Special Report: म्यांमार में तानाशाह सैन्य शासन पर क्या सोचता है चीन और पाकिस्तान?

सेना ने सरकार का तख्तापलट करते हुए देश में सैन्य शासन की घोषणा कर दी है। म्यांमार की इस घटना पर पाकिस्तान और चीन क्या सोचता है।

China and Pakistan on Myanmar: नई दिल्ली: म्यांमार (Myanmar) में सेना(Military Rule) ने सरकार का तख्तापलट (Coup) करते हुए एक साल के लिए आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया है। जिसके बाद अब म्यांमार की सत्ता सेना के पास है। म्यांमार भारत का पड़ोसी देश है साथ ही उसके चीन (China) और पाकिस्तान (Pakistan) से भी संबंध हैं। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि चीन और पाकिस्तान म्यांमार में सैन्य शासन लागू होने के बाद क्या सोचता है। खासकर तब जब चीन में लोकतंत्र (Democracy) नहीं है और पाकिस्तान में भी कई बार सेना सरकार का तख्तापलट कर चुकी है।

myanmar

म्यांमार पर चीन का रूख

चीन (China) में कम्यूनिस्ट पार्टी (Communist Party) की सरकार है जिसके मुखिया शी जिनपिंग(Xi Jinping) हैं। चीन में लोकतंत्र की कल्पना करना ही नामुमकिन है। ऐसे में म्यांमार की सत्ता सेना के हाथ आने के बाद चीन म्यांमार को घरेलू बातचीत के जरिए समाधान निकालने की सलाह दे रहा है। चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अपने एडिटोरियल में लिखा है कि म्यांमार में लोकतत्र का भविष्य अनिश्चित है। ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में तख्तापलट का पूरा ब्योरा दिया गया है। लिखा गया है कि सोमवार सुबह सुबह म्यांमार की सेना ने म्यांमार स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और राष्ट्रपति को अनिश्चिकाल के लिए हिरासत में ले लिया है। और सेना ने एक साल के लिए म्यांमार में आपातकाल की घोषणा कर दी है।

MYANMAR

लोकतंत्र पर चीन का तंज

तानाशाह शासन का पक्षधर चीन विश्व की लोकतांत्रिक पद्धति पर तंज कसता दिख रहा है। ग्लोबल टाइम्स में लिखा गया है कि विश्व के कुछ ही देश हैं जहां ताकत दिखाकर लोकतंत्र लागू किया गया है। छोटे देशों के पास लोकतंत्र बहाल करने की शक्ति नहीं है। छोटे देश पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों की नकल करते हुए लोकतंत्र बहाल करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उन्हें लोकतांत्रिक पद्धति का खामियाजा भुगतना पड़ता है। छोटे देशों के पास नये पॉलिटिकल सिस्टम को बहाल करने का कोई विकल्प नहीं बचता है।

ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि म्यांमार में गहराती जा रही राजनीतिक संकट का ही नतीजा सैन्य शासन है। म्यांमार पर फिर से लोकतंत्र बहाल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जाएगा। खुद म्यांमार की सबसे बड़ी नेता आंग सान सू की ने लोगों से सैन्य शासन के खिलाफ सड़क पर उतरने की अपील की है। अमेरिका समेत कई देशों ने म्यांमार सेना से आंग सान सू की समेत तमाम नेताओं को रिहा करने के लिए कहा है। ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक साउथ एशिया का पॉलिटिकल सिस्टम वेस्टर्न कंट्रीज से प्रभावित है, जो तमाम राजनीतिक प्रक्रिया को बेहद जटिल बना देता है। ऐसे में किसी भी छोटे देशों के पास दो ही विकल्प बचते हैं, एक विकल्प की वो लोकतांत्रिक पद्धति अपनाकर धीरे धीरे विकास करे या फिर तेज विकास के लिए लोकतंत्र का त्याग कर दे।

AUNG SAN SU KI

मिलिट्री शासन की पाकिस्तान में आलोचना

पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासन है। मगर, बगैर सेना की मंजूरी के वहां कोई भी पार्टी सरकार नहीं चला सकती है। पाकिस्तान में कई बार सैन्य तानाशाह सरकार को बर्खास्त कर मिलिट्री राज कायम कर चुके हैं। पाकिस्तानी अखबार 'द डॉन' ने म्यांमार में मिलिट्री शासन को लेकर चिंता जाहिर की है। 'द डॉन' ने पाकिस्तान में लगाए गये कई मिलिट्री शासन का हवाला देते हुए लिखा है कि म्यांमार में सैन्य शासन लगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक विचार को कमजोर करता है।

पाकिस्तानी अखबार ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए लिखा है कि विकासशील देशों में अकसर सेना असंवैधानिक तरीके से चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर देती हैं। हालांकि, रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर म्यांमार की नेता आंग सान सू की पाकिस्तानी अखबार में आलोचना भी की गई है। पाकिस्तानी अखबार ने लिखा है कि कई सालों के संघर्ष के बाद आंग सान सू की ने म्यांमार में लोकतंत्र बहाल किया था मगर रोहिंग्या मुसलमानों के कत्लेआम पर उन्होंने सेना का साथ दिया। हालांकि, बावजूद इसके तत्काल सेना को चाहिए कि चुनी हुई सरकार के हाथ में फिर से सत्ता की बागडोर सौंपे।
पाकिस्तानी अखबार 'द डॉन' का कहना है कि म्यांमार कई सारी धार्मिक और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है मगर इसे सुलझाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है और वो है लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण वातावरण में बातचीत करना। अगर म्यांमार में सैनिक शासन बना रहता है तो ये म्यांमार के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा।

पाकिस्तानी अखबार ने पूरी दुनिया की सरकारों से अपील करते हुए लिखा है कि जल्द से जल्द म्यांमार को लेकर दखल दिया जाए और वहां फिर से लोकतंत्र बहाल करने के लिए म्यांमार के नेताओं को जरूरी मदद दी जाए।

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