ब्रिटेन-जर्मनी में कोरोना वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल शुरू, 80 फीसदी सफलता की उम्मीद

लंदन/बर्लिन। ब्रिटेन और जर्मनी में आज से इंसानों पर कोरोना वायरस (कोविड-19) के खिलाफ तैयार की गई वैक्सीन का ट्रायल शुरू होने जा रहा है। इस समय वैक्सीन को लेकर बेशक 150 परियोजनाएं चल रही हैं लेकिन जर्मनी और ब्रिटेन दुनिया के उन पांच देशों में शामिल हैं जिन्हें क्लिनिकल ट्रायल की इजाजत मिल चुकी है। ब्रिटेन का ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय 510 स्वास्थ्य लोगों और जर्मनी का फेडरल इंस्टीट्यूट 200 स्वास्थ्य लोगों पर कोरोना के वैक्सीन का परीक्षण करेंगे।

दुष्परिणामों का अलग से परीक्षण होगा

दुष्परिणामों का अलग से परीक्षण होगा

जिन लोगों पर इसका ट्रायल किया जाएगा उन्हें 18 साल से 55 साल की श्रेणी में रखा गया है। ट्रायल के दौरान वैक्सीन की अलग-अलग किस्म को अलग-अलग लोगों को देकर यह देखा जाएगा कि ये वायरस को खत्म करने में कितना कारगर है। इसके साथ ही बाद में इसके दुष्परिणामों का भी अलग से परीक्षण किया जाएगा। ब्रिटेन के हेल्थ सेक्रेटरी मैट हैनकॉक का कहना है कि यह वैक्सीन कोरोना वायरस से लड़ने का एकमात्र कारगर तरीका है।

सफलता की 80 फीसदी संभावना

सफलता की 80 फीसदी संभावना

ऑक्सफोर्ड की शोध निदेशक प्रोफेसर सारा गिल्बर्ट ने अनुमान लगाया है कि वैक्सीन के सफल होने की लगभग 80 फीसदी संभावना है। ऑक्सफोर्ड टीम के एक सदस्य का कहना है कि अगर ये परीक्षण सफल होते हैं, तो इस साल शरद ऋतु तक उपयोग के लिए लाखों वैक्सीन उपलब्ध हो सकते हैं। ब्रिटेन के हेल्थ सेक्रेटरी मैट हैनकॉक ने कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय इस वैक्सीन को तैयार करने के लिए सबकुछ करने को तैयार है। क्योंकि यह कोरोना वायरस महामारी से लड़ने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। हैनकॉक ने आगे कहा कि अगले फेज की तैयारी के लिए ब्रिटिश सरकार इंपीरियल कॉलेज लंदन को वैक्सीन पर रिसर्च करने के लिए 22.5 (210 करोड़ से ज्यादा) मिलियन पाउंड देगी।

वैक्सीन पर टिकीं सबकी निगाहें

वैक्सीन पर टिकीं सबकी निगाहें

उन्होंने आगे कहा, 'वैसे तो वैक्सीन को तैयार करने में वर्षों का समय लग जाता लेकिन ब्रिटेन इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे खड़ा है। हमने किसी भी देश की तुलना में इसकी वैक्सीन ढूंढ़ने के लिए सबसे अधिक पैसे खर्च किए हैं। इससे ज्यादा जरूरी और कुछ नहीं हो सकता है। वैक्सीन का उत्पादन ट्रायल और गलतियों के लिए ही होता है लेकिन ब्रिटेन इसका पुख्ता इलाज पाने के लिए कुछ भी देने को तैयार है।'

जर्मनी ने अमेरिकी कंपनी के साथ मिलकर बनाई वैक्सीन

जर्मनी ने अमेरिकी कंपनी के साथ मिलकर बनाई वैक्सीन

वहीं जर्मनी की बायोटेक कंपनी बायो एन टेक ने अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर के साथ मिलकर संयुक्त रूप से वैक्सीन का निर्माण किया है। इस वैक्सीन का नाम BNT162 रखा गया है। पहले चरण के बाद वैक्सीन के दूसरे चरण के परीक्षण में वैक्सीन का इस्तेमाल उन लोगों पर किया जाएगा जिनके कोरोना संक्रमित होने की ज्यादा आशंका है। गौरतलब है कि दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक इस वायरस का वैक्सीन बनाने में जुटे हैं। लेकिन अभी तक कहीं से भी कोई राहत की खबर सामने नहीं आई है।

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