यूनाइटेड नेशंस को संबोधित करना चाहता है तालिबान, क्या आतंकी संगठन को दी जाएगी बोलने की 'आजादी'?
तालिबान ने यूनाइटेड नेशंस से अपनी बात रखने की मांग की है। तालिबान ने अफगान सरकार के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि को मान्यता देने से इनकार कर दिया है।
काबुल, सितंबर 22: तालिबान को काबुल पर कब्जा किए हुए एक महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है और वैश्विक समुदाय ने तालिबान की सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। लेकिन, तालिबान चाहता है कि वो यूनाइटेड नेशंस जनरल एसेंबली को संबोधित करे। इसके लिए तालिबान ने अपने राजनयिक के नाम की घोषणा भी कर दी है। तालिबान ने अपने प्रवक्ता मोहम्मद सुहैल शाहीन को चुना है। लेकिन, सवाल उठता है कि बंदूक के दम पर अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाले और अफगानिस्तान के लोगों की आजादी छीन लेने वाले तालिबान को यूनाइटेड नेशंस में बोलने की आजादी दी जाएगी?

वैश्विक मंच पर बोलना चाहता है तालिबान
तालिबान, बतौर अफगानिस्तान की सरकार के नाते संयुक्त राष्ट्र में बोलना चाहता है। अफगानिस्तान की युद्धग्रस्त भूमि के नए शासक तालिबान ने अब इस सप्ताह के संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) सत्र में प्रतिनिधित्व की मांग की है, और तालिबान ने अफगानिस्तान की पूर्व सरकार द्वारा नियुक्त संयुक्त राष्ट्र के स्थायी प्रतिनिधि को मान्यता देने से इनकार कर दिया है और तालिबान ने संयुक्त राष्ट्र के एक नए स्थायी प्रतिनिधि कते तौर पर मोहम्मद सुहैल शाहीन को चुना है, जो जो कभी कतर में शांति वार्ता के दौरान इस आतंकवादी संगठन का प्रवक्ता था। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय निकाय की उच्च स्तरीय बैठक को लेकर अफगानिस्तान के पूर्व संयुक्त राष्ट्र दूत और तालिबान शासकों के बीच एक राजनयिक लड़ाई शुरू होने की उम्मीद है।

तालिबान शासन को देखता वैश्विक समुदाय
अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार को मान्यता देने के संबंध में किसी निर्णय पर आने से पहले दुनिया अफगानिस्तान के नए शासकों के हर एक कदम को करीब से देख रही है। जबकि वैश्विक समुदाय तालिबान को मान्यता देने जल्दी में नहीं है। अब संयुक्त राष्ट्र के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या क्या तालिबान को अपने विचारों को सामने रखने के लिए वैश्विक स्तर पर एक मंच प्रदान किया जाना चाहिए? और यदि हां, तो उस मंच को किस हद तक विद्रोहियों की अभिव्यक्ति की आजादी की अनुमति देनी चाहिए या उस पर अंकुश लगाना चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि, जिस तरह से विश्व के नेता इस प्रश्न को चुनते हैं, वह अफगानिस्तान के संयुक्त राष्ट्र के पूर्व दूत और देश के इस्लामी शासकों द्वारा वैश्विक मंच के लिए सामने रखे गए नए प्रतिनिधि के बीच किसे चुनेगा?

यूनाइटेड नेशंस को दो चिट्ठी
संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक के अनुसार, महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को वर्तमान में मान्यता प्राप्त अफगान राजदूत गुलाम इसाकजई से 15 सितंबर को एक विज्ञप्ति मिली, जिसमें यूनाइटेड नेशंस के 76 वें वार्षिक सत्र के लिए अफगानिस्तान के प्रतिनिधिमंडल की सूची थी। पांच दिन बाद, गुटेरेस को "अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात, विदेश मामलों के मंत्रालय" के साथ एक और लेटरहेड मिला, जिसपर तालिबान के नये विदेश मंत्री "अमीर खान मुत्ताकी" ने हस्ताक्षर किया था। जिसमें विश्व नेताओं की संयुक्त राष्ट्र सभा में भाग लेने का अनुरोध किया गया था।

पूर्व राजनयिक को हटाने का दावा
तालिबान द्वारा भेजी गई इस नई विज्ञप्ति में, तालिबान ने दावा किया कि इसाकजई अब अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व नहीं करता है क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी को इस साल 15 अगस्त तक "बर्खास्त" कर दिए गए थे और दुनिया भर के देश "अब उन्हें राष्ट्रपति के रूप में मान्यता नहीं देते हैं"। इन घटनाक्रमों के बीच तालिबान ने कहा कि वे मोहम्मद सुहैल शाहीन को संयुक्त राष्ट्र के नए स्थायी प्रतिनिधि के रूप में नामित कर रहे हैं। जिसके बाद अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि यूनाइटेड नेशंस क्या तालिबान के द्वारा नामित नये प्रतिनिधि को मान्यता देगा या नहीं? पैनल के एक अधिकारी ने नाम न छापने की सख्त शर्त के तहत एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि संयुक्त राष्ट्र की समिति को "विचार-विमर्श करने में कुछ समय लगेगा"। अधिकारी ने कहा है कि तालिबान के अनुरोध पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह तय है कि महासभा के इस सत्र में तालिबान के प्रतिनिधि को अपनी बात रखने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

27 सितंबर को अफगानिस्तान का भाषण
यूनाइटेड नेशंस जनरल एसेंबली के उच्च स्तरीय बैठक के अंतिम दिन यानि, 27 सितंबर को अफगानिस्तान का भाषण देने का नंबर है। लेकिन, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि अगर समिति की बैठक हुई और तालिबान को अफगानिस्तान की सीट दी गई, तो कौन बोलेगा? तालिबान का प्रतिनिधि बोलेगा या फिर अफगानिस्तान की पूर्व सरकार द्वारा नियुक्त स्थाई प्रतिनिधि? संयुक्त राष्ट्र में सीटों के विवाद के मामलों में, आधिकारिक प्रोटोकॉल कहता है कि निर्णय लेने के लिए महासभा की नौ सदस्यीय प्रमाण-पत्र समिति की बैठक होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय निकाय ने कहा कि दोनों पत्र महासभा अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद के कार्यालय से परामर्श के बाद समिति को भेजे गए हैं। समिति के सदस्य संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, बहामा, भूटान, चिली, नामीबिया, सिएरा लियोन और स्वीडन हैं, जिसे फैसला लेना है कि तालिबान के प्रतिनिधि को बोलने को बोलने का मौका दिया जाना चाहिए, या फिर पूर्व सरकार के प्रतिनिधि को।
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