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पाकिस्तान को तोड़कर सिंधुदेश बनाने की मांग तेज.. बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान.. और कितना टूटेगा जिन्ना का देश?

Sindhudesh: मोहम्मद अली जिन्ना ने भारतवर्ष के साथ गद्दारी की और मुसलमानों के नाम पर देश के दो टुकड़े करवा डाले। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ, लेकिन जिन्ना ने जो किया, उसकी गद्दारी का शाप आज भी पाकिस्तान भोग रहा है।

1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ, लेकिन अब फिर से पाकिस्तान की विभाजन की मांग तेजी से उठने लगी है।

किसी भी धार्मिक या अन्य भेदभाव के बिना जातीय सिंधियों के लिए एक अलग मातृभूमि 'सिंधुदेश' के सवाल ने पाकिस्तान के अस्तित्व के सात दशकों में लगातार व्यापक समर्थन हासिल किया है।

इस आंदोलन को पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की व्यवस्थित दमनकारी नीतियों द्वारा गति दी गई है, जिस पर शुरुआत में उर्दू भाषी मुहाजिरों का वर्चस्व था और धीरे-धीरे पाकिस्तानी पंजाबियों ने उन्हें पीछे छोड़ दिया।

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बलूचिस्तान की तरह सिंधुदेश में भी वहां के मूल निवासियों के साथ पाकिस्तान की सेना ने लगातार दमन किया है, वहां के लोगों के अधिकारों को कुचला है, वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूटा है और सिंधुदेश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटकर पंजाब की सेना और पंजाब के नेताओं ने अपने पेट को भरा है।

लेकिन, बदले में पाकिस्तान के राष्ट्रीय वित्त आयोग ने सिंध के लोगों को विकास के नाम पर ढेला ही थमाया है, लिहाजा सिंध के मूल निवासियों में गुस्सा फूटना लाजिमी था, जो फूटा भी है।

सिंधुदेश आंदोलन क्या है?

सिंधुदेश आंदोलन का जन्म 1950 के दशक में विवादित 'वन यूनिट प्लान' के तहत पाकिस्तान की राजनीति के केंद्रीकरण से हुई, जिसमें सिंध, बलूचिस्तान, पाकिस्तान पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) के प्रांतों को एक देश में पुनर्गठित किया गया था, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) को भी शामिल किया गया था।

इस एकीकरण के तहत तमाम जगहों पर उर्दू भाषा और उर्दू शासन को जबरदस्ती लागू करना था और इसी कड़ी में 1950 की दशक में मोहम्मद अली जिन्ना ने ढाका में अंग्रेजी में भाषण देते हुए कहा था, कि बांग्लादेश की राष्ट्रीय भाषा बंगाली नहीं, बल्कि उर्दू होगी।

अत्यधिक केंद्रीकरण का यह निरंकुश कदम 1970 तक जारी रहा, जब जनरल याह्या खान के नेतृत्व में सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंका था और पाकिस्तान में पहली बार सैनिक शासन लगी थी। जिसके खिलाफ लोगों में व्यापक आक्रोश फैल गया और देश में क्षेत्रीय स्वायत्तता और संघवाद की मांग शुरू हो गई।

सिंधी राष्ट्रवादी, इस समय को अपने इतिहास का "सबसे काला युग" मानते हैं, क्योंकि इसी दौरान सिंध प्रांत, पूरी तरह से पाकिस्तानी पंजाबियों के प्रभुत्व में आ गया था।

सिंध के लोगों में असंतोष आजादी के बाद से ही फैसना शुरू हो गया था, क्योंकि पाकिस्तान बनने के बाद भारत से गये ज्यादातर मुसलमानों ने सिंध में शरण पाई और उर्दू भाषी ये मुसलमान, पाकिस्तान में मुहाजिर कहलाए, जिनके साथ सौतेला सलूक किया जाने लगा, जो अभी तक चल रहा है।

इसलिए, वन-यूनिट योजना ने सिंध के लोगों में असंतोष को बढ़ावा दिया, क्योंकि इसने सिंध की वास्तविक पहचान को मिटाना शुरू कर दिया। उर्दू को पूरे पाकिस्तान में थोप दिया गया, जससे सिंध की मूल भाषा खत्म होने लगी। स्कूलों में उर्दू पढ़ाना निश्चित कर दिया गया, जिससे लोगों में यह धारणा बन गई, कि उनका सांस्कृतिक इतिहास खतरे में है।

पाकिस्तान के प्रसिद्ध इतिहासकार फरहान हनीफ सिद्दीकी ने अपनी 2012 की किताब, 'द पॉलिटिक्स ऑफ एथनिसिटी इन पाकिस्तान' में तर्क दिया है, कि भाषा थोपे जाने के बाद सिंध मुश्किल हालातों में फंस गया, क्योंकि अब "उन्हें सरकारी नौकरियों और पदों के लिए आवेदन करने के पहले एक नई भाषा सीखना अनिवार्य हो गया।"

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गुलाम मुर्तजा सैयद ने उठाई सिंधुदेश की मांग

इन घटनाओं ने सिंधियों में लगातार अलगाव की भावना को जन्म दिया। आधुनिक सिंधी राष्ट्रवाद के संस्थापक जनक माने जाने वाले गुलाम मुर्तजा सैयद ने यहां तक कि, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर सिंध के प्रमुख शहर कराची को काटकर उसे खंडित करने और लियाकत अली खान के साथ केंद्रीय प्रशासन को सौंपने का आरोप लगाया था।

विभाजन के दौरान सामाजिक-आर्थिक रूप से प्रभावशाली हिंदुओं का भारत भागना भी सिंधियों कोई फायदा नहीं दे सका, क्योंकि भारत से गये मुस्लिम मुहाजिरों ने उनकी संपत्तियों के साथ-साथ प्रशासनिक नौकरियों पर भी कब्जा कर लिया और इसलिए उन्हें सामाजिक-आर्थिक पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर रखा गया।

लिहाजा, पाकिस्तानी सत्ता के हाथों लगातार हाशिए पर रहने के बाद, सैयद ने पहली बार सिंध की आजादी और 1972 में जातीय सिंधुदेश की स्थापना का आह्वान किया। आजादी के लिए ये आह्वान बांग्लादेश के निर्माण के माध्यम से पाकिस्तान के विभाजन से भी प्रभावित थे।

सैयद की 1974 की पुस्तक "ए नेशन इन चेन्स: सिंधुदेश" में, जो सिंधुदेश का एक खाका और उनकी अवधारणा प्रदान करती है, उसमें दावा किया है, कि सिंध एक विशिष्ट भाषा और संस्कृति को संजोता है, सिंधु घाटी सभ्यता और 5,000 साल पुराने इतिहास का घर है। जिसे कोई भी राष्ट्र और दुनिया का कोई भी देश अपने पास रखने और उसे संजोने में सबसे बड़ा गर्व महसूस करेगा।"

सैयद, जिन्होंने सिंधी राष्ट्रवादी राजनीति के लिए लगभग 30 वर्षों तक कारावास का सामना किया, उन्होंने 1972 में जय सिंध महाज़ की स्थापना करके आंदोलन को एक संगठनात्मक आकार दिया, जिसने सिंध की मुक्ति और सिंधुदेश की स्थापना के लिए अपने खुले आह्वान से पाकिस्तानी राज्य को नाराज कर दिया।

पाकिस्तानी सेना के अड़ियल रवैये को देखते हुए, आंदोलन धीरे-धीरे एक सशस्त्र संघर्ष में बदल गया, जहां कई संगठनों ने सिंधुदेश स्थापना का मुद्दा उठाया है। कुछ प्रमुख प्रतिरोध समूहों में सिंधुदेश लिबरेशन आर्मी (एसएलए), जेय सिंध कौमी महाज़ (जेएसक्यूएम), जेय सिंध मुत्तहिदा महाज़ (जेएसएमएम), जेय सिंध स्टूडेंट्स फेडरेशन (जेएसएसएफ) शामिल हैं और ये संगठन अब सिंधुदेश की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं।

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