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बाढ़ राहत में तेजी: सिंधिया ने दिए एयरलिफ्ट ऑपरेशन के निर्देश, लेकिन सवाल ये है कि ऐसे हालात बने क्यों? जानिए

MP News: बीते कुछ दिनों से मध्य प्रदेश के गुना संसदीय क्षेत्र में आसमान कुछ ज़्यादा ही मेहरबान हो गया है - या यूं कहिए कि बेकाबू हो गया है। लगातार बारिश और उससे उपजी बाढ़ ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है।

सैकड़ों गांव जलमग्न हो चुके हैं, पुल-पुलियाएं बह गई हैं, रास्ते टूट गए हैं और लोग छतों पर शरण लेने को मजबूर हैं। ऐसे में केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन ने कमान संभाली है और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुद राहत कार्यों की मॉनिटरिंग शुरू कर दी है।

Speed up Guna Ashoknagar flood relief Jyotiraditya Scindia gave instructions for airlift operation

सिंधिया ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर दिए निर्देश, एयरलिफ्ट ऑपरेशन में तेजी

मंगलवार शाम को सिंधिया ने अशोकनगर, गुना और शिवपुरी जिलों के कलेक्टरों और आला अफसरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की। इसमें उन्होंने हालात की गंभीरता को देखते हुए भारतीय वायुसेना की मदद लेने के निर्देश दिए। खासतौर पर शिवपुरी जिले के बदरवास और कोलारस इलाके में हालात ज्यादा खराब हैं, जहां कुछ गांवों में लोग पूरी तरह से फंसे हुए हैं।

सिंधिया ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात की और एयर वाइस मार्शल विक्रम गौड़ और एओसी मनीष शर्मा से तत्काल समन्वय कर बचाव ऑपरेशन तेज़ करने को कहा। इसके बाद वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने रातभर ऑपरेशन चलाया, लोगों को सुरक्षित निकाला गया और खाने-पीने की सामग्री गिराई गई।

युद्धस्तर पर चला रेस्क्यू अभियान, पशुधन भी सुरक्षित

गुना, अशोकनगर और शिवपुरी जिले के कई गांवों में प्रशासन, होमगार्ड, पुलिस और स्थानीय रेस्क्यू टीमों ने जान जोखिम में डालकर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए। कई इलाकों में नावों से ग्रामीणों को निकाला गया। सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि मवेशियों को भी सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

सिंधिया बोले- "हर पीड़ित मेरा परिवार है"

केंद्रीय मंत्री सिंधिया ने बयान में कहा, "बाढ़ से प्रभावित हर व्यक्ति मेरे लिए परिवार का सदस्य है। मैं सांसद के तौर पर नहीं, एक जिम्मेदार परिवारजन की तरह आप सभी के साथ खड़ा हूं।" उन्होंने प्रशासन से कहा कि कहीं कोई कोताही न हो, हर पीड़ित तक खाना, पानी और दवा पहुँचना चाहिए।

लेकिन बड़ा सवाल: ऐसे हालात बने ही क्यों?

बाढ़ राहत के प्रयासों की सराहना तो हो रही है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ये हालात केवल 'कुदरत की मार' हैं, या इंसानी लापरवाही की भी भूमिका है? पिछले वर्षों से चेतावनी दी जाती रही है कि अंधाधुंध रेत खनन और नालों की सफाई न होने से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। कई क्षेत्रों में जल निकासी के पारंपरिक रास्ते या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं या फिर पूरी तरह जाम हैं। सिंध जैसी नदियां जो पहले गांवों को जीवन देती थीं, अब बाढ़ का रास्ता बन गई हैं।

स्थानीय लोगों की नाराजगी भी सतह पर

लिथोरा और म्याना क्षेत्र में कई ग्रामीणों का कहना है कि पिछले साल भी ऐसे हालात बने थे, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। ग्रामीण रामलाल ने बताया, "हर साल बाढ़ आती है, सरकार नाव भेज देती है। लेकिन न सड़क बनती है, न पुल। हम फिर डूबते हैं।"

राहत में कोई कसर नहीं, पर नीति में सुधार की जरूरत

केंद्र और राज्य सरकार इस वक्त राहत और बचाव में कोई कसर नहीं छोड़ रही, यह बात स्पष्ट है। खुद सिंधिया जैसे बड़े नेता की सक्रिय भागीदारी से सिस्टम में तेजी आई है। लेकिन इस आपदा ने यह भी साबित कर दिया कि विकास और योजनाएं सिर्फ फाइलों में नहीं, जमीन पर नजर आनी चाहिए।

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