अमेरिका की घरेलू राजनीति का भारत पर असर नहीं, यूक्रेन और अन्य देशों के लिए क्या हैं मायने?
अगर बाइडेन मध्यावधि चुनाव में नुकसान उठाते हैं और इस पर ट्रंप समर्थित रिपब्लिकन का नियंत्रण होता है तो इससे ईरान परमाणु समझौते को फिर से जीवत करने की उम्मीदें धराशायी हो सकती हैं। अमेरिका में मिड टर्म पोल के नतीजे आने शु
अमेरिका के (America) मिड-टर्म इलेक्शन (Mid Term Election) यानी मध्यावधि चुनाव का भारत समेत दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह जानने वाला विषय है। हालांकि, भारत को डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों का समर्थन प्राप्त है। इसलिए नई दिल्ली को इस संबंध में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। वहीं, इससे यूक्रेन की फंडिंग पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को इसको लेकर ज्यादा सोचने की जरूरत पड़ सकती है। वह इसलिए क्योंकि अभी अमेरिका में जो बाइडेन की सरकार है जो डेमोक्रेट से आते हैं।

अमेरिकी चुनाव के मायने
अगर बाइडेन मध्यावधि चुनाव में नुकसान उठाते हैं और इस पर ट्रंप समर्थित रिपब्लिकन का नियंत्रण होता है तो इससे ईरान परमाणु समझौते को फिर से जीवत करने की उम्मीदें धराशायी हो सकती हैं। अमेरिका में मिड टर्म पोल के नतीजे आने शुरू हो गए हैं। इससे पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन के राजनीतिक भविष्य को भी निर्धारित करेगा।

कौन जीतेगा, डेमोक्रेट या रिपब्लिकन
अभी तक जो चुनावी नतीजे आए हैं इससे बाइडेन को ट्रंप पटखनी देते हुए नजर आ रहे हैं। फिर भी डेमोक्रेट कांग्रेस के दोनों सदनों में अपने बहुमत को बनाए रखने के लिए जी तोड़ मेहनत की है। अब वहां की जनता यह तय करेगी की 2024 में वे फिर से किसे राष्ट्रपति के तौर पर देखना पसंद करेंगे। बाइडेन को या फिर ट्रंप को। वर्तमान में डेमोक्रेटिक पार्टी के पास सदन में कुल 435 सीटों में से 220 और सीनेट में 50 सीटें हैं। वहीं, चुनाव के बाद अमेरिकी सीनेट में भारी बदलाव के आसार नजर आ रहे हैं।

कौन होगा प्रभावित?
वहीं, अमेरिका के घरेलू राजनीति के लिए एक सदन या फिर दोनों सदनों पर किसी भी पार्टी का नियंत्रण के क्या मायने हो सकते हैं? दुनिया के देशों खासकर भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।आईए जानने की कोशिश करते हैं।

भारत के लिए अमेरिका की घरेलू राजनीति
हमने शुरूआत में ही कह दिया था कि अमेरिका के इस मध्यावधि चुनाव का भारत पर को प्रभाव नहीं छोड़ने वाला है। डेमोक्रेट या फिर रिपब्लिकन, कोई भी पार्टी की सरकार बने या फिर बहुमत मिले, भारत में ज्यादा कुछ बदलने की उम्मीद नहीं है। जैसा कि आईएएनएस के संवाददाता यशवंत राज ने अपने लेख में उल्लेख किया है, अमेरिका-भारत संबंधों को डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के बीच व्यापक द्विदलीय समर्थन प्राप्त है।

भारत को फर्क नहीं पड़ेगा
एक प्रमुख अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) में भारत के अध्यक्ष रिचर्ड रोसो ने बताया कि, "अमेरिका के मध्यावधि चुनाव का अमेरिका-भारत संबंधों पर सीधा प्रभाव नहीं होना चाहिए। हालांकि, असैन्य परमाणु सहयोग जैसे बड़े सौदे के लिए विधायी समर्थन की आवश्यकता होती है। बाकी अन्य रिश्तों के लिए किसे के समर्थन की कोई आवश्यकता नहीं है।

भारत का दोनों पार्टी से अच्छे संबंध
उदाहण के तौर पर, जब बराक ओबामा की सरकार थी तब पाकिस्तान को एफ-16 को बेचने की अमेरिकी योजना को विफल कर दिया गया था। इसके अलावा,जब नई दिल्ली ने रूस से 5 बिलियन डॉलर से अधिक के हथियार खरीदे थे तब डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने भी भारत पर काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए) प्रतिबंध नहीं लगाए थे।

यूक्रेन के लिए अमेरिका की घरेलू राजनीति
यूक्रेन की बात की जाए तो अमेरिका की घरेलू राजनीति वर्तमान में देश को काफी प्रभावित कर सकता है। वह इसलिए क्योंकि रूस ने जब से यूक्रेन पर हमला किया है तब से लेकर अब तक अमेरिका उसे सैन्य सहायता देता जा रहा है। व्हाइट हाउस ने यूक्रेन को समर्थन देने की कसम खाई है। बाइडेन ने कहा है कि अमेरिका यूक्रेन को हरसंभव सहायता प्रदान करता रहेगा। ऐसे में अगर बाइडेन को चुनाव में नुकसान उठाना पड़ता है तो इसका सीधा असर उसको मिलने वाली सहायता पर पड़ेगा। रूस के साथ जंग लड़ने के लिए उसे अत्याधुनिक हथियार चाहिए जो अमेरिका समय-समय पर उसे मुहैया कराता रहता है। इसके अलावा और अन्य सहायता भी बाइडेन की सरकार उसे प्रदान करती रहती है।












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