Surya grahan 2022: ग्रहण ख़त्म होते ही नर्मदा तटों में डुबकी लगाने उमड़ी भीड़, जबलपुर में दिखा ऐसा संगम
(Surya grahan 2022) सूर्य ग्रहण हो या चन्द्र ग्रहण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे खगोलीय घटना माना जाता है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं में इसके पीछे कई तर्क है। आस्था के सामने किसी की नहीं चलती। दीपवली के दूसरे दिन सूर्य ग्रहण प्रभाव की अवधि ख़त्म होने के बाद लोगों ने आस्था के अनुरूप जहां पवित्र नदियों में डुबकियां लगाकर जहां दान-पुण्य कर्म किया, तो वही राशियों के हिसाब से सबसे पहले भोजन ग्रहण की परंपरा का निर्वहन भी किया।

भारत के अमृतसर में दिखा साल का आखिरी सूर्य ग्रहण
दीपवली पर्व की खुशियों के बीच साल का आखिरी सूर्य ग्रहण पड़ा। भारतीय समय अनुसार दोपहर 02 बजकर 29 मिनट से ग्रहण शुरू हुआ, जिसका भारत में प्रभाव लगभग दो घंटे रहा। खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रहण शाम 6 बजाकर 33 मिनट पर ख़त्म हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शाम 4 बजकर 30 मिनट पर रूस में सूर्य ग्रहण चरम पर था। जबकि भारत में साल का आखिरी सूर्य ग्रहण सबसे पहले अमृतसर में दिखाई पड़ा।

पवित्र नर्मदा में लगाई डुबकी, किया दान-पुण्य
ग्रहण का प्रभाव शुरू होने के बाद उसकी अवधि तक सूतक काल माना जाता है। जिसकी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और व्याख्याएं है। मप्र के पवित्र मंदिरों के कपाट बंद कर दिए गए थे। जैसे ही ग्रहण ख़त्म हुआ, आस्थावान लोग पवित्र नदी, तालाबों के घाट पहुंचे और डुबकी लगाई। ग्रहण के बाद नर्मदा में स्नान का भी विशेष महत्त्व है। जबलपुर के पवित्र तट ग्वारीघाट में लोगों की भीड़ उमड़ी। स्नान के बाद लोग दान-पुण्य पूजा अर्चना करते दिखे।

किसी ने कराई कथा तो किसी ने की नर्मदा आरती
ग्रहण काल ख़त्म होने के बाद आस्था के कई रंग देखने को मिलते है। जबलपुर के नर्मदा घाटों में स्नान के बाद श्रद्धालु पूजा पाठ में व्यस्त नजर आए। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक सूर्य ग्रहण हो या चन्द्र ग्रहण, इसका राशियों के हिसाब से प्रभाव होता है। लिहाजा उसके अनुरूप व्यक्ति को सूतककाल के बाद दिनचर्या पूरी करना चाहिए। नर्मदा तट पर पुण्य लाभ अर्जित करने लोगों ने सत्यनारायण भगवान की कथा कराई तो कुछ श्रद्धालुओं ने दीपदान करने के साथ नर्मदा आरती की।

भगवान को भोग लगाने के बाद करें ये ग्रहण
मान्यताओं के अनुसार ग्रहण सूतक काल में लोग घरों से बाहर नहीं निकलते। हालांकि भारत में इस सूर्य ग्रहण का आंशिक असर रहा। घर में रखी खाद्य वस्तुओं पर तुलसी की पत्तियां डाल दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इससे खाने का सामान दूषित नहीं होता। स्नान के बाद पवित्र नदियों का जल छिड़ककर घर को पवित्र किया जाता था। जबलपुर के पंडित रोहित दुबे बताते है कि ग्रहण के बाद भगवान को सबसे पहले तिल, गुड़ से बनी सामग्री का भोग लगाना सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है। इसके बाद सबसे पहले तिल से बनी इन्ही चीजों का सेवन करना चाहिए।

ग्रहण काल में भोजन करना इसलिए वर्जित
धार्मिक ग्रंथों शास्त्रों में भी ग्रहण का विशेष उल्लेख है। ऐसी मान्यता है कि ग्रहण अवधि में भोजन नहीं करना चाहिए। यदि इस दौरान कोई मनुष्य जितने दाना भोजन करता है, उतने वर्ष वह नरक में रहता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस अवधि में भोजन करना शरीर के लेकिन नुकसानदायक बताया गया है। इसमें कई शोध भी हुए, जिसके अनुसार ग्रहण के वक्त पराबैंगनी किरणे भोजन को विषैला बना देती है। जिसका सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है।












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