China-Philippines clash: ज्वालामुखी की तरह दुनिया को जला सकता है दक्षिण चीन सागर, जानिए क्या है विवाद?
China-Philippines clash: 26 अगस्त को फिलीपींस सरकार ने चीन पर दक्षिण चीन सागर में "बार-बार आक्रामक, गैर-पेशेवर और अवैध" कार्रवाई करने का आरोप लगाया था। इसके बाद के एक हफ्ते में कई बार चीनी और फिलीपींस की जहाजों के बीच आमने-सामने की टक्कर हो चुकी है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर दक्षिण चीन सागर विवाद को सामने ला दिया है। आशंका तो यहां तक बढ़ रही है, कि दोनों ही देश किसी बड़े संघर्ष में फंस सकते हैं। लेकिन, ये विवाद क्या है? यह कब और क्यों उभरा? कौन-कौन से देश इसमें शामिल हैं? आइए नजर डालते हैं।

दक्षिण चीन सागर विवाद क्या है?
दक्षिण चीन सागर, चीनी मुख्य भूमि के ठीक दक्षिण में स्थित है और इसकी सीमा ब्रुनेई, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान और वियतनाम देशों से लगती है। सदियों से ये देश समुद्र में क्षेत्रीय नियंत्रण को लेकर झगड़ते रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में तनाव नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया है।
यह मुख्य रूप से चीन के वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने की वजह से है। दक्षिण चीन सागर, रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में से एक है और चीन इस क्षेत्र पर ज्यादा शक्ति का दावा करने के लिए इस पर नियंत्रण चाहता है।
1947 में, राष्ट्रवादी कुओमिन्तांग पार्टी के शासन के तहत, चीन ने तथाकथित "नौ-डैश लाइन" के साथ एक मानचित्र जारी किया था। यह रेखा अनिवार्य रूप से दक्षिण चीन सागर के बीजिंग के दावे वाले पानी और द्वीपों को घेरती है - और इसके तहत चीन ने इस समुद्र के 90% हिस्से पर अपना दावा किया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सत्ता में आने के बाद भी यह रेखा आधिकारिक मानचित्रों में दिखाई देती रही है।
पिछले कुछ सालों में चीन ने अन्य देशों को उसकी सहमति के बिना कोई भी सैन्य या आर्थिक अभियान चलाने से रोकने की कोशिश की है और दावा किया है, कि समुद्र उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के अधीन है। चीन का कहना है, कि उसके अलावा दक्षिण चीन सागर के एक इंच जगह पर भी किसी का अधिकार नहीं है।
हालांकि, चीन के व्यापक दावों का अन्य देशों की तरफ से भारी विरोध किया गया है। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) के मुताबिक, विरोध के जवाब में, चीन ने द्वीपों के आकार को भौतिक रूप से बढ़ा दिया है और समुद्र में नए द्वीप बना दिए हैं।
इसमें आगे कहा गया है, "मौजूदा चट्टानों पर रेत जमा करने के अलावा, चीन ने बंदरगाह, सैन्य प्रतिष्ठान और हवाई पट्टियां बनाई हैं- विशेष रूप से पैरासेल और स्प्रैटली द्वीपों में, जहां इसकी क्रमशः बीस और सात चौकियां हैं। चीन ने लड़ाकू जेट, क्रूज मिसाइल और एक रडार प्रणाली तैनात करके वुडी द्वीप का सैन्यीकरण किया है।"
चीन के क्षेत्रीय दावों को चुनौती देने और अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए अमेरिका ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। उसने न केवल दक्षिण एशिया में अपनी सैन्य गतिविधि और नौसैनिक उपस्थिति बढ़ाई है, बल्कि चीन के विरोधियों को हथियार और सहायता भी प्रदान की है।

दक्षिण चीन सागर का क्या महत्व है?
यूनाइटेड स्टेट्स एनर्जी इन्फॉर्मेशन एजेंसी के अनुमान के मुताबिक, दक्षिण चीन सागर के नीचे 11 बिलियन बैरल तेल और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस भंडार हैं। इसके अलावा, समुद्र में समृद्ध मछली पकड़ने के मैदान हैं - जो पूरे क्षेत्र में लाखों लोगों के लिए इनकम का एक प्रमुख स्रोत है।
बीबीसी ने बताया है, कि दुनिया के आधे से ज़्यादा मछली पकड़ने वाले जहाज इसी क्षेत्र में चलते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि समुद्र एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग है। समाचार आउटलेट ने कहा है, कि "व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का अनुमान है, कि 2016 में वैश्विक व्यापार का 21% से ज़्यादा हिस्सा, जो 3.37 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है, वो इन जल क्षेत्रों से होकर गुजरता है।"
नाइन डैश लाइन क्या है?
नौ-डैश लाइन चीनी मानचित्रों पर समुद्र में चीन के क्षेत्रीय दावों को सीमांकित करती है। सीएफआर ने कहा है, कि यह शुरू में "ग्यारह-डैश लाइन" थी, लेकिन 1953 में, चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार ने "टोंकिन की खाड़ी को घेरने वाले हिस्से को हटा दिया, जिससे सीमा को नौ डैश तक सरल बना दिया गया।"
यह रेखा चीनी मुख्य भूमि से 2,000 किलोमीटर दूर तक फैली हुई है और फिलीपींस, मलेशिया और वियतनाम के कुछ सौ किलोमीटर के भीतर है।
लेकिन चीन ने किन मापदंडों के आधार पर यह रेखा खींची? चीन का दावा है, कि सीमा के भीतर पानी और द्वीपों पर उसका दावा उसके "ऐतिहासिक समुद्री अधिकारों" पर आधारित है। हालांकि, देश ने कभी भी रेखा को लेकर स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन यह रेखा समुद्री क्षेत्रीय मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र संधि के तहत बनाई गई सीमा से कई मील आगे तक फैली हुई है, जिस पर चीन ने हस्ताक्षर किए हैं।

किन किन द्वीपों पर दावा करता है चीन?
स्कारबोरो शोल इसका उदाहरण है, जिसे हुआंगयान द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि यह फिलीपींस के इकोनॉमिक जोन में आता है, लेकिन बीजिंग का दावा है, कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि "चीन के नाविकों ने 2,000 साल पहले हुआंगयान द्वीप की खोज की थी और उसने सोंग राजवंश (960-1279 ई.) से लेकर आधुनिक काल तक शोल में यात्राओं, मानचित्रण अभियानों और निवास के व्यापक रिकॉर्ड का हवाला दिया है और उस आधार पर इस क्षेत्र के अपना होने का दावा किया है।"
इसी तरह, चीन का कहना है, कि पैरासेल और स्प्रैटली द्वीप श्रृंखलाओं के साथ उसके सदियों पुराने संबंध हैं क्योंकि वे कभी चीनी राष्ट्र का अभिन्न अंग थे। लेकिन वियतनाम इस दावे पर विवाद करता है, और कहता है, कि उसने 17वीं शताब्दी से पैरासेल और स्प्रैटली दोनों पर सक्रिय रूप से शासन किया है - और उसके पास इसे साबित करने के लिए दस्तावेज हैं।
2016 में, जब फिलीपींस ने स्कारबोरो शोल पर विवाद को लेकर चीन को एक अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में खींचा, तो कोर्ट ने अपने फैसले में नौ-डैश लाइन को बड़े पैमाने पर खारिज कर दिया और कहा, "चीन ने फिलीपीन जहाजों को खतरे में डालकर और समुद्री पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर अंतरराष्ट्रीय कानून को तोड़ा है।"
लेकिन, इंटरनेशनल कोर्ट का फैसला बाध्यकारी होने के बाद भी इसे चीन ने मानने से इनकार कर दिया।
विवाद का समाधान कैसे हो सकता है?
दक्षिण चीन सागर विवाद को कैसे सुलझाया जा सकता है, ये कहना काफी मुश्किल है। विवाद का तत्काल समाधान असंभव दिख रहा है, खासकर जब चीन ने इंटरनेशनल कोर्ट के फैसले को मानने से ही इनकार कर दिया।
कुछ लोगों का मानना था, कि आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) - एक 10 सदस्यीय क्षेत्रीय समूह जिसमें थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, ब्रुनेई, लाओस, वियतनाम, म्यांमार और कंबोडिया शामिल हैं - इस मुद्दे से निपटने का कोई रास्ता खोज सकता है। लेकिन आंतरिक संघर्षों के की वजह से ये समूह ऐसा करने में काफी हद तक नाकाम रहा है।
इसलिए, यह डर स्पष्ट है कि दक्षिण चीन सागर विवाद जल्द ही अगला वैश्विक संघर्ष बन सकता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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