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Ajit Pawar plane crash: DGCA जांच रिपोर्ट से पहले आपराधिक केस संभव क्‍यों नहीं? क्‍या है बड़ी वजह

Ajit Pawar plane crash: महाराष्‍ट्र के पूर्व उपमुख्‍यमंत्री अजित पवार के विमान दुर्घटना मामले ने महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मचाई है। विधायक रोहित पवार ने इस पर VSR वेंचर्स और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पी. के. जैन ने इस मांग पर अपनी राय दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस को किसी भी संस्था के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच का अधिकार है, पर ठोस 'सबूत' अनिवार्य है। "जब तक डीजीसीए की जांच रिपोर्ट में लापरवाही या जानबूझकर कार्रवाई सामने नहीं आती, तब तक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।

Ajit Pawar plane crash

DGCA रिपोर्ट से पहले आपराधिक केस संभव क्‍यों नहीं?

पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पी. के. जैन ने एबीपी न्‍यूज का दिए इंटरव्‍यू में बताया "डीजीसीए द्वारा कर्तव्य पूरा न करने पर भी, केवल इसी आधार पर मुकदमा संभव नहीं। प्रारंभिक जांच जरूरी है। व्यवस्था में कमी होने पर अनुशासनात्मक या विभागीय कार्रवाई हो सकती है, सीधे आपराधिक मामला नहीं। आपराधिक संलिप्तता के अभाव में एफआईआर ठीक नहीं।"

क्‍या है आखिर वजह?

उन्होंने उदाहरण दिए डीजीसीए रिपोर्ट के बिना लापरवाही या जानबूझकर गलती स्थापित नहीं होती। अहमदाबाद विमान हादसे में सैकड़ों लोग मरे, पर वहां कोई एफआईआर नहीं हुई। हालिया एयर एम्बुलेंस दुर्घटना में भी मामला दर्ज नहीं हुआ। जैन ने इन मांगों को "केवल राजनीतिक" करार दिया।

रोहित पवार के आरोप क्‍या सच्‍चे हैं?

जैन ने कहा कि भारत में विमानन क्षेत्र अत्यधिक विनियमित है; यहां हर चीज़ की गहन पड़ताल के बाद ही अनुमति मिलती है। विमान के रखरखाव या पंजीकरण से जुड़े दावे भी फिलहाल अनुचित हैं। विमान के पास वैध परमिट था और पायलट अनुभवी थे इसलिए अवैध संचालन का दावा गलत है।

जैन ने कहा 'लाइफस्पैन' समाप्त होने की बात भी डीजीसीए जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, न कि व्यक्तिगत राय से।लाइफस्पैन खत्म होने पर भी विमान के पास परमिट तो था ही। प्रथम दृष्टया, यह एक दुर्घटना है, और वर्तमान में कोई आपराधिक प्रमाण नहीं मिलते। किस आधार पर ऐसी एफआईआर की मांग हो रही, यह समझना मुश्किल है।

पी. के. जैन ने अंत में सलाह दी कि यदि विधायक रोहित पवार फिर भी एफआईआर दर्ज कराना चाहते हैं, तो अदालत का दरवाजा खटखटाना ही अगला संभव विकल्प है।

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