जंग पुतिन की है, बैन लगाकर खिलाड़ियों को सजा देना गलत

मास्को, 23 अप्रैल। देखिए, दो बातों पर बिल्कुल स्पष्ट हो जाते हैं. पहला, खेल और राजनीति- बिना अपवाद, एक दूसरे से जुड़े हैं.
दूसरा, यूक्रेन पर इस भयानक रूसी हमले की निंदा जरूर करनी चाहिए. उनकी भी, जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. और सबसे पहले राष्ट्रपति पुतिन की.
लेकिन रूस और बेलारूस के खिलाड़ियों को बाहर रखने से बहुत गलत संकेत जाता है. क्योंकि यहां ऐसे लोगों को सजा देने की बात हो रही है, जो ना किसी संस्था से जुड़े हैं और ना ही एक्टिविस्ट पृष्ठभूमि वाले हैं. किसी देश के राजनेताओं के कामों के लिए उन खिलाड़ियों को सजा देना ठीक नहीं है, जिनका राजनेताओं से कोई सीधा संपर्क नहीं है, ना बतौर खिलाड़ी और ना ही बतौर नागरिक. हो सकता है विंबल्डन की नीयत सही हो, लेकिन इससे प्रभावित होने वाले लोगों का कोई दोष नहीं है.

साझा सजा गलत है
रूस और बेलारूस के खिलाड़ियों की कही बातें और उनके कामों का असर दिखता है, क्योंकि वे बड़ा नाम हैं. इसलिए दोनों देशों के खिलाड़ियों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनेताओं के कामों से दूरी बनाए रखें. लेकिन यह अनिवार्य शर्त नहीं होनी चाहिए.
विंबल्डन का फैसला बताता है कि एक व्यक्ति के बोलने से कोई फर्क नहीं दिखता है. 24 फरवरी को जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब टॉप टेनिस खिलाड़ी डानिएल मेदवेदेव ने कहा कि 'घर से मिली जानकारी' के साथ सुबह उठना कितना मुश्किल था. उन्होंने बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कहा कि "मैं पूरी तरह शांति के साथ हूं." उन्होंने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर "दुनिया के हर बच्चे" की तरफ से "मुल्कों के बीच शांति" की बात कही.
बिल्कुल, यह रूसी हमले के जिम्मेदार लोगों की कड़ी आलोचना नहीं थी, लेकिन कम से कम उन्होंने युद्ध की निंदा तो की. हो सकता है मेदवेदेव ने यहां निजी हित देखे हों, लेकिन इससे कुछ फर्क भी नहीं पड़ा. अगर कोई खिलाड़ी खुद को हो रही घटनाओं से अलग नहीं भी कर पाता है, तो भी वो खिलाड़ी हो रही घटनाओं के लिए किसी भी तरह से दोषी नहीं है. इसीलिए सजा का हकदार भी नहीं है. यह एक तरह से खिलाड़ियों को साझा सजा है और ऐसा नहीं होने देना चाहिए.
खेल संघ बनाम अकेला खिलाड़ी?
युद्ध से सदमे में गई दुनिया में जरूरी है कि आप स्टैंड लें और यह बात खेल की दुनिया पर भी लागू होती है. यूरोपीय फुटबॉल को चलाने वाली यूएफा (UEFA) ने रूसी फुटबॉल संघ और सेंट पीटर्सबर्ग जैसी टीमों को अगले नोटिस तक अलग करने का सही फैसला किया है.
रूस और बेलारूसी खिलाड़ियों को पैरालंपिक्स में अपने देश के झंडे के तहत ना खेलने देने का फैसला भी सही था. लेकिन टेनिस में ऐसा नहीं है, क्योंकि यहां खिलाड़ी व्यक्तिगत रूप में खेलते हैं.
रूस के खिलाफ बाकी खेलों में भी पाबंदियां लगाई गई हैं. लेकिन यही सोच व्यक्तिगत खेलों में लागू नहीं की जा सकती क्योंकि राष्ट्रीय और राज्य खेल संघ की एक जिम्मेदारी होती है, सरकारी तंत्र से सीधा रिश्ता होता है. जबकि व्यक्तिगत खेल में किसी टेनिस खिलाड़ी के साथ ऐसा नहीं होता.

प्रतीकों की राजनीति
रूसी टीम को डेविस कप से निकालना सही होगा, लेकिन अकेले डानिएल मेदवेदेव को सिंगल मुकाबलों के किसी टूर्नामेंट से निकाल देना गलत है. टेनिस के दो अलग मामले, दो अलग नतीजे. कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि डेविस कप में लोग अपने देश या राष्ट्रीय संघ के लिए खेलते हैं, भले ही सिंगल मैच भी खेल रहे हों, जैसा कि पैरालंपिक्स में हुआ.
लेकिन विंबल्डन, बाकी ग्रैंड स्लैम, एटीपी या डब्ल्यूटीए टूर्नामेंट में कोई खिलाड़ी व्यक्तिगत तौर पर खेलता है. वहां जीता इनाम और रैंकिंग पॉइंट किसी राष्ट्रीय टीम या फेडरेशन की बजाए उस खिलाड़ी को मिलते हैं.
इसी तर्क के आधार पर पुरुषों के टेनिस संगठन- ATP और महिलाओं के टेनिस संगठन- WTA ने तुरंत विंबल्डन आयोजकों के फैसले पर प्रतिक्रिया दी. ATP ने रूस के किए की भर्त्सना की, लेकिन स्पष्ट कहा कि विंबल्डन का फैसला भेदभाव भरा है. WTA ने कहा कि वे इस फैसले से बहुत ही निराश हैं.
देश के झंडे के बिना खेलना संभव?
पांबदी के पीछे का इरादा सही हो सकता है. लेकिन आयोजक दूसरा तरीका भी अपना सकते थे. वे स्पॉन्सरों, रूसी उद्योगपतियों, राजनीति और पुतिन के करीबी लोगों से किसी खिलाड़ी के संबंधों की जांच करवा सकते थे. उस आधार पर फैसला कर सकते थे. इतना ही नहीं, विंबल्डन का आयोजक- ऑल इंग्लैंड क्लब, रूसी और बेलारूसी खिलाड़ों को एक न्यूट्रल झंडे तले खेलने का मौका दे सकता था, जैसे कि ATP और WTA टूर्नामेंटों में होता है.
यह खिलाड़ियों के साथ भेदभाव का एक मामला है, जो पूरी तरह से उनकी राष्ट्रीयता के साथ जुड़ा है. साझा सजा और प्रतीकों की राजनीति की एक बड़ी और भद्दी नुमाइश. जरा सोचिए, अगर विंबल्डन के आयोजक चर्च रोड की शुरुआत में पासपोर्ट चेक करने लगें और रूसी-बेलारूसी लोगों को आगे ना जाने दें तो? सोच से परे है ना?
ब्लॉग: डेविड फोरहोल्ट
Source: DW
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