कौन हैं सोनम वांगचुक और क्यों कर रहे हैं आंदोलन?

सोनम वांगचुक

क्या आपने राजकुमार हिरानी की फिल्म थ्री इडियट्स देखी है? उसमें अभिनेता आमिर खान ने एक इनवेंटर का किरदार निभाया था जो भारत के सुदूर उत्तर में लद्दाख में रहता है और बच्चों को पढ़ाता है. यह किरदार जिस शख्सियत से प्रेरित था, उनका नाम है सोनम वांगचुक.

सोनम वांगचुक 2 जनवरी से भूख हड़ताल पर हैं. 18,380 फुट की ऊंचाई पर खारदूंग ला में रहने वाले वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल के ऐलान के दो दिन बाद यू्ट्यब पर एक वीडियो जारी कर कहा है कि प्रशासन ने उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया है. हालांकि प्रशासन ने इस आरोप को गलत बताया है.

पांच दिन का उपवास

वांगचुक ने एक ट्वीट कर एक दस्तावेज साझा किया जिसमें उनके सामने प्रशासन द्वारा रखी गईं कुछ शर्तें हैं. उन्होंने लिखा, "दुनिया के वकील ध्यान दें. जब प्रार्थनाएं और उपवास चल रहे हैं तब लद्दाख यूटी प्रशासन चाहता है कि मैं इस बॉन्ड पर साइन करूं. यह कैसे सही है? क्या मैं चुप हो जाऊं? मुझे गिरफ्तारी से डर नहीं लगता."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग कर किए गए इस ट्वीट के साथ जो बॉन्ड दिया गया है, उसके मुताबिक वांगचुक के सामने शर्त रखी गई है कि वे कोई बयान नहीं देंगे. टिप्पणियां नहीं करेंगे. भाषण नहीं देंगे. लेह जिले में किसी आयोजन में हिस्सा नहीं लेंगे.

बाद में एक यूट्यूब वीडियों में उन्होंने कहा कि उन्हें नजरबंद कर दिया गया है जो असल में "नजरबंदी से ज्यादा बुरा है." हालांकि लेह की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पीडी नित्या ने इस पर सफाई देते हुए मीडिया को बताया, "उन्हें खारदुंग ला दर्रे में पांच दिन का उपवास करने की इजाजत नहीं दी गई थी क्योंकि वहां तापमान माइनस 40 डिग्री तक गिर जाता है. उन्हें और उनके समर्थकों के लिए वहां जाना बेहद खतरनाक होता और इसलिए उनसे अनुरोध किया गया कि वह अपने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के परिसर में ही उपवास करें."

क्या है वांगचुक की मांग?

लेह जिले के आलची के पास उलेयतोकपो में जन्मे 56 वर्षीय वांगचुक सामुदायिक शिक्षा के अपने मॉडल के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं. रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड पा चुके वांगचुक लद्दाख क्षेत्र को विशेष अधिकारों और पर्यावरणीय सुरक्षा की मांग के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वह चाहते हैं कि हिमालयी क्षेत्र को बचाने के लिए लद्दाख को विशेष दर्जे की जरूरत है.

सोमवार को अपने पांच दिन लंबे प्रतीकात्मक उपवास के पूरा होने के मौके पर उन्होंने कहा, "आज मेरे प्रतीकातमक कार्बन न्यूट्रल जलवायु उपवास का अंतिम दिन है. यह उपवास प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने की एक कोशिश थी ताकि हमारे नेता उन्हें हमारी चिंताओं और मांगों के बारे में बता सकें."

उन्होंने कहा कि हिमालय और उसके ग्लेशियरों की सुरक्षा किन्हीं कॉरपोरेटर्स को खुश करने से ज्यादा जरूरी होना चाहिए क्योंकि उसका असर पूरे उपमहाद्वीप के लोगों के जीवन पर हो रहा है. उन्होंने कहा, "हिमालय में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार को भविष्योन्मुखी योजना बनानी होगी. संविधान की छठी अनुसूची में लद्दाख को शामिल करना भी इसका हिस्सा है."

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भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत जातीय और जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों क अपने-अपने क्षेत्रों के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है. फिलहाल भारत के चार राज्य मेघालय असम, मिजोरम और त्रिपुरा के दस जिले इस अनुसूची का हिस्सा हैं. वांगचुक की मांग है कि लद्दाख को भी इस अनुसूची के तहत विशेषाधिकार दिए जाएं.

वांगचुक को समर्थन

पिछले पांच दिन के उपवास के दौरान वांगचुक की मांगों को भारी समर्थन मिला है. भारतीय जना पार्टी को छोड़कर बाकी सभी दलों ने उनकी मांगों का समर्थन किया है. सोमवार को उन्होंने कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वह अपने आंदोलन को और तेज करेंगे.

उन्होंने कहा, "यह एक प्रतीकात्मक उपवास था. अगर सरकार की तरफ से प्रतिक्रिया नहीं मिलती है तो मैं दस दिन की भूख हड़ताल करूंगा. फिर 15 दिन और उसके बाद अपनी अंतिम सांस तक."

लद्दाख के लोग लंबे समय से छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग करते रहे हैं. इस मांग के लिए काम रहे संगठन पीपल्स मूवमेंट फॉर सिक्स्थ शेड्यूल की प्रमुख संस्था तुप्स्तान चेवांग ने भी लद्दाख की संस्कृति और पहचान की सुरक्षा में नाकाम रहने के लिए सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है.

Source: DW

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