क्या होगा, अगर भारत, चीन और रूस दोस्त बन जाएं? क्या ऐसा संभव है? अमेरिका की मनमर्जी हो जाएगी खत्म?

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब कड़वे से कड़वे दुश्मन जिगरी दोस्त बने हैं और इतिहास ऐसे उदाहरणों से भी अटा पड़ा है, जब एक दूसरे के लिए जान देने वाले दोस्त, एक दूसरे की जान लेने पर आमादा हो गये हों।

नई दिल्ली, अप्रैल 27: इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब कड़वे से कड़वे दुश्मन जिगरी दोस्त बने हैं और इतिहास ऐसे उदाहरणों से भी अटा पड़ा है, जब एक दूसरे के लिए जान देने वाले दोस्त, एक दूसरे की जान लेने पर आमादा हो गये हों। खासकर जियो पॉलिटिक्स... यानि दुनिया की राजनीति में सहयोगियों का बदलना आपसी हितों के आधार पर तय किया जाता है। दुनिया में अभी भी सुपरपावर अमेरिका भी है और रूस को अमेरिका ने जिस तरह से प्रतिबंधों के जाल में जकड़ा है और भारत समेत कई देशों पर जिस तरह से अमेरिकन नीति ही मानने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की है, वो साफ तौर पर अमेरिका की जिद, अहंकार और सबसे ताकतवर होने की बात को दर्शाता है। लेकिन, यूक्रेन युद्ध के बाद एक सवाल ज्यादातर लोगों के जेहन में उठ रहे हैं और वो सवाल ये, कि क्या होगा, अगर भारत, चीन और रूस एक साथ आ जाएं? क्या ये 'गठबंधन' बन पाएगा? क्या अमेरिका की वर्चस्ववादी आदतों को काउंटर कर पाएगा? आइये जानने की कोशिश करते हैं।

ना स्थाई दोस्त, ना स्थाई दुश्मन

ना स्थाई दोस्त, ना स्थाई दुश्मन

19वीं शताब्दी की दुनिया में पूरी दुनिया में ब्रिटेन की बादशाहत थी और ब्रिटिश एंपायर ने पूरी दुनिया में 'द ग्रेट गेम' खेला। ब्रिटेन ने नौसेना का निर्माण किया, जिसके साथ मिलकर जापान ने साल 1905 में रूस को हरा दिया, लेकिन 20वीं सदी की शुरूआत में दो विश्वयुद्ध लड़े गये और ब्रिटेन और रूस एक साथ थे, जबकि जापान उनके खिलाफ था। रूस और चीन ने 1929 में एक युद्ध और 1969 में एक अघोषित सीमा युद्ध लड़ा, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के खिलाफ दोनों देशों के साझा हित सामने आते हैं, लिहाजा अमेरिका और पश्चिमी देशों को लेकर ज्यादातर मुद्दों पर दोनों एक साथ ही होते हैं। आज भारत और चीन को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी और दुश्मन कहा जाता है, जबकि 1962 से पहले 'हिंदी चीनी भाई-भाई' नारा लगता था। लेकिन, क्या ये दोनों दुश्मन आज के रणनीतिक साझेदारी बना सकते हैं? भारत और चीन के बीच एक लंबे समय से सीमा विवाद है, जिसके कारण 1962 के बाद 1967 के संघर्ष में कई सौ लोग हताहत हुए और हालिया समय में भी डोकलाम में हिंसक संघर्ष हो चुका है। लेकिन तीन कारण हैं, कि अगले कई वर्षों में राजनयिक क्रांति क्यों हो सकती है?

एशिया की जनसांख्यिकी स्थिति को समझिए

एशिया की जनसांख्यिकी स्थिति को समझिए

जैसे-जैसे वर्तमान सदी आगे बढ़ रही है, भारत में चीन की तुलना में कहीं अधिक कामकाजी उम्र के लोग होंगे। और अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो एशिया की मुस्लिम जनसंख्या के मुकाबले में कम पढ़े-लिखे लोगों की आबादी भारत और चीन को मिलाकर बराबर हो जाएगी। यह एक आर्थिक अवसर और एक अस्तित्वगत चुनौती दोनों प्रस्तुत करता है। यह एक धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षिक स्तर का मामला है और यह ग्लोबल राजनीतिक को काफी प्रभावित करता है। और इसीलिए बाकी बचा पूर्वी एशिया महत्वहीन हो जाएगा। जापान में अब 15 से 49 वर्ष की आयु के 5 करोड़ नागरिक हैं, लेकिन वर्तमान प्रजनन दर के ट्रेंड को देखें, तो इस सदी के अंत तक जापान में सिर्फ 2 करोड़ लोग ही होंगे। वहीं, दक्षिण कोरिया में 15-49 आयु वर्ग के केवल 68 लाख लोग ही होंगे, जबकि आज यहां करीब 2 करोड़ 50 लाख लोग रहते हैं। वहीं, ताइवान की आबादी 1.2 करोड़ से गिरकर सिर्फ 38 लाख रह जाएगा। यहां इस पर ध्यान देना जरूरी है, कि हम 15-49 आयुवर्ग के लोगों की बात कर रहे हैं।

भारत ने अमेरिका को चौंकाया

भारत ने अमेरिका को चौंकाया

भारत ने यूक्रेन संकट पर अपने दीर्घकालिक सहयोगी रूस को छोड़ने से इनकार करके संयुक्त राज्य अमेरिका को चौंका दिया है। अमेरिकी प्रतिबंधों का समर्थन करने की बात तो दूर, भारत ने रूस के साथ रूबल और रुपये में व्यापार करने और रूस की सरप्लस आय को भारतीय कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में निवेश करने के लिए स्थानीय-मुद्रा स्वैप और निवेश तंत्र पर काम किया है। जिसके प्रतिशोध में, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत पर मानवाधिकारों के हनन की बात करनी शुरू कर दी, जबकि वो ये भूल गये, कि इसी अमेरिका में मुसलमानों को कितना परेशान किया गया है और पुर्ववर्ती ट्रंप शासन में कई देशों के मुस्लिमों के अमेरिका जाने पर ही पाबंदी लगा दी गई थी। लेकिन, इस बार भारत चुप नहीं रहा। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तीखी प्रतिक्रिया दी कि संयुक्त राज्य अमेरिका में मानवाधिकारों की स्थिति पर भारत ने चिंता जताकर साफ कर दिया, कि हमारे रिश्ते दोस्ती के हो सकते हैं, 'गुलामों' वाले नहीं।

अमेरिकी अपमान बर्दाश्त नहीं

अमेरिकी अपमान बर्दाश्त नहीं

अमेरिका बार बार चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों पर अत्याचार के आरोप लगाता रहा है और अमेरिका ने तो पिछले साल शिनजियांग प्रांत में बनने वाले सामानों पर प्रतिबंध तक लगा दिया था। और अमेरिका बार बार भारत के साथ भी यही खेल खेलता रहा है और अमेरिकी संकेत साफ है, कि यूक्रेन और रूस के मुद्दे पर भारत ने जो रूख अख्तियार कर रखा है, उससे अमेरिका बौखलाया हुआ है और अगर अमेरिका के पास इंडो-पैसिफिक की मजबूरिया नहीं होतीं और भारत की स्थिति मजबूत नहीं होती, तो अमेरिका भारत पर भी प्रतिबंध लगाने से नहीं चूकता, जैसा की उसने पाकिस्तान पर 55 मिलियन डॉलर जुर्माना लगाकर किया है। वहीं, यूक्रेन को लेकर ऐसी वैश्विक परिस्थिति बनी, कि पहली बार भारत और चीन एक साथ आए। यूनाइटेड नेशंस में भारत और चीन का रूख रूस को लेकर एक समान था और सबसे दिलचस्प बात ये, कि भारत की मौजूदा विदेश नीति की चीन ने जमकर तारीफ की और चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की संपादकीय में ये तक लिखा गया, कि भारत ने अमेरिका को उसकी 'औकात' दिखा दी है और ये संपादकीय एक संकेत भर जरूर है, कि रूस पर भारत और चीन ने एक दूसरे के द्वारा उठाए गये कदमों पर बारीक नजर रख है।

अमेरिका ने मध्य एशिया को अस्थिर किया

अमेरिका ने मध्य एशिया को अस्थिर किया

अफगानिस्तान को बीच मंझधार में छोड़कर अमेरिकी फौज जिस तरह से निकली, उसने मध्य एशिया को अस्थिर बनाकर छोड़ दिया। अमेरिकी आक्रमण का उद्येश्य तालिबान को नष्ट करने का दावा था, लेकिन अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने से पहले तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था और उस दृश्य को भला कौन भूल सकता है, जब हवाई जहाज पर लटककर कुछ लोगों ने काबुल से भागने की कोशिश की थी और कई सौ मीटर की ऊंचाई से गिरकर मारे गये। ये दृश्य भी अमेरिकी स्वार्थ से ही बना था। अफगानिस्तान से अचानक निकलकर अमेरिका ने पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान सहित सीमावर्ती देशों में इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाने का निर्माण कर दिया, जिससे भारत को भी बड़ा खतरा है। वहीं, पाकिस्तान में हर दूसरे दिन ब्लास्ट होते रहते हैं और अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान और पाकिस्तानी सैनिक आमने-सामने आ चुके हैं।

भारत और चीन की एक चिंता

भारत और चीन की एक चिंता

इस साल जनवरी के महीने में कजाकिस्तान में फैली हिंसा को रोकने के लिए रूस ने अपने सैनिकों को भेजा, तो चीन ने उसका समर्थन कर दिया और इसकी साफ वजह शिनजियांग प्रांत को लेकर बीजिंग की चिंता है, जहां इस्लामिक चरमपंथियों को रोकने के लिए चीन पिछले कई सालों से लगातार कोशिश कर रहा है और इस कोशिश में निशाना बेगुनाह मुस्लिम बन रहे हैं। लेकिन, इसी चिंता ने दिसंबर 2021 में बीजिंग और नई दिल्ली को एक साथ उस वक्त ला दिया, जब दोनों देशों के विदेशमंत्रियों ने एक साथ मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक ही। अब हम एक बार फिर से जनसंख्या पर आते हैं। यदि वर्तमान प्रजनन दर भविष्य में भी इसी तरह से जारी रहती है, तो संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कार्यक्रम की गणना के मुताबिक, 15 से 49 वर्ष की आयु के चीन की जनसंख्या वर्तमान शताब्दी के दौरान लगभग आधी हो जाएगी, जबकि भारत की जनसंख्या चीन के मुकाबले थोड़ी बढ़ जाएगी। और चीन की आबादी बढ़ाने की कोशिशें अभी तक नाकाम हुई हैं और अगर भारत की जनसंख्या बढ़ती है, तो रणनीतिक तौर पर भारत को इसका फायदा होगा, भारतीय उपभोक्ता बाजार के नजरिए से इसे देखें तो।

अब आते हैं अर्थव्यवस्था पर...

अब आते हैं अर्थव्यवस्था पर...

चीन ने हमेशा से अपनी बचत को अमेरिका में निवेश किया है और पिछले 30 सालों से अमेरिका दुनिया के अधिकांस बचत को अपने यहां रख रहा है, लेकिन पिछले कई सालों से चीन ने उस बचत को अमेरिका में नहीं रखकर अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में लगाना शुरू कर दिया है, इसके साथ ही चीन ने कमजोर शासन व्यवस्था और अशिक्षित राष्टों को अपने 'कर्ज जाल' में फंसाना शुरू कर दिया है। लेकिन, श्रीलंका, पाकिस्तान और कई अफ्रीकी देशों की जो आर्थिक स्थिति बनी है, उसे देखकर अब यह नामुमकिन है, कि चीन का पैसा वापस आ पाए। चीन के नेशनल बैंक ने पिछले महीने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में यही कहा था और चीन के नेशनल बैंक ने पाकिस्तान जैसे देशों में सरकार को निवेश नहीं करने की सलाह दी थी। यानि, भारत ही दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसके पास चीन की बचत को अवशोषित करने के लिए पर्याप्त लोग और पर्याप्त शासन है। और भारत को जिस तरह के बुनियादी ढांचे और डिजिटल इन्फ्रांस्ट्रक्चर की जरूरत है, वो सिर्फ चीन ही पूरा कर सकता है। हालांकि, भारत चीन को लेकर काफी सतर्क है, लेकिन हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते, कि चिंतित होने के बाद भी भारत और चीन के बीच का व्यापार 120 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। वहीं, चीन के विपरीत, भारत का आर्थिक टेकऑफ़ लॉन्च के समय विफल रहा है। 1990 में दोनों देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी समान थी। आज चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से तिगुनी से भी थोड़ी ज्यादा है।

भारत बनाम चीन... इन्फ्रांस्ट्रक्चर

भारत बनाम चीन... इन्फ्रांस्ट्रक्चर

भारत अभी भी 20वीं सदी के अंत में अंग्रेजों द्वारा निर्मित रेलवे प्रणाली पर निर्भर है। चीन की 38% की तुलना में भारत की ग्रामीण आबादी कुल का 69% है। जिसके लिए सरकार को रेलमार्ग, राजमार्ग, बंदरगाह, बिजली स्टेशन और ब्रॉडबैंड इन्फ्रांस्ट्रक्चर के विकास की जरूरत होगी और इस काम में चीन माहिर है। लेकिन, हितों की स्वाभाविक समानता के बावजूद, भारत और चीन के बीच व्यापार 120 अरब डॉलर होने के बाद भी न्यूनतम बना हुआ है और उसकी सबसे बड़ी वजह चीन की विस्तारवादी नीति है और हालिया समय में दोनों देशों के संबंध काफी खराब ही हुए हैं। मार्च 2022 में भी भारत का चीनी निर्यात थाईलैंड के बराबर ही था और वियतनाम या दक्षिण कोरिया के निर्यात का आधा स्तर था। यह भारत-चीन शत्रुता की कीमत है।

जियो-पॉलिटिकल स्थिति

जियो-पॉलिटिकल स्थिति

पिछले एक साल में दो बार अमेरिकी विदेश नीति ने चीन, भारत और रूस को एक ही रणनीतिक कोने में धकेल दिया है। और यही वजह है, कि पिछले महीने चीन के विदेश मंत्री वांग यी अचानक भारत दौरे पर आ गये थे, जिसका मकसद पीएम मोदी को इस साल के अंत में होने वाले एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए चीन आमंत्रित करना था। वहीं, अमेरिका का भारत को लेकर इतिहास ऐसा रहा है, जिसपर अभी भी भारतीय जनता को विश्वास नहीं है। भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी होने के बाद भी भारतीय जनता दिल से रूस के साथ है और अमेरिका ने इस तथ्य को बार बार उजागर किया है और हालिया दिनों में अपनी बयानबाजी से अमेरिका ने ना सिर्फ भारत का अपमान करने की कोशिश की है, बल्कि जिस तरह का घमंड अमेरिका ने दिखाया है, उससे भारतीयों का विश्वास अमेरिका से और टूटा ही है।

चीन बदलेगा पाकिस्तान पॉलिसी?

चीन बदलेगा पाकिस्तान पॉलिसी?

पिछली दो पीढ़यों के दरम्यां चीन ने पाकिस्तान के साथ मजबूत संबंधों को विकसित किया है, जिसमें 62 अरब डॉलर की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिए 15 साल की प्रतिबद्धता, बेल्ट एंड रोड पहल का एक प्रमुख निवेश शामिल है। पाकिस्तान की सेना चीनी जे-10 और जे-17 लड़ाकू विमानों के साथ-साथ अमेरिकी एफ-16 भी उड़ाती है। चीनी वैज्ञानिकों ने पाकिस्तान के परमाणु हथियार कार्यक्रम में सहायता की और दोनों देशों ने उत्तर कोरिया को सहायता प्रदान की। लेकिन, चीन रिश्ता नहीं निभाता और वो एक व्यापारी है। वहीं, पिछले साल जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने जून में परिपक्व होने वाले ऋणों पर एक डिफ़ॉल्ट को रोकने के लिए चीन से 9 अरब डॉलर का कर्ज मांगा था, तो चीन ने कर्ज देने से इनकार कर दिया था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, पाकिस्तान पर चीन का 18.4 अरब डॉलर का कर्ज हो चुका है और चीन अब कहीं ना कहीं ये बात जानने लगा है, कि ये पैसा वापस नहीं आने वाला है। पाकिस्तान आर्थिक रूप से पिछड़ा है और राजनीतिक रूप से अनिश्चित है और आर्थिक भागीदार के रूप में अविश्वसनीय है। लिहाजा, सवाल ये है, कि क्या चीन भारत से संबंधों को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान को दरकिनार करेगा। हालांकि, भारत, चीन और रूस का एक साथ आना, एक काल्पनिक सवाल है, लेकिन, क्या अगर ये तीनों देश एक साथ आ गये...तो अमेरिका की बादशाहद और उसका घमंड खत्म हो जाएगा... ये एक बड़ा सवाल है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+