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J&K: 15 वर्ष बाद 14 लाख लोगों की जिंदगी बदलने की तैयारी, जानिए क्या है Forest Rights Act-2006

श्रीनगर, 14 सितंबर: जम्मू-कश्मीर सरकार ने करीब डेढ़ दशक बाद आदिवासी और वनवासी समाज के जीवन में बदलाव के लिए बड़ी पहल की है। यहां वन अधिकार कानून-2006 अमल में लाया जा रहा है, जिससे वनवासियों,आदिवासियों और घुमंतू समुदायों के जंगल पर अधिकारों और पर्यावरण के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित हो सकेगा। आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग इस कदम को ऐतिहासिक बता रहे हैं। जबकि, सरकार का कहना है कि इससे जनजातीय और वनवासी समाज को सम्मानित जीवन मिलना सुनिश्चित हो सकेगा। इस फैसले से करीब 14 लाख लोग सीधे प्रभावित होने वाले हैं।

14 लाख आदिवासियों और घुमंतुयों को मिलेगा उनका अधिकार

14 लाख आदिवासियों और घुमंतुयों को मिलेगा उनका अधिकार

15 वर्ष बाद जम्मू-कश्मीर के करीब 14 लाख लोगों की जिंदगी संवरने की उम्मीद जग गई है। इस केंद्र शासित प्रदेश की सरकार ने वन अधिकार कानून-2006 लागू करने का फैसला कर लिया है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर के आदिवासी और घुमंतू (खानाबदोश) समुदायों, जिनमें कि गुज्जर-बकरवाल और गद्दी-सिप्पी समाज शामिल हैं, सबकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। लेफ्टिनेंट जनरल मनोज सिन्हा ने सोमवार को कहा, '14 वर्षों के इंतजार के बाद देश के संविधान और संसद की मूल भावना से प्रेरित होकर सामाजिक समानता और सौहार्द को ध्यान में रखते हुए जनजातीय समुदाय को उनका वाजिब अधिकार देने के लिए वन अधिकार अधिनियम-2006 अमल किया जा रहा है। '

क्या है वन अधिकार कानून, 2006 ?

क्या है वन अधिकार कानून, 2006 ?

अंग्रेजों ने भारत पर कब्जे के दौरान भारत की वन संपत्ति का अपनी मर्जी से जमकर दोहन किया था। हालांकि, भारतीय वन कानून, 1927 के तहत वन संपदा को लेकर अधिकार भी तय किए गए थे, लेकिन इसका शायद ही कभी पालन किया गया। इसका परिणाम ये हुआ कि आदिवासी और वनवासी समुदाय जो कि हमेशा से जंगलों पर निर्भर रहा है बिल्कुल ही असुरक्षित हो गया। आजादी के बावजूद यह समुदाय पूरी तरह से अलग-थलग रहा। आगे चलकर वन और वनवासियों के बीच के संबंधों को राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के तहत सहजीवी के तौर पर मान्यता मिली। इस नीति की मूल भावना यह थी कि जनजाति और वनवासी समाज को जंगल के संरक्षण उसके सुधार और विकास में सहयोगी बनाया जाए। इसी के तहत वन अधिकार कानून, 2006 बनाया गया था, जिससे ऐसे नागरिकों के जीवन और आजीविका के अधिकारों और पर्यावरण के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

बदलेगी आदिवासियों-वनवासियों की जिंदगी

बदलेगी आदिवासियों-वनवासियों की जिंदगी

जम्मू और कश्मीर में इस कानून के अमल के असर के बारे में जानकारी देते हुए जनजातीय मामलों के विभाग के प्रशासनिक सचिव शाहिद इकबाल चौधरा ने बताया कि इस कदम के बारे में 'आने वाली पीढ़ियां सुनहरे शब्दों में लिखेंगी।' उन्होंने बताया कि 'इससे जनजातीय आबादी के लिए सम्मानित जीवन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। जनजातीय लोगों का जंगलों से नजदीकी रिश्ता है और दुख की बात है कि इसके लिए कोई कानूनी ढांचा नहीं है। इस कदम से जनजातीय लोगों की लंबी कठिनाइयों से छुटकारा मिलेगा और वन संरक्षण भी सुनिश्चित हो सकेगा।'

'इस कानून के अमल से यह समाज आत्मनिर्भर बनेंगे'

'इस कानून के अमल से यह समाज आत्मनिर्भर बनेंगे'

इस बीच उपराज्यपाल ने कहा है कि इस कानून के अमल में आने से आदिवासी समुदाय को पानी, भोजन, आवास और आजीविका के साथ ही उन्हें बेहतर जिंदगी जीने का हक मिलेगा और उनका सशक्तिकरण होगा। एलजी बोले, 'यह निश्चित रूप से उनके जीवन में बदलाव लाएगा। वे अपने विकास के लिए संसाधनों तक पहुंच के साथ आत्मनिर्भर भी बनेंगे।'

'15 साल बाद सपना साकार'

'15 साल बाद सपना साकार'

उधर जनजाति अधिकार कार्यकर्ता जावेद राही ने जम्मू-कश्मीर सरकार के कदम को 'ऐतिहासिक अवसर' बताया है। उन्होंने कहा है, '15 साल लंबे संघर्ष के बाद यह सपना साकार हुआ है। जम्मू और कश्मीर सरकार ने आदिवासियों को उनका अधिकार उनको सौंप दिया है। गुज्जरों-बकरवालों की ओर से मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एलजी सिन्हा और डॉक्टर चौधरी को दिल से शुक्रिया देता हूं।'

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