जंग में आशा गवली उनकी चट्टान बनीं। 2025 में गवली की रिहाई ने फिर से सवाल उठा दिए - क्या 'डैडी' का दौर लौटेगा? या ये सिर्फ इतिहास की कहानी है? आप क्या सोचते हैं? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं....
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