ममता सरकार के लिए गले की हड्डी बनीं महिला सेक्स वर्कर

अब ममता सरकार के सामने सवाल है कि अगर वह महिला सेक्स वर्करों की मदद करती हैं तो उन्हें जनविरोध का सामना करना पड़ेगा जो कि आगामी चुनाव को देखते हुए उनके लिए अच्छा नहीं है, वहीं समाज के हाशिये पर पड़े एक वर्ग की भी लोकतंत्र में उपेक्षा नहीं की जा सकती है। ममता बनर्जी ने हमेशा ही आम आदमी के पक्ष में आवाज उठाई है और उनकी छवि एक 'मास लीडर' की रही है। अत: अब ममता सरकार के लिए यह एक मुश्किल फैसला बन गया है, हालांकि बताया जा रहा है, अभी सिर्फ सौ महिला सेक्स वर्करों के ही पुनर्वास की ही योजना है, जिनके नाम का चुनाव क्रमरहित ढंग से किया जाएगा।
भारत के लोकतांत्रिक समाज में सेक्स वर्करों को 'नेसेसरी इविल' के रूप में देखा जाता है और सरकार ऐसे मुद्दों पर कोई कड़ा फैसला भी नहीं कर पाती है। जबकि राजतंत्र में सत्ता पक्ष के लिए ऐसे पेचीदा मुद्दों पर फैसला करना आसान हो जाता है। इन मामलों पर समाज के अन्य लोगों का भी दोहरा रवैया रहता है।
यह मुद्दा ममता सरकार के लिए तो मुद्दा है ही साथ ही बुद्धजीवियों के लिए भी एक मुद्दा है।












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