MP Chunav 2023: चारों खाने चित करने इन 'महाबलियों की अग्निपरीक्षा', दांव पर साख, कितनी सीटों से भरेगी झोली?

MP Chunav 2023: लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव के शुभकाल की घड़ी में अब हफ्ते-महीने नहीं बल्कि कुछ घंटों के दो दिन बचे हैं। मध्य प्रदेश के सियासी इतिहास में इस बार जैसा चुनावी माहौल पहले कभी देखने नहीं मिला। अब तक हुए चुनाव में सूबे म बीजेपी-कांग्रेस की ही तूती बोली और अन्य दलों में सिर्फ रस्म अदा करते आए।

राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले बीजेपी के अमित शाह की फिरकी फिर जिस भरोसे से उम्मीदवार मैदान में उतारे गए, उससे तिहरी साख दांव पर हैं। जबाव में कांग्रेस, बीजेपी की रणनीति को परखते हुए सबसे आखिरी में उम्मीदवारों के पत्ते खोलने मजबूर हुई। कौन कितने नफा-नुकसान के साथ कैसे और कहां खड़ा हैं, इसका फैसला 17 नवंबर को EVM में बंद हो जाएगा।

फिलहाल वोटिंग के पहले यह जानना जरुरी है कि बीजेपी-कांग्रेस के कितने सियासी महाबली खुद अपने घर को बचा पाएंगे? पिछली बार महज 15 महीने सत्ता का सुख भोगने के बाद औंधी गिरी कांग्रेस के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं हैं। बीजेपी के लिए जरुर डबल टास्क हैं। एक तो आगे भी सत्ता बरकरार रखना, फिर इस चुनाव में लिए गए सरप्राइजिंग फैसलों को अंजाम तक पहुंचे। क्योकि यहां से खिंचने वाली लाइन ही मिशन 2024 में बड़ी करने में मदद करेगी। जीतने की चुनौती ही है कि बीजेपी को अपने मौजूदा तीन केन्द्रीय मंत्री और चार सांसदों को तक उतारना पड़े।

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महाकोशल-विंध्य-बुंदेलखंड
एमपी की के दरवाजे महाकोशल से ही खुलते आए हैं। इस नींव को मजबूत करने में विंध्य और बुन्देलखंड का हमेशा सहारा रहा। 2018 में जब सत्ता बीजेपी के हाथ से फिसली तो इसी अंचल ने पार्टी के मंसूबों पर पानी फेरा था। इसी को भांपते हुए बीजेपी के धुरंधर मंत्री और सांसदों में में से दो मंत्री इन्ही क्षेत्रों से चुनाव मैदान में हैं। नर्मदा भक्त केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल, अपने भाई की जगह नरसिंहपुर तो फग्गन सिंह कुलस्ते गृह क्षेत्र मंडला में ताकतवर प्रत्याशी हैं। चार बार के सांसद राकेश सिंह, सीधी में रीती पाठक, गाडरवारा में उदय प्रताप सिंह हैं। इन सभी के सामने कांग्रेस के चेहरों ने पूरी ताकत झोंकी है, जो बाजी अपने नाम करने का माद्दा रखते आए। चौतरफा घिरे कांग्रेस के सबसे मजबूत किले कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा में कमलनाथ की खुद प्रतिष्ठा दांव पर है।

मालवा-निमाड़-चंबल-भोपाल
इंदौर में एक सीट से बीजेपी के दिग्गज नेता और राष्ट्रीय महसचिव कैलाश विजयवर्गीय है। इनके कंधो पर सिर्फ उनकी ही सीट नहीं, बल्कि मालवा-निमाड़ की 66 सीटों की जिम्मेदारी हैं। 2018 के चुनाव में बीजेपी यहां 28 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। जबकि 2013 में बीजेपी ने कांग्रेस की नाक में दम कर दिया और सिर्फ 9 सीट ही जीतने दी। लिहाजा इस चुनाव में बीजेपी कोई भी रिस्क लेने के मूड में नहीं दिखी। सूबे के सीएम शिवराज सिंह चौहान बुदनी में अंगद की तरह पैर जमाए है। लेकिन इस बार कांग्रेस से टीवी सीरियल के चर्चित कलाकार विक्रम मस्ताल के आने से मुकाबला बेहद रोचक है। उधर चंबल में दिमनी से केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की साख दांव पर है। चंबल ही वो जगह है, जहां से 2020 में कमलनाथ सरकार को कुर्सी से धकेला गया। लेकिन टिकट वितरण को लेकर यहां बीजेपी-कांग्रेस दोनों में बवाल मचा।

महाबलियों के कैरियर का सवाल!
बड़ी बात यह है कि इन तमाम बड़े चेहरों का सियासी भविष्य इस चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे। बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों दलों ने अलग रणनीति से खूब प्रचार किया। कर्नाटक फिर गुजरात के असर से सीख लेते हुए चुनावी मुद्दों को अलग ही हवा दी। हाईटेक प्रचार तंत्र, हर स्तर के मजबूत सनाधनों की ऐसी भीड़ वोटर्स ने भी कभी नहीं देखी। नरसिंहपुर छोड़ दें तो जबलपुर की पश्चिम हो, छिंदवाड़ा, सीधी या दिमनी जहां कांग्रेस का दबदबा रहा, वहां बीजेपी और अन्य दलों को प्रचार लोहे के चने चबाने से कम जैसा नहीं दिखा। कई जगहों पर आम आदमी पार्टी, बसपा और सपा भी गेम चेंजर बन सकते हैं।

महाकौशल का राजनीतिक गणित
आपको बता दें कि साल 2013 के विधानसभा चुनाव में महाकौशल की 38 सीटों में से भाजपा को 24 और कांग्रेस 13 सीटें मिली थीं। जबकि एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी। इसमें भाजपा को 43.69 प्रतिशत और कांग्रेस को 35.68 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके बाद साल 2018 में इसके ठीक विपरीत कांग्रेस को 24 सीट तथा भाजपा को 13 सीट हासिल हुई थी। एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी। जिसमें भाजपा को 40.04 प्रतिशत और कांग्रेस को 42.05 प्रतिशत वोट मिले थे।

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