MP News: दमोह मिशन अस्पताल कांड का फर्जी डॉक्टर केम गिरफ्तार, 7 मरीजों की मौत का आरोप, जानिए पूरा मामला
MP News: मध्य प्रदेश के दमोह जिले में मिशन अस्पताल में सात हार्ट पेशेंट्स की मौत के मामले में मुख्य आरोपी डॉ. नरेंद्र जॉन केम उर्फ नरेंद्र यादव को पुलिस ने सोमवार, 7 अप्रैल 2025 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से गिरफ्तार कर लिया।
यह गिरफ्तारी लंबे समय से जारी तलाशी अभियान के बाद हुई, जिसके तहत पुलिस ने कई स्थानों पर छापेमारी की। दमोह के एसपी श्रुत कीर्ति सोमवंशी ने इस गिरफ्तारी की पुष्टि की और बताया कि आरोपी को अब दमोह लाया जा रहा है, जहां उस पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

मामला क्या है?
दमोह जिले के मिशन अस्पताल में सात मरीजों की मौत के बाद नरेंद्र जॉन केम (असली नाम नरेंद्र यादव) पर आरोप है कि उसने फर्जी डिग्रियों के आधार पर हार्ट सर्जरी की और मरीजों की जान को खतरे में डाला। जांच में यह खुलासा हुआ कि नरेंद्र यादव ने लंदन के मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट प्रोफेसर जॉन केम की पहचान चुराकर अपने को एक योग्य डॉक्टर के रूप में पेश किया। इस फर्जी डॉक्टर ने मिशन अस्पताल में 8 लाख रुपये मासिक वेतन पर नौकरी प्राप्त की थी और वहां 15 हार्ट ऑपरेशन किए, जिनमें से सात ऑपरेशन के बाद मरीजों की मौत हो गई। यह हादसा तब सामने आया जब मरीजों की मौत के बाद मामले की जांच शुरू हुई, और तब नरेंद्र यादव फरार हो गया था।
एफआईआर और जांच
रविवार रात को कोतवाली थाने में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) मुकेश जैन की शिकायत पर नरेंद्र यादव उर्फ नरेंद्र जॉन केम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इस एफआईआर में दो अन्य लोगों को भी सह-अभियुक्त बनाया गया है। जांच टीम में सीएमएचओ अशोक जैन, जिला अस्पताल के डॉ. विशाल शुक्ला और डॉ. विक्रांत चौहान शामिल थे। प्रारंभिक रिपोर्ट में पाया गया कि मरीजों की मृत्यु एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की प्रक्रियाओं के दौरान हुई, जो कि एक दिल से संबंधित चिकित्सा प्रक्रिया है।
मृतकों के नाम
- इस दर्दनाक हादसे में जिन मरीजों की जान गई, उनके नाम निम्नलिखित हैं:
- सत्येंद्र सिंह राठौर (लाडनबाग, हथना, दमोह)
- रहीसा बेग (पुराना बाजार नंबर 2, दमोह)
- इजराइल खान (डॉ. पसारी के पास, दमोह)
- बुधा अहिरवाल (बरतलाई, पटेरा, दमोह)
- मंगल सिंह राजपूत (बरतलाई, पटेरा, दमोह)
दो अन्य मृतकों की पहचान अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। इन मृतकों के परिवारों में शोक की लहर है और उनके परिजनों ने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
मानवाधिकार आयोग की जांच
इस कांड की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले की जांच शुरू कर दी है। NHRC की एक टीम, जिसमें रिंकल कुमार, ब्रजवीर कुमार, और राजेंद्र सिंह शामिल थे, सोमवार को दमोह पहुंची। टीम ने कलेक्टर, एसपी और सीएमएचओ से जानकारी ली और मिशन अस्पताल में तीन घंटे तक दस्तावेजों की गहन जांच की। इस दौरान, अब तक केवल दो लोगों - मृतक रहीसा बेगम के बेटे नबी बेग और शिकायतकर्ता कृष्णा पटेल - ने बयान दिए हैं, जबकि बाकी बयानों का दर्ज होना मंगलवार को निर्धारित किया गया है।
कैसे सामने आया मामला?
यह सनसनीखेज मामला 4 अप्रैल 2025 को तब सामने आया जब NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करते हुए इस घटना का खुलासा किया। उन्होंने मिशन अस्पताल में 7 मरीजों की मौत और एक फर्जी डॉक्टर के मौजूद होने की जानकारी दी। इस खुलासे के बाद पुलिस और प्रशासन सक्रिय हो गए और जांच प्रक्रिया तेज कर दी। पुलिस ने पहले से ही फरार आरोपी को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था, और अंततः वह प्रयागराज से गिरफ्तार हुआ।
अस्पताल का विवादित इतिहास
मिशन अस्पताल पहले भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग और धर्मांतरण के आरोपों में चर्चा में रह चुका है। अब इस फर्जी डॉक्टर के कांड ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना ना केवल अस्पताल के मानक और चिकित्सा गुणवत्ता पर सवाल उठाती है, बल्कि यह दर्शाती है कि कैसे एक व्यक्ति ने अपनी फर्जी पहचान को स्थापित कर एक अस्पताल में नौकरी हासिल की और मरीजों की जान से खेला।
सीएम यादव का सख्त रुख
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस मामले पर सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा, "स्वास्थ्य विभाग को अभियान चलाकर ऐसे मामलों पर नजर रखने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया है।" मुख्यमंत्री ने यह भी सुनिश्चित किया कि इस प्रकार के कृत्यों को रोकने के लिए अस्पतालों में और चिकित्सा प्रक्रियाओं में निगरानी को और कड़ा किया जाएगा।
अब आगे क्या होगा ?
पुलिस अब नरेंद्र यादव की असली पहचान, उसकी शैक्षणिक योग्यता और पिछले रिकॉर्ड की जांच कर रही है। साथ ही, अस्पताल प्रबंधन की भूमिका भी जांच के दायरे में है। इस मामले की जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि क्या अस्पताल के उच्च अधिकारियों ने इस फर्जी डॉक्टर को पहचानने में कोई लापरवाही बरती थी। यह मामला न केवल चिकित्सा क्षेत्र में लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि मरीजों की जान से खिलवाड़ करने वाली भयावह सच्चाई को भी सामने लाता है।
यह घटना मध्य प्रदेश में चिकित्सा व्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है कि मरीजों को सही चिकित्सा सुविधा मिले, और चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ कोई भी फर्जी गतिविधि पर सख्त कार्रवाई की जाए।












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