JK Election History: नया अध्याय लिखने को तैयार जम्मू-कश्मीर, कभी था एक राजनीतिक परिवार का दबदबा
Jammu Kashmir Election History: जम्मू-कश्मीर, एक जटिल राजनीतिक इतिहास वाला राज्य है, जहां एक दशक के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पिछली सरकार 2018 में गिर गई थी, जब भाजपा ने पीडीपी की महबूबा मुफ्ती से समर्थन वापस ले लिया था। तब से राज्य में कोई निर्वाचित सरकार नहीं है।
ऐसे में अब एक दशक बाद फिर से जम्मू-कश्मीर की आबोहवा में हर तरफ सियासत की गूंज सुनाई दे रही है। सभी दल अपने-अपने स्तर पर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। यहां की 90 सीटों पर 3 चरणों में वोटिंग होगी। पहले चरण में 18 सिंतबर, दूसरे चरण 25 सितंबर और तीसरा चरण 1 अक्तूबर को होगा। इसके बाद वोटों की गिनती 8 अक्टूबर को होगी।

जम्मू कश्मीर: एक राजनीतिक परिदृश्य
जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक यात्रा 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के साथ शुरू हुई। महाराजा हरि सिंह ने पश्चिमी जिलों में विद्रोह और पाकिस्तान समर्थित ताकतों के हमलों के बीच भारत में शामिल होने का फैसला किया। इसके बाद भारतीय सैनिकों को कश्मीर में लड़ने के लिए भेजा गया, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने गिलगित बाल्टिस्तान को नियंत्रित किया, जिसे अब पाकिस्तान नियंत्रित कश्मीर (POK) के रूप में जाना जाता है, जबकि बाकी क्षेत्र जम्मू और कश्मीर बन गया।
यहां अब्दुल्ला परिवार ने राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शेख अब्दुल्ला, जिन्हें 'शेर-ए-कश्मीर' के नाम से जाना जाता है, उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) की स्थापना की और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों के रूप में कार्य किया। उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला ने भी कई बार राज्य का नेतृत्व किया और 2009 से 2014 के बीच केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया। शेख के पोते उमर अब्दुल्ला भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस का लंबा शासन
सितंबर-अक्टूबर 1951 में संविधान सभा के पहले चुनाव हुए, जिसमें शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सभी 75 सीटें जीतीं। इस जीत ने शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का पहला निर्वाचित प्रधानमंत्री बनाया। हालांकि, बाद में उन्हें पद से हटा दिया गया और लगभग दस साल तक जेल में रखा गया। विरोधी नेताओं के समर्थन से बख्शी गुलाम मोहम्मद ने उनकी जगह ली।
1957 में हुए चुनावों ने संविधान सभा को विधान सभा में बदल दिया। नेशनल कॉन्फ्रेंस फिर से विजयी हुई और 75 में से 68 सीटें जीतीं। बख्शी गुलाम मोहम्मद प्रधानमंत्री बने रहे, लेकिन 1963 में हजरत बल मस्जिद से जुड़े विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
आगामी चुनाव और राजनीतिक परिवर्तन
1962 में हुए तीसरे चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 75 में से 70 सीटें जीतीं। हालांकि, पार्टी के अंदरूनी मुद्दों के चलते अक्टूबर 1963 में बख्शी गुलाम मोहम्मद की जगह ख्वाजा शम्सुद्दीन को प्रधानमंत्री बनाया गया। शम्सुद्दीन का कार्यकाल कुछ ही समय का रहा क्योंकि फरवरी 1964 में जीएम सादिक ने पदभार संभाला और कई एनसी नेता कांग्रेस में शामिल हो गए।
मार्च 1965 में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ जब प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री का पद दिया गया। इस नए पद के तहत जीएम सादिक जम्मू-कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने।
गठबंधन सरकारें और राष्ट्रपति शासन
अपने पूरे इतिहास में जम्मू-कश्मीर ने कई गठबंधन सरकारों के साथ-साथ राष्ट्रपति शासन के दौर भी देखे हैं। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने भी कई बार शासन किया है, लेकिन सत्ता बनाए रखने के लिए उसे अक्सर अन्य पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ी।
पढ़िए 1967 से अब तक का इतिहास
- 1967 में जीएम सादिक के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस ने 61 सीटें जीतीं, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस को आठ और भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिलीं। 12 दिसंबर 1971 को जीएम सादिक की मृत्यु के बाद, सैयद मीर कासिम ने नए मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला।
- जम्मू-कश्मीर में 1972 में पांचवां विधानसभा चुनाव हुआ। जिसमें कांग्रेस ने 58 सीटें जीतीं, जनसंघ ने तीन, जमात-ए-इस्लामी के 5 और 9 निर्दलीय उम्मीदवार जीते। सैयद मीर ने दूसरी बार 25 फरवरी 1975 तक मुख्यमंत्री का पद संभाला। इंदिरा-शेख अब्दुल्ला समझौते के बाद शेख अब्दुल्ला ने उनकी जगह मुख्यमंत्री पद संभाला।
1977 में शेख अब्दुल्ला की वापसी
1977 के चुनावों में शेख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस ने देश भर में इंदिरा विरोधी लहर के बीच जोरदार वापसी की। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 76 में से 47 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को केवल ग्यारह सीटें मिलीं। जनता पार्टी को तेरह सीटें मिलीं, जमात-ए-इस्लामी को एक सीट मिली और चार निर्दलीय भी जीते।
शेख अब्दुल्ला की सरकार ने विधानसभा का कार्यकाल पांच साल से बढ़ाकर छह साल करने के लिए राज्य के संविधान में संशोधन किया। 1982 में उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।
फारूक अब्दुल्ला ने 1983 के चुनावों में 46 सीटें जीतकर नेशनल कॉन्फ्रेंस को जीत दिलाई। कांग्रेस को 26 सीटें मिलीं। हालांकि, फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह के नेतृत्व वाले एक गुट ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग होकर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई जो 1986 तक चली। उस साल बाद में, कांग्रेस ने शाह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया जिसके कारण मार्च से नवंबर तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा।

1987 में एनसी-कांग्रेस गठबंधन की जीत
1987 के चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने चालीस सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को छब्बीस सीटें मिलीं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को दो सीटें मिलीं और निर्दलीयों ने आठ सीटें जीतीं। फारूक अब्दुल्ला फिर से मुख्यमंत्री बने। इन चुनावों के दौरान कथित अनियमितताओं ने राज्य में उग्रवाद को बढ़ावा दिया, जिसके कारण 1990 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
चुनाव आयोग ने 1995 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने की केंद्र सरकार की सिफारिश को खारिज कर दिया। इसके परिणामस्वरूप 1996 में 87 सीटों के लिए चुनाव हुए, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 57 सीटें जीतकर अपने दम पर बहुमत हासिल किया। भाजपा को 8, कांग्रेस को 7, जनता दल को 5, बहुजन समाज पार्टी को 4, पैंथर्स पार्टी को 1, जम्मू-कश्मीर आवामी लीग को 1 और निर्दलीयों को 2 सीटें मिलीं।
2002 में कांग्रेस-पीडीपी सरकार बनी
2002 के विधानसभा चुनावों में जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस विरोधी लहर के साथ एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। नेशनल कॉन्फ्रेंस की सीटें 57 से घटकर 28 रह गईं, जबकि कांग्रेस ने 20 और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने 16 सीटें जीतीं। पैंथर्स पार्टी को चार सीटें मिलीं; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को 2; बहुजन समाज पार्टी को 1; भाजपा को 1 सीट मिली; कई निर्दलीय भी विजयी हुए।
पीडीपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाई और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पीडीपी और कांग्रेस नेताओं के बीच हर तीन साल में बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद के समझौते के तहत मुख्यमंत्री बने।
उमर अब्दुल्ला 2008 में मुख्यमंत्री बने
2008 के चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, उसके बाद पीडीपी 21 और कांग्रेस 17 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि भाजपा को 11 और अन्य को कुल मिलाकर 10 सीटें मिलीं।
कांग्रेस ने उमर अब्दुल्ला का समर्थन किया, जिन्होंने पांच जनवरी को पदभार ग्रहण किया और इतिहास रच दिया क्योंकि वे अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य की राजनीति में शीर्ष स्थान पर थे।

2014 में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार बनी
2014 दिसम्बर के विधानसभा चुनाव परिणामों में किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन पीडीपी 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा ने 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 15 और कांग्रेस के खाते में 12 सीटें आईं।
इसके बाद महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार बनी, हालांकि यह गठबंधन पहले समर्थन वापस लेने के कारण अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका, जिसके बाद प्रशासन ध्वस्त हो गया। उसके बाद से आज तक इस क्षेत्र में कोई निर्वाचित सरकार काम नहीं कर रही है।
आने वाले चुनाव जम्मू-कश्मीर के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय है, क्योंकि यह वर्षों तक निर्वाचित सरकार के बिना रहने के बाद नए नेतृत्व के लिए तैयारी कर रहा है। ऐसे में इस चुनाव के परिणाम जम्मू-कश्मीर के नए अध्याय की शुरुआत करने वाले होंगे।












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