पुतिन की ज़िंदगी का वो क़िस्सा, जब वो नेटो के विरोधी बन गए

''रूस क्या चाहता है? क्या रूस वाक़ई यूक्रेन के हिस्से को ख़ुद में मिलाना चाहता है? मेरा मानना है कि पुतिन दबाव बना रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वह ये काम कर सकते हैं. वह जानते हैं कि यूरोपियन यूनियन में दरार डाल सकते है.''

''लेकिन जो चीज़ वह वाक़ई चाहते हैं, वो है- सम्मान...और किसी को सम्मान देने में बहुत कम ख़र्च होता है. सच कहिए तो कुछ भी ख़र्च नहीं होता है. हमें चीन के ख़िलाफ़ रूस की ज़रूरत है. हमें रूस को चीन से दूर रखना होगा. यूक्रेन में जो कुछ भी हो रहा है, हमें उसे भी देखना है. क्राइमिया प्रायद्वीप अब जा चुका है और इसे रूस कभी वापस नहीं करेगा. यही सच है.''

भारत में 20 जनवरी को इसी बयान के कारण जर्मन नेवी प्रमुख को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. जर्मन नेवी प्रमुख के इस्तीफ़े और उनके बयान पर रूस ने भी प्रतिक्रिया दी है.

रूसी समाचार एजेंसी ताश के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी दमित्री पेस्कोव ने कहा, ''जर्मन नेवी प्रमुख के बयान से साफ़ होता है कि यूरोपियन यूनियन में सभी बेपटरी नहीं हुए हैं और ऐसे लोग भी हैं, जो सही बात करते हैं.''

दमित्री पेस्कोव ने कहा, ''हमें उस बयान के बारे में पता है. हालांकि इस बयान का नेटो और ईयू के रुख़ से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन इस बयान का मतलब है कि यूरोप में हर कोई पटरी से नहीं उतर गया है. गंभीर लोग भी हैं जो सच्चाई बोल सकते हैं. ऐसे लोग सही पक्ष को देखना चाहते हैं.''

जर्मन नेवी प्रमुख का यह बयान यूरोपीय संघ और अमेरिका के आधिकारिक रुख़ से बिल्कुल उलट था. अमेरिका और ईयू का कहना है कि 2014 में यूक्रेन से क्राइमिया को रूस ने अवैध तरीक़े से मिलाया था और यह अस्वीकार्य है. अमेरिका और ईयू क्राइमिया को वापस देने की मांग करते हैं.

लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मन नेवी प्रमुख की बातों में दम है और पुतिन को सम्मान देने वाली बात भी तार्किक है.

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नेटो का बनना

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था. इसे बनाने वाले अमेरिका, कनाडा और अन्य पश्चिमी देश थे. इसे इन्होंने सोवियत यूनियन से सुरक्षा के लिए बनाया था. तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन.

शुरुआत में नेटो के 12 सदस्य देश थे. नेटो ने बनने के बाद घोषणा की थी कि उत्तरी अमेरिका या यूरोप के इन देशों में से किसी एक पर हमला होता है तो उसे संगठन में शामिल सभी देश अपने ऊपर हमला मानेंगे. नेटो में शामिल हर देश एक दूसरे की मदद करेगा.

लेकिन दिसंबर 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद कई चीज़ें बदलीं. नेटो जिस मक़सद से बना था, उसकी एक बड़ी वजह सोवियत यूनियन बिखर चुका था. दुनिया एक ध्रुवीय हो चुकी थी. अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बचा था. सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद रूस बना और रूस आर्थिक रूप से टूट चुका था.

रूस एक महाशक्ति के तौर पर बिखरने के ग़म और ग़ुस्से से ख़ुद को संभाल रहा था. कहा जाता है कि अमेरिका चाहता तो रूस को भी अपने खेमे में ले सकता था लेकिन वो शीत युद्ध वाली मानसिकता से मुक्त नहीं हुआ और रूस को भी यूएसएसआर की तरह ही देखता रहा.

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पुतिन को अलग-थलग छोड़ा गया?

जॉर्ज रॉबर्टसन ब्रिटेन के पूर्व रक्षा मंत्री हैं और वह 1999 से 2003 के बीच नेटो के महासचिव थे. उन्होंने पिछले साल नवंबर महीने में कहा था कि पुतिन रूस को शुरुआत में नेटो में शामिल करना चाहते थे लेकिन वह इसमें शामिल होने की सामान्य प्रक्रिया को नहीं अपनाना चाहते थे.

जॉर्ज रॉबर्टसन ने कहा था, ''पुतिन समृद्ध, स्थिर और संपन्न पश्चिम का हिस्सा बनना चाहते थे.''

पुतिन 2000 में रूस के राष्ट्रपति बने थे. जॉर्ज रॉबर्टसन ने पुतिन से शुरुआती मुलाक़ात को याद करते हुए बताया है, ''पुतिन ने कहा- आप हमें नेटो में शामिल होने के लिए कब आमंत्रित करने जा रहे हैं? मैंने जवाब में कहा- हम नेटो में शामिल होने के लिए लोगों को बुलाते नहीं हैं. जो इसमें शामिल होना चाहते हैं, वे आवेदन करते हैं. इसके जवाब में पुतिन ने कहा- मैं उन देशों में नहीं हूँ कि इसमें शामिल होने के लिए आवेदन करूं.''

लॉर्ड रॉबर्टसन ने यह बात सीएनएन के पूर्व पत्रकार माइकल कोसिंस्की के 'वन डिसिजन पोडकास्ट' में कही थी.

रॉबर्टसन की बातों पर इसलिए भी भरोसा किया जा सकता है क्योंकि पुतिन ने पाँच मार्च 2000 को बीबीसी के डेविड फ्रॉस्ट को दिए इंटरव्यू में कुछ ऐसा ही कहा था. डेविड फ्रॉस्ट ने अपने सवाल में पुतिन से पूछा था, "नेटो को लेकर आप क्या सोचते हैं? नेटो को आप संभावित साझेदार के तौर पर देखते हैं या एक प्रतिद्वंद्वी या फिर दुश्मन?"

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इसके जवाब में पुतिन ने कहा था, ''रूस यूरोप की संस्कृति का हिस्सा है. मैं ख़ुद अपने देश की कल्पना यूरोप से अलगाव में नहीं कर सकता. हम इसे ही अकसर सभ्य दुनिया कहते हैं. ऐसे में नेटो को दुश्मन के तौर पर देखना मेरे लिए मुश्किल है. मुझे लगता है कि इस तरह का सवाल खड़ा करना भी रूस या दुनिया के लिए अच्छा नहीं होगा. इस तरह का सवाल ही नुक़सान पहुँचाने के लिए काफ़ी है.''

''रूस अपने साझेदारों से बराबारी और न्यायसंगत संबंध चाहता है. जिन साझे हितों पर पहले से सहमति है, उनसे अलग होना मुख्य समस्या है. ख़ासकर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को हल करना अहम है. हम बराबरी के सहयोग और साझेदारी के लिए तैयार हैं. हम नेटो के साथ सहयोग के लिए बात कर सकते हैं लेकिन यह तभी संभव होगा, जब रूस को बराबरी के साझेदार के तौर पर रखा जाएगा. आप जानते हैं कि हम पूरब में नेटो के विस्तार का विरोध करते रहे हैं.''

डेविड फ्रॉस्ट ने दूसरा सवाल पूछा था, क्या यह संभव है कि रूस नेटो में शामिल हो जाए? इस सवाल के जवाब में पुतिन ने कहा था, ''ऐसा नहीं होने के कारण नहीं हैं. मैं ऐसी संभावनाओं को ख़ारिज नहीं करता हूँ. लेकिन मैं इस बात को दोहराता हूँ कि रूस बराबरी के साझेदार के तौर पर ही आएगा. मैं इस बात पर बार-बार ज़ोर दे रहा हूँ. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में हुई थी. उसके सिद्धांत उन्हीं परिस्थितियों से निकले थे. यह सही है कि हालात बदल सकते हैं. चलिए मान लेते हैं कि उन्होंने इसी हिसाब से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक नई व्यवस्था बनाई. लेकिन यह दिखाना या इस धारणा से आगे बढ़ना कि रूस को इससे कोई लेना-देना नहीं है और इस प्रक्रिया से बाहर रखना, शायद ही संभव है.''

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पुतिन ने कहा था, ''जब हम नेटो के विस्तार का विरोध करते हैं तो आप इसका ध्यान रखिए कि हमने कभी यह नहीं कहा है कि दुनिया के किसी ख़ास इलाक़े में हमारा कोई विशेष हित है. हम रणनीतिक साझेदारी की बात करने को प्राथमिकता देते हैं. हमें इस प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिश ही हमारे विरोध और चिंता के कारण हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि हम दुनिया से ख़ुद को अलग-थलग करने जा रहे हैं. अलगाव कोई विकल्प नहीं है.''

कहा जा रहा है कि पुतिन की शख़्सियत और सोच पिछले 21 सालों में सत्ता में रहने के दौरान अतीत और वर्तमान दोनों से प्रभावित हुई है. यूक्रेन में 2004 में ऑरेंज रिवॉल्युशन स्ट्रीट प्रदर्शन के बाद पुतिन पश्चिम के लिए संदिग्ध होते गए.

पुतिन ने इस प्रदर्शन के पीछे लोकतंत्र समर्थक एनजीओ का हाथ बताया था. लेकिन नेटो के विस्तार को लेकर पुतिन का ग़ुस्सा बढ़ता गया. मध्य और पूर्वी यूरोप में रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, लातविया, इस्टोनिया और लिथुआनिया भी 2004 में नेटो में शामिल हो गए थे. क्रोएशिया और अल्बानिया भी 2009 में शामिल हो गए. जॉर्जिया और यूक्रेन को भी 2008 में सदस्यता मिलने वाली थी लेकिन दोनों अब भी बाहर हैं.

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नेटो का अनुच्छेद पांच क्या है?

रॉबर्टसन ने ही नेटो में अनुच्छेद पाँच लागू किया था. इसे 9/11 के बाद लागू किया गया था. अनुच्छेद पाँच को लागू करना सबसे बड़ा दांव माना जाता है. इसके बाद नेटो की यह छवि बनी कि यह गठबंधन अपनी सुरक्षा के लिए केवल नहीं है बल्कि अपने हितों के लिए दूसरों पर हमला भी कर सकता है.

अमेरिका ने 2003 में जब इराक़ पर हमला किया तब भी अनुच्छेद पाँच का सहारा लिया गया. इसे लेकर नेटो में मतभेद भी था. रॉबर्टसन ने बताया है ''तब एक मंत्री ने उनसे पूछा था- इसका मतलब यह हुआ कि हम इराक़ पर हमले के लिए उन्हें ब्लैंक चेक दे रहे हैं?''

अब एक बार फिर से पुतिन ने अपनी सेना को यूक्रेन की सरहद पर लगा दिया है. नेटो भी यूक्रेन के समर्थन में खड़ा है. कहा जा रहा है कि पुतिन कभी भी यूक्रेन पर हमले का आदेश दे सकते हैं.

पुतिन अमेरिका और यूरोप के सामने तनाव कम करने की एक शर्त रख रहे हैं. शर्त है कि यूक्रेन कभी नेटो में शामिल नहीं होगा. पुतिन कभी नेटो में ख़ुद शामिल होना चाहते थे अब वही पुतिन नेटो में किसी देश के शामिल होने के ख़िलाफ़ इस क़दर हैं कि सेना की तैनाती तक कर दी है.

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