चीन की सेना पर मंडराया अबतक का सबसे बड़ा संकट, दशकों तक उबरना नामुमकिन
बीजिंग, 30 मई: चीन के सातवें राष्ट्रीय जनगणना, 2020 के मुताबिक वह अबतक के सबसे बड़े डेमोग्राफिक संकट का सामना कर रहा है। पिछले 10 वर्षों में उसकी आबादी सिर्फ 5.38 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है। चीन का जन्म दर 2017 से लगातार गिर रहा है, जबकि इस संकट को भांपते हुए वह पहले ही वन-चाइल्ड पॉलिसी में ढील दे चुका है। अब आबादी की रफ्तार थमने के चलते सबसे बड़ी मार चीन की सेना पर पड़ने लगी है, जिसे हर साल हजारों की तादाद में ऐसे गर्म खून वाले युवा चाहिए, जो मुश्किल हालातों में भी पीएलए के लिए हथियार थामे रह सकें। लेकिन, जिस तरह से वहां फर्टिलिटी रेट में कमी आ चुकी है, यह स्थिति जल्दी सुधरना लगभग नामुमकिन लग रहा है। हालांकि, वहां के मिलिट्री एक्सपर्ट लंबे वक्त से आने वाले संकट की घंटी बजा रहे थे, लेकिन शायद इसे भांपने में कुछ ज्यादा ही देर हो चुकी है।

पीएलए कहां से लाएगा सैनिक ?
नई जनगणना के बाद चीन में फर्टिलिटी रेट घटने के बाद चीन की सेना पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के सामने बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। चीन की सेना दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री है और उसे हर साल हजारों की तादाद में नए सैनिकों की भर्ती करनी पड़ती है। लेकिन, इसी महीने जारी चीन की जनगणना से पता चलता है कि पिछले साल वहां सिर्फ 1.20 करोड़ बच्चों का ही जन्म हुआ है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक 1961 के भयानक अकाल के बाद यह तादाद सबसे कम है। चीन ने पहले ही महसूस कर लिया था कि उसकी वन-चाइल्ड पॉलिसी आने वाले वक्त में भारी पड़ने वाली है और 2016 में ही उसने इस नीति में ढील देकर अपने लोगों को दूसरा बच्चा पैदा करने की भी इजाजत दी भी थी, लेकिन लगता है कि इसके बावजदू जन्म दर में इजाफा नहीं हो पा रहा है। चीन में वन-चाइल्ड पॉलिसी 1979 में लागू की गई थी और 2016 में उसे हटा लिया गया था।

चीन में फर्टिलिटी रेट सिर्फ 1.3 है
2020 के जनगणना से पता चलता है कि वहां प्रति महिला फर्टिलिटी रेट 1.3 बच्चे हैं। जबकि चीन को स्थाई आबादी के लिए 2.1 के फर्टिलिटी रेट की दरकार है। मिलिट्री एक्सपर्ट एंटनी वोंग टोंग का कहना है कि कई सैन्य अधिकारियों और पर्यवेक्षकों ने 1993 से मिलिट्री पर वन-चाइल्ड पॉलिसी के पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जतानी शुरू कर दी थी। 2012 में पीएलए नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लियु मिंग्फु ने चेतावनी दी थी कि पीएलए के कम से कम 70 फीसदी सैनिक एक-बच्चे वाले परिवारों से हैं और लड़ाके सैनिकों की बात करें तो यह संख्या 80 फीसदी तक पहुंच जाती है। वोंग ने कहा कि 'हम देख सकते हैं कि पिछले दशकों में पीएलए ने ज्यादा महिला सैनिकों की भर्ती की है- असल में जो विकसित देश नए खून की कमी झेल रहे हैं, उनमें यह पॉपुलर ट्रेंड है।' डेमोग्राफी के प्रोफेसर जियांग क्वांबाओ ने कहा है कि वन-चाइल्ड पॉलिसी के दौरान लड़का पैदा करने के लिए लिंग की पहचान करके गर्भपात कराने जैसे कदमों की वजह से भी यह संकट अब भयावह शक्लि अख्तियार कर चुका है।

ट्रेनरों की भी बढ़ चुकी है टेंशन
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने एक्सपर्ट के हवाले से बताया कि असल चुनौती पीएलए के आधुनिकीकरण में लगे प्रशिक्षकों और नियोक्ताओं के सामने खड़ी हो रही है। उनके लिए सैनिकों की नई ब्रीड को ट्रेंड करना बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा है। बीजिंग स्थित एक थिंक टैंक के एक शोधकर्ता झू चेन्मिंग का कहना है, 'मिलिट्री इंस्ट्रक्टर्स ने पाया है कि पिछली शताब्दी में जो सख्त और कठोर प्रशिक्षण का तरीका अपनाया जाता था, वह 21वीं सदी में पैदा हुए ज्यादातर युवा सैनिकों पर काम नहीं कर पाता है।'चीन की मीडिया के मुताबिक चीन की सेना अब इन्हें तैयार करने के लिए सिर्फ आदेश और डांट-फटकार के भरोसे ही नहीं रह गई है, इसे भी 2011 के बाद से इनके लिए प्रोफेशनल साइकोथेरेपिस्ट बुलाने पड़ रहे हैं और थेरेपी सेशन का आयोजन करना पड़ रहा है, ताकि उनके तनाव दूर किए जा सकें।

फिजिकल फिटनेस भी है बहुत बड़ी समस्या
इससे पहले 2000 से चीन की सेना ने जबसे अपनी भर्ती नीति बदली उसे पहले से ही एक चुनौती झेलनी पड़ रही थी। उसने किसानों के बच्चों को भर्ती करने की बजाय उन ग्रामीण युवाओं पर फोकस करना शुरू किया था, जिनकी शिक्षा का स्तर ऊंचा हो। लेकिन,इसके बाद उसे ऐसे सैनिकों के फिजिकल फिटनेस की दिक्कत सामने आने लगी। चीन की सेना ने 2009 में सबसे ज्यादा भर्ती की थी, जब उसने 1,20,000 से ज्यादा कॉलेज ग्रैजुएट को शामिल किया था। 1949 के बाद से यह सबसे ज्यादा भर्ती थी, क्योंकि तब उसे एडवांस्ड एंड सॉफिस्टिकेटेड वेपन सिस्टम चलाने किए ऐसे सैनिकों की दरकार अचानक से पड़ गई थी।












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