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गजब: शादी-पार्टी में जूठी प्लेट उठाने वाला बन गया महापौर, कहानी एक संघर्ष कई, जानिए पूरा मामला

महापौर के चुनाव में जिन मतदाताओं ने विक्रम को वोट किया, उनमे से कम लोग जानते होगे कि वह जिस उम्मीदवार को महापौर चुनने जा रहे है, वह कभी शादी-पार्टियों में जूठी प्लेट भी उठाया करता था। Amazing mp: Vikram Ahakey

छिंदवाड़ा, 19 जुलाई: आपने यूँ तो कई लोगों की सफलता संघर्षों की कहानी पढ़ी-सुनी होगी, आज वैसी ही कहानी का एक बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के नए महापौर (Mayor) विक्रम आहाके बन गए हैं। सोशल मीडिया पर उनके जीवन के संघर्ष की तस्वीरें वायरल होने के बाद, उनका एक और संघर्ष पता चला है। छिंदवाड़ा शहर को 18 साल बाद कांग्रेस का जो नया महापौर मिला है, वह किसी ज़माने में वोट देने वाली जनता की जूठी प्लेट उठाता था। आपको भले ही इस बात पर यकीन न हो, लेकिन उनकी यह बात चमकते हीरे की तरह सच है।

शून्य से शिखर की ओर ‘विक्रम’

शून्य से शिखर की ओर ‘विक्रम’

मप्र के सामान्य शहरों में शुमार छिंदवाड़ा जिले का 'विक्रम' ने अपने नाम के अनुरूप अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। बहुत जल्द अब वह शहर के प्रथम नागरिक की कुर्सी संभालेंगे। 'विक्रम आहाके' मेयर का इलेक्शन जीतते ही, शख्सियत बन गए है। जब वन इंडिया की टीम ने विक्रम से इस सफलता का राज पूछा तो उसमें उनके सघर्षों की कई कहानी छिपी हुई मिली। पुराने दिनों में खेतों में काम करने से लेकर लकड़ियाँ ढोकर लाने की तस्वीरें भी वायरल हुई है। आज वह जिस मुकाम पर पहुंचे है, उसमें कई काँटों और पथरीले रास्तों का सफ़र तय किया गया है।

जूठी प्लेट उठाने वाला बन गया ‘महापौर’

जूठी प्लेट उठाने वाला बन गया ‘महापौर’

नवनिर्वाचित महापौर विक्रम आहाके का अब नया सफ़र शुरू होगा। महापौर के चुनाव में जिन मतदाताओं ने विक्रम को वोट किया, उनमे से कम लोग जानते होगे कि वह जिस उम्मीदवार को महापौर चुनने जा रहे है, वह कभी शादी-पार्टियों में जूठी प्लेट भी उठाया करता था। वन इंडिया हिंदी टीम से बात करते हुए विक्रम ने बताया कि उन्होंने गड्ढो को खोदने की मजदूरी बेलदारी तक की। मकसद था कि स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में होने वाले खर्च की भरपाई हो सकें।

सरकारी नौकरी ठुकराई, समाज सेवा को बनाया लक्ष्य

सरकारी नौकरी ठुकराई, समाज सेवा को बनाया लक्ष्य

विक्रम बताते है कि स्कूल टाइम से कभी भी उनका पढ़ाई से मोह भंग नहीं हुआ। कॉलेज में दाखिला लिया तो वहां भी परीक्षाओं में सफलता के झंडे बुलंद किए। कॉलेज में दोस्तों के बीच बुनियादी जरूरतों और समस्याओं ने उन्हें छात्र राजनीति में ढकेल दिया। जब छात्र राजनीति में दिलचस्पी बढ़ी तो वह कांग्रेस के कमलनाथ की कार्य शैली से प्रभावित हुए। उनसे संपर्क कर NSUI का झंडा उठाया तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस दौरान उनकी CRPF में दो बार और राज्य पुलिस में एक बार नौकरी भी लग गई, लेकिन उसे ठुकरा दिया।

राहुल गांधी के बाद प्रियंका भी हुई मुरीद

राहुल गांधी के बाद प्रियंका भी हुई मुरीद

कंधे पर लकड़ियाँ ले जाते, तेंदू पत्ते से कुछ सामान बनाते और माँ के पैर छूते विक्रम की जब तीन फोटो वायरल हुई, तो उसे राहुल गांधी ने भी अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया है। राहुल को विक्रम की कामयाबी इनती भायी कि उन्होंने पोस्ट लिखते हुए शीर्षक दिया कि "मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं, पिता जी किसान हैं और बेटा 'महापौर' है। राहुल के बाद प्रियंका गांधी भी विक्रम की मुरीद हो गई है। उन्होंने भी विक्रम आहाके की तारीफ में लिखा और नई कामयाबी की बधाइयाँ दी।

ख़ुशी से लबरेज परिवार

ख़ुशी से लबरेज परिवार

विक्रम आहाके एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते है। उनकी माँ आँगनबाड़ी कार्यकर्ता है और उन्हें 425 रुपए मानदेय मिलता है। वही पिता पेशे से किसान है। कोरोनाकाल के लोंकडाउन में ही उनकी शादी हुई है। परिवार और रिश्तेदार विक्रम के महापौर बनने से बेहद खुश है। परिवार के लोगो को उस वक्त भी यकीन नहीं था कि कांग्रेस से महापौर जैसे बड़े पद का टिकट मिलेगा। चुनाव प्रचार के दौरान जब विक्रम को अपार जनसमर्थन मिलना शुरू हुआ, तो उस वक्त भी परिवार के लोग भरोसा ही नहीं कर पा रहे थे कि उनका विक्रम ही चुनाव लड़ रहा है।

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