MP News: होटल में नकली नोटों की फैक्ट्री का खुलासा, बेरोजगारी, फेसबुक गैंग व फर्जी फिल्म से कैसे मिला आइडिया
MP News: देश की व्यापारिक राजधानी कहलाने वाले इंदौर में हाल ही में क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे नकली नोट रैकेट का पर्दाफाश किया है, जिसने न केवल पुलिस महकमे को चौंका दिया बल्कि सोशल मीडिया, बेरोजगारी और पॉप कल्चर के खतरनाक मेल की भी परतें खोली हैं।
एक स्थानीय होटल के कमरे में ऑपरेट हो रही यह "फर्जी फैक्ट्री" शाहिद कपूर की चर्चित वेब सीरीज़ 'फर्जी' से प्रेरित थी। लेकिन यह रील नहीं, रियल क्राइम था, जहां प्रिंटर और लेमिनेशन मशीन के साथ 8 लाख से अधिक के नकली नोट तैयार हो चुके थे।

होटल का कमरा बना 'फर्जी' फैक्ट्री
इंदौर के अनुराग नगर एक्सटेंशन स्थित होटल इटर्निटी का कमरा नंबर 301 पिछले एक महीने से तीन युवकों का "वर्कस्पेस" बना हुआ था। होटल स्टाफ को उनकी गतिविधियां संदिग्ध लगीं-कमरे से आती मशीनों की आवाज़ें, कमरे से बाहर शायद ही निकलना, और लगातार डिलीवरी बॉक्स। जब मास्टर चाबी से कमरा खोला गया, तो नज़ारा हैरान करने वाला था-रंगीन प्रिंटर, लेमिनेशन मशीन, कंप्यूटर, बटर पेपर, और बिखरे पड़े ₹500 के नकली नोट।
शुरुआत बेरोजगारी से, प्लानिंग फेसबुक पर
इस रैकेट का मास्टरमाइंड अब्दुल शोएब उर्फ छोटू (25) है, जो छिंदवाड़ा का रहने वाला है और आर्ट एंड डिजाइन में ग्रेजुएट है। पिता पर भारी कर्ज और रोजगार की तलाश में भटकते शोएब को सोशल मीडिया के जरिए नकली नोट बनाने की तकनीकें मिलीं। वहीं उसकी मुलाकात हुई गुजरात के द्वारका निवासी मयूर चम्पा (25) से, जो एक होटल बुकिंग एजेंट है और 'फर्जी' वेब सीरीज देखकर नोट छापने का तरीका अपनाने के लिए प्रेरित हुआ।
MP News: फिल्मी स्टाइल में डिजाइन हुआ सॉफ्टवेयर
मयूर ने शोएब को एक फोटोशॉप-बेस्ड कस्टम सॉफ्टवेयर दिया, जिसमें वाटरमार्क, सीरियल नंबर और रंगों की हूबहू नकल तैयार की जा सकती थी। यह सॉफ्टवेयर इस तरह से डिजाइन किया गया था कि नोट असली जैसे लगें-इतने असली कि चेकिंग मशीनें भी धोखा खा जाएं।
फेसबुक गैंग: स्क्रीन के पीछे बनता नेटवर्क
रैकेट में धीरे-धीरे और लोग जुड़ते गए-छिंदवाड़ा के रहीश खान (32) और प्रफुल्ल कोरी (19), भोपाल के आकाश घारु (30) और मेडिकल स्टोर संचालक शंकर चौरसिया (42)। सभी का आपसी संपर्क फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए हुआ। इन्हें इस नेटवर्क में जोड़ा गया, ट्रेनिंग दी गई, और फर्जी करेंसी छापने का पूरा ब्लूप्रिंट भेजा गया।
MP News: छिंदवाड़ा से छपाई, भोपाल में खपत
पूछताछ में सामने आया कि रैकेट दो हिस्सों में बंटा था-छिंदवाड़ा मॉड्यूल नकली नोट छापने का जिम्मा संभालता था, जबकि भोपाल मॉड्यूल उन्हें स्थानीय बाजारों में खपाने का। यही वजह है कि क्राइम ब्रांच की दूसरी टीम ने भोपाल पहुंचकर 3.85 लाख के नकली नोटों के साथ दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया।
द्वारका से सॉफ्टवेयर मास्टर की गिरफ्तारी
17 अप्रैल को गुजरात के द्वारका से मयूर चम्पा की गिरफ्तारी के साथ इस हाईटेक अपराध का ब्रेन भी पकड़ में आ गया। पुलिस के अनुसार, मयूर ने ही वह सॉफ्टवेयर विकसित करवाया था जो नकली नोटों की प्रिंटिंग को इतना परिष्कृत बना रहा था कि नोट असली जैसे दिखें। मयूर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को इस नेटवर्क के संभावित विस्तार और अंतरराज्यीय लिंक की भी उम्मीद है।
बरामद सामग्री और सबूत, क्राइम ब्रांच ने छापेमारी में जो सामान बरामद किया है, वह किसी फर्जी मुद्रा छपाई की "क्लासरूम" से कम नहीं है:
- ₹500 के 870 नकली नोट
- कुल नकली मुद्रा की कीमत: ₹8.2 लाख
- हाई-क्वालिटी प्रिंटर, लेमिनेशन रोल, कटिंग मशीन
- बटर पेपर, लकड़ी के फ्रेम, स्टैंप
- आरोपी के मोबाइल फोन, एटीएम कार्ड, और एक लैपटॉप (जिसकी जांच जारी है)
कानूनी धाराएं और अगला कदम
आरोपियों पर IPC की धारा 489A (नकली मुद्रा बनाना), 489B (नकली मुद्रा का उपयोग) समेत कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। डीसीपी राजेश त्रिपाठी ने बताया, "यह संगठित अपराध था, जो सोशल मीडिया के जरिए फैला। हमने एक बड़ा नेटवर्क पकड़ा है, लेकिन अभी जांच पूरी नहीं हुई है।"
पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस गिरोह के नकली नोट कितने बाजारों में पहुंचे और कहीं अंतरराष्ट्रीय लिंक तो नहीं जुड़ा हुआ है। फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर नकली करेंसी से जुड़े ग्रुप्स को भी खंगाला जा रहा है।
जवाब तलाशता समाज: क्यों फर्जी बनते हैं युवा?
इस केस ने एक बार फिर इस सच्चाई को सामने रखा है कि आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और डिजिटल सुलभता ने आज के युवा को ऐसे अपराधों की तरफ धकेल दिया है, जहां तकनीक उनका हथियार बन रही है। "फर्जी" जैसी फिल्में, जो एक क्राइम थ्रिलर होनी चाहिए, कई बेरोजगारों के लिए "आईडिया बैंक" बन रही हैं।
सिस्टम को चाहिए सख्त निगरानी और सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सोशल मीडिया पर निगरानी और साइबर इंटेलिजेंस को मजबूत करना होगा। साथ ही, युवाओं के लिए वैकल्पिक रोजगार और स्किल ट्रेनिंग के अवसर भी तत्काल देने होंगे, ताकि वे किसी "छोटू" या "मयूर" का शिकार न बनें।
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