क्या भारत के साथ संबंधों को धीरे-धीरे बर्बाद कर रहे बाइडेन? 18 महीने से भारत में US राजदूत नहीं

अगर आपको पता चले, कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से तीन क्वाड सम्मेलन और दो द्विपक्षीय वार्ता करने वाले अमेरिका ने पिछले 18 महीने से अपना राजदूत भारत नहीं भेजा है, तो आप हैरान हो जाएंगे।

वॉशिंगटन/नई दिल्ली, जून 22: क्या अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भारत और अमेरिका के बीच मजबूत होते रिश्ते को धीमे जहर से खत्म करने को ठान लिया है? ये सवाल इसलिए हैं, क्योंकि बाइडेन प्रशासन ने कार्यभार संभालने के बाद एक तरफ तो एशिया में भारत को अपना सबसे बड़ा भागीदार बताया है, जबकि बाइडेन प्रशासन जो कदम उठा रहा है, वो ना सिर्फ भारत विरोधी हैं, बल्कि भारतीय नागरिकों के मन में अमेरिका को लेकर शक पैदा कर रहा है, कि क्या अमेरिका पर विश्वास करना चाहिए?

18 महीने से राजदूत नहीं

18 महीने से राजदूत नहीं

अगर आपको पता चले, कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से तीन क्वाड सम्मेलन और दो द्विपक्षीय वार्ता करने वाले अमेरिका ने पिछले 18 महीने से अपना राजदूत भारत नहीं भेजा है, तो आप हैरान हो जाएंगे। जी हां, जब से जो बाइडेन प्रशासन ने कार्यभार संभाला है, तबसे अमेरिका का राजदूत भारत में नहीं है और बाइडेन प्रशासन का भारत को लेकर रूख क्या है, ये बताने के लिए ये काफी है। क्या ऐसा होता है, कि अपने सबसे करीबी भागीदार देश में आपका राजदूत ही ना हो? पिछले 18 महीने से भारत में अमेरिकी राजदूत का पद खाली पड़ा है। अमेरिका स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, यह "अब तक का सबसे लंबा पीरियड" है, जहां भारत को अमेरिका से कोई राजदूत नहीं मिला है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत की अनुपस्थिति ने राजनयिक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित नहीं किया है, और कहा कि यह "सर्वश्रेष्ठ रूप नहीं" है।

राजदूत को लेकर सबसे लंबा गैप

राजदूत को लेकर सबसे लंबा गैप

सीएसआईएस में यूएस-इंडिया पॉलिसी स्टडीज में वाधवानी चेयर रिचर्ड रोसो द्वारा तैयार किए गए एक ग्राफ के अनुसार, भारत में अमेरिकी राजदूतों ने आमतौर पर अपने पूर्ववर्तियों के प्रस्थान के छह से सात महीने के भीतर पदभार ग्रहण किया है। इसका मतलब यह है कि पिछले 18 महीने से भारत में अमेरिकी राजदूत का ना होना, भारत और अमेरिका के संबंधों में 'खाई' को दर्शाता है। करीब तीन महीने पहले कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था, कि जो बाइडेन की पसंद और लॉस एंजिल्स के मेयर एरिक गार्सेटी भारत में राजदूत बनकर आ सकते हैं, लेकिन फिर बात आगे नहीं बढ़ी। पिछले अमेरिकी दूत केनेथ जस्टर का कार्यकाल जनवरी 2021 में समाप्त हो गया था। तब से, चार अंतरिम दूत हुए हैं, जिन्हें आधिकारिक तौर पर चार्ज दिया गया है। लेकिन, अभी तक स्थाई राजदूत अमेरिका से भारत नहीं आया है।

राजदूत का होना सबसे ज्यादा जरूरी?

राजदूत का होना सबसे ज्यादा जरूरी?

रिचर्ड रोसो के अनुसार, नौकरशाही और राजनयिक प्रक्रियाओं को सुचारू करने के लिए एक राजदूत का होना अत्यंत आवश्यक है। द प्रिंट से बात करते हुए रोसो ने एक ईमेल के जरिए बताया कि, ' राजदूत के नहीं होने से भारत से हमें बातचीत करने में कठिनाई हो सकती है और नये पॉलिसी बनाने में या फिर दोनों देशों के बीच किसी नये अनुबंध पर पहुंचने की शुरूआत भी राजनयिक स्तर से ही होते हैं'। भारत और अमेरिका और नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के बीच राजनयिक संबंध 1 नवंबर 1946 को स्थापित हुए थे, जब अमेरिकी विदेश विभाग ने नई दिल्ली में अमेरिकी मिशन को एक दूतावास के रूप में स्थापित किया।

भारत के खिलाफ अनावश्यक बयानबाजी

भारत के खिलाफ अनावश्यक बयानबाजी

एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति पिछले 18 महीनों से यह तय नहीं कर पाए हैं, कि वो भारत में किसे राजदूत बनाकर भेजें, दूसरी तरफ अमेरिका की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जा रही है, जिसके जवाब में अब भारत की तरफ से भी जवाब दिया जाने लगा है और जियो पॉलिटिक्स के जानकार इसे सही नहीं मान रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, पिछले कुछ महीनों से अमेरिका ने लगातार अल्पसंख्यकों के मुद्दे से लेकर मानवाधिकार के मुद्दे पर भारत के खिलाफ बयानबाजी की है। वहीं, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद राष्ट्रपति बाइडेन तक भारत की खुली आलोचना कर चुके हैं, लिहाजा रणनीतिक भागीदार होने के बाद भी भारत के मन में अमेरिका को लेकर शक पैदा हो रहा है और भारतीय नागरिक बार बार 1971 का हवाला देकर अमेरिका पर शक कर रहे हैं, जिसमें यूएस ने भारत के खिलाफ अपना एयरक्राफ्ट भेज दिया था।

पाकिस्तान पर यूएस का डबल गेम

पाकिस्तान पर यूएस का डबल गेम

इमरान खान जब तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे, तब तक अमेरिका ने पाकिस्तान में अपना राजदूत नहीं भेजा, लेकिन जैसे ही इमरान खान पद से हटे, फौरन अमेरिका ने डेविड लूम को अपना राजदूत बनाकर पाकिस्तान भेज दिया। वहीं, अमेरिका अब पाकिस्तान को लेकर जिन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है, और जिस तरह से पाकिस्तान को अपना भागीदार बता रहा है, उसने भारत को एक बार फिर से अमेरिका को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया है और भारतीय विदेस मंत्री एस. जयशंकर के बयान से ये जाहि होता भी है। भारतीय विदेश मंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि, पाकिस्तान को अमेरिका ने समर्थन दिया है, इसीलिए वो भारत के खिलाफ समस्याओं को पैदा कर रहा है। भारतीय विदेश मंत्री का इशारा साफ तौर पर बाइडेन प्रशासन पर भी है, जिसमें पिछले महीने ही पाकिस्तानी विदेश मंत्री को अमेरिका बातचीत के लिए बुलाया था।

आतंकवाद पर अमेरिका को दोहरा रवैया

आतंकवाद पर अमेरिका को दोहरा रवैया

एक तरफ अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई और ज़ीरो टॉलरेंस की बात करता है, दूसरी तरफ उसने आतंकवाद के सबसे बड़े पालक देश पाकिस्तान को भी समर्थन देना शुरू कर दिया है, जिसको लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने आपत्ति जताई है। इमरान खान के सरकार से जाते ही अब पाकिस्तान के एफएटीएफ से बाहर निकलने की चर्चाएं शुरू हो गईं हैं और एक्सपर्ट पूछ रहे हैं, कि भला सत्ता संभालने के बाद पिछले दो महीने में शहबाज शरीफ ने आतंकवाद के खिलाफ ऐसा कौन सा तीर मारा है, कि एफएटीएफ को अचानक पाकिस्तान एक 'शांत बच्चा' दिखने लगा है।

पाकिस्तान को फिर बनाएगा दोस्त?

पाकिस्तान को फिर बनाएगा दोस्त?

व्हाइट हाउस ने पिछले हफ्ते भी अपने बयान में कहा था, कि 'पाकिस्तान हमारा भागीदार है और हम उस साझेदारी को नये तरीके से बढ़ाने के तरीकों की तलाश करेंगे, जो हमारे हित में है।' लिहाजा, भारत के लिए सतर्क होना जरूरी है, क्योंकि अमेरिका ने हमेशा से भारत के खिलाफ यही खेल खेला है, जिसमें उसने पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराए हैं, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ हुए हैं। लिहाजा अब एक्सपर्ट्स सवाल पूछने लगे हैं, कि क्या बाइडेन प्रशासन भारत के साथ रिश्ते को धीमा जहर देकर मारने में लगा है?

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