बिहार से जाकर यूक्रेन में बसे राकेश शंकर की कहानी
"यहां हर घंटे पर साइरन बजता है तो हम बंकर में चले जाते हैं या बच्चों को लेकर घर के किसी कोने में चला जाता हूं. मैं उन्हें अपने शरीर से ऐसे कवर कर लेता हूं कि अगर हमला हो और मुझे कुछ हो भी जाए तो मेरे बच्चे सुरक्षित रहें".ये शब्द हैं राकेश शंकर के जो मूलतः भारत के बिहार राज्य के सहरसा ज़िले के रहने वाले हैं. वो रूसी भाषा सीखने के लिए साल 2015 में यूक्रेन गए थे.

एक साल की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाक़ात यूक्रेन में रहने वाली अक्साना से हुई. दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई. उन्होंने कोर्ट मैरिज की और अब उनके दो बच्चे हैं.
राकेश यूक्रेन में अनुवादक का काम करते हैं और रूसी, जापानी, फ़्रेंच समेत कई अन्य भाषाओं के जानकार हैं.
यूक्रेन पर रूस के हमले को कई दिन हो गए हैं और कई शहरों में भीषण लड़ाई जारी है. देश के उत्तर, पूर्व और दक्षिण में जंग छिड़ी है और दक्षिणी शहर ख़ेरसोन के मेयर का कहना है कि शहर पर अब रूस के सैनिकों का नियंत्रण है.
कैसे कर रहे हैं सुरक्षा?
राकेश शंकर का कहना है कि उनके शहर में लोग सेना के लिए खाना बना रहे हैं और कपड़े दे रहे हैं. साथ ही अपनी सुरक्षा के लिए सड़कों के किनारे बड़े-बड़े गढ्ढे खोद कर उन पर लोहे का जाल लगा रहे हैं ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसमें छिपा जा सके.
युद्ध में होने वाली परेशानियों की बात करते हुए राकेश कहते हैं, ''ये लड़ाई लंबी चलेगी. ऐसे में पैसों की तकलीफ़ बढ़ सकती है क्योंकि हम बैंक से पैसे भी निकाल नहीं पा रहे हैं. हम लोग पेट भरने लायक़ ही सामान इकट्ठा कर रहे हैं ताकि भूखे ना रहना पड़े.''
पुराने दिनों को याद करते हुए राकेश भावुक हो जाते हैं. वो कहते हैं, "वे बहुत अच्छे दिन थे, यूक्रेन ख़ूबसूरत देश है. यहां के लोग प्यारे हैं. अब यहां तबाही का मंज़र है. पहले हम अक्सर ही घूमने निकलते थे, लेकिनअब कहीं नहीं जा सकते, अब बच्चों को लेकर कुछ देर के लिए बचते हुए बाहर निकलता हूं ताकि उनका मन बहला सकूं."वो आगे कहते हैं कि ''बच्चों का ध्यान बंटाने के लिए वे उन्हें कार्टून दिखाते हैं, पेंटिंग्स बनाने के लिए कहते हैं. लेकिन उनका बेटा ये बात समझता है कि पुतिन ने देश पर हमला कर दिया है. बेटी छोटी है इसलिए उसे कुछ नहीं पता. वैसे तो हमारी कोशिश रहती है की बच्चों का ध्यान बंटा रहे.''
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हालात तनावपूर्ण
यूक्रेन की राजधानी कीएव से द्नेप्र शहर की दूरी लगभग 650 किलोमीटर है तो वहीं खारकीएव से द्नेप्र की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है.
राकेश कहते हैं, "मेरे ससुर अभी खारकीएव में हैं. वहाँ स्थिति बेहद तनावपूर्ण है. उनके गांव पर रूसी सेना का क़ब्ज़ा हो चुका है."
राकेश बहुत दुखी होते हुए बताते हैं कि इस जंग में उन्होंने अपने 10 से 12 दोस्तों को खो दिया है जिनके साथ उनकी बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं.संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यूक्रेन पर हमले के कारण अभी तक लगभग 10 लाख लोग पलायन कर चुके हैं और पड़ोसी देशों में शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं.
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यूक्रेन क्यों नहीं छोड़ रहे
राकेश शंकर से हमने पूछा कि क्या वो यूक्रेन से बाहर निकलने के बारे में नहीं सोच रहे हैं. इस पर उनका जवाब था, "बाहर हालात ज़्यादा ख़राब हैं. ऐसी स्थिति में अभी हम पोलैंड तक भी नहीं जा सकते . दो बच्चों को लेकर जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं है. पोलैंड के बॉर्डर पर लाखों लोग खड़े हैं. मैं अपने छोटे बच्चों को लेकर लाइन में कब तक लगा रहूंगा अगर वहां कुछ बुरा हो जाए तो? फ़्लाइट्स की टिकट इतनी महँगी है कि मैं अपने परिवार के लोगों का ये ख़र्च भी नहीं उठा सकता."
वो आगे बताते हैं कि उन्हें अनुवाद का काम मिलना बंद हो गया है और ऐसे में घर का ख़र्चा चलाना भी मुश्किल हो गया है. वो बताते हैं कि उनके पिता बिहार में हैं और माँ भाई के साथ दिल्ली में रहती हैं.
राकेश ने कहा कि उनके परिवार वाले उनसे लौटने के लिए कह रहे हैं, लेकिन ये आसान नहीं है.
राकेश शंकर हालात बेहतर होने पर अपने अपने बच्चों के साथ बिहार जाना चाहते हैं ताकि वो उन्हें बिहार दिखाएं और वो जगह जहां उनका बचपन बीता था.
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