अमेरिका-ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में छोड़े 8500 करोड़ डॉलर के हथियार, अब तालिबान को हराना नामुमकिन- रिपोर्ट

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका और ब्रिटेन ने 85 अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियार अफगानिस्तान में छोड़कर तालिबान को इतना शक्तिशाली बना दिया है, कि अब उसे दुनिया का कोई भी देश नहीं जीत सकता है।

काबुल, अगस्त 30: 15 साल पहले जब ब्रिटिश सैनिकों को अफगानिस्तान के हेलमंद में तैनात किया गया था, तो उस वक्त तालिबानी लड़ाकों के पास पहनने को कुछ फटे कपड़े और हथियार के नाम पर दशकों पुरानी रूसी राइफलों और ग्रेनेड लांचर होते थे, जबकि ब्रिटिश सैनिक अत्याधुनिक मशीन गन, नाइट विजन गॉगल्स समेत तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस थे। तालिबान के पास विदेशी सेना से लड़ने का बस एक ही ऑप्शन था, गोरिल्ला वार, लेकिन आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे...कि नये तालिबान के पास दुनिया के 85 प्रतिशत देशों से ज्यादा ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर हैं।

अब तालिबान हो गया अपराजेय!

अब तालिबान हो गया अपराजेय!

जंगल और पहाड़ों की कंदराएं तालिबान के लिए कवच का काम करती थी। तालिबान के लिए जंगल का हर एक इंच 'ग्रीन जोन' की तरफ था और तालिबान के लड़ाकों को ना तो खाने के लिए अच्छा खाना मिलता था और ना ही लड़ाई की कोई ट्रेनिंग मिली थी। लिहाजा, चंद सालों में ही नाटो की सेना ने अफगानिस्तान के हर प्रमुख इलाकों से तालिबान को भगा दिया। हजारों तालिबानी लड़ाके मारे गये....लेकिन, 21 साल के बाद खेल बदल चुका है और अब तालिबान इतना ताकतवर हो चुका है, कि उसे हराना किसी के लिए भी नामुमकिन है।

6 खरब 25 करोड़ के हथियार हाथ लगे

6 खरब 25 करोड़ के हथियार हाथ लगे

अमेरिकी सेना अब अफगानिस्तान से जा चुकी है। ब्रिटिश अभियान अब अफगानिस्तान में बंद हो चुका है और अब जब आप अफगानिस्तान की वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश करते हैं, तो पता चलता है कि तालिबान को अमेरिका और ब्रिटेन से करीब 62 अरब पाउंड यानि 85 अरब डॉलर के हथियार मिले हैं। यानि, नया तालिबान काफी ज्यादा अत्याधुनिक हथियारों से लैस है....उसके पास इतने हथियार हैं, जितने शायद पाकिस्तान के पास ना हो, अब तालिबानी लड़ाकों को पुराने कपड़े पहनने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

21 साल बाद बदल गया तालिबान

21 साल बाद बदल गया तालिबान

तालिबानी लड़ाकों को अब पुराने रूसी हथियारों और ग्रेनेड के भरोसे नहीं रहना होगा। कुल मिलाकर कहें, तो नये तालिबान को हराना इस दुनिया के लिए नामुमकिन हो गया है। तालिबान के लड़ाकों के हाथ में अब पुराने एक-47 नहीं दिख रहे हैं और अब तालिबान के लड़ाके टेलिस्कोपिंग स्टॉक के साथ यूएस ग्रीन बेरेट-इश्यू M4 कार्बाइन के साथ देखे जा रहे हैं। 15 साल पहले के तालिबान शायद ही कभी हेलमेट पहने देखे जाते थे। लेकिन आज उनके हेडवियर आम तौर पर ब्रिटिश सैनिकों द्वारा पहने जाने वाले हेडवियर की तुलना में ज्यादा महंगे और ज्यादा उन्नत हैं।

अत्याधुनिक हथियारों से लैस लड़ाके

अत्याधुनिक हथियारों से लैस लड़ाके

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक अब ऐसा लह रहा है कि तालिबान ने अमेरिकी ग्रीन बेरेट्स द्वारा समर्थित अत्याधुनिक MBITR-2 (मल्टी-बैंड इंट्राटेम रेडियो) का इस्तेमाल करने के लिए खुद को ढाल लिया है। डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबानी लड़ाकों के हाथ में जो हथियार अब देखे जा रहे हैं, वो पूरी तरह से साफ होते हैं और ऐसा लगता है कि जैसे उस हथियार से काफी प्रैक्टिस की गई है। तालिबानी लड़ाकों की वर्दी अब किसी प्रोफेशनल आर्मी की वर्दी की तरफ धुली होती है और उसपर आयरन किया गया होता है। और सबसे खास बात ये...कि तालिबान के लड़ाके अब जिस तरह से हथियार ले जाते हुए दिखाई देते हैं, ऐसा लगता है कि जैसे ब्रिटिश आर्मी हथियार ले जा रही हो।

तालिबान ने कैसे हासिल की जीत?

तालिबान ने कैसे हासिल की जीत?

ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी ने कहा कि 'मैं उनके नये रूप से काफी प्रभावित हूं और ऐसा लग रहा है कि ये नया लुक सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि उन हथियारों को चलाने का काफी अंदाजा भी उन्हें हो गया है'। ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ने कहा कि पहले की स्थिति के विपरीत अब तालिबान के लड़ाकों के पास लड़ाई लड़ने की प्लानिंग होती है, उनका मनोबल अब काफी ऊंचा हो गया है, अब उनके पास काफी खतरनाक और अत्याधुनिक हथियार आ गये हैं और इसीलिए वो जीत रह हैं। लेकिन, सवाल ये उठता है कि अमेरिका और ब्रिटेन ने तालिबान को इतना मजबूत क्यों बना दिया?

तालिबान को मजबूत करने गया था अमेरिका?

तालिबान को मजबूत करने गया था अमेरिका?

अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने देश के टैक्सपेयर्स के पैसों से अफगानिस्तान में पहले से काफी ज्यादा खतरनाक, उग्र, शातिर और अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित तालिबान का निर्माण कर दिया है। इसके साथ ही तालिबान ने अपने लड़ाकों को अब रैंक देना भी शुरू कर दिया है। विडंबना ये है कि तालिबान के हाथ जो हथियार लगे हैं, वो हथियार अफगानिस्तान की सेना के लिए दिए गये थे और उन हथियारों की मदद से अफगान सेना को तालिबान रोकना था। कुछ विशेषज्ञ अमेरिका के इस दावे पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं, कि क्या बस यही मकसद है?

85% देशों से ज्यादा ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर

85% देशों से ज्यादा ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर

अमेरिकी रिपब्लिकन कांग्रेसी जिम बैंक्स, जिन्होंने तालिबान को लेकर इतनी जानकारियां जुटाई हैं, उन्होंने खुलासा किया है कि तालिबान के पास अब 'दुनिया के 85 प्रतिशत देशों से ज्यादा ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर' हैं। इसके अलावा तालिबान ने अफगानिस्तान की सुरक्षा का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक कलेक्शन और उसकी पहचान करने वाले तमाम उपकरण भी प्राप्त कर लिए हैंस जो उन्हें गठबंधन बलों के लिए काम करने वाले अफगानों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं, जिनमें से कई देश में फंसे हुए हैं और तालिबान द्वारा बंधक बनाए जा सकते हैं। अफगानिस्तान में हथियारों की आपूर्ति के प्रभारी अधिकारी के रूप में सेवा करने वाले बैंक्स ने कहा कि, 'जो बाइडेन प्रशासन की लापरवाही के कारण तालिबान के पास अब 85 अरब डॉलर, यानि 62 अरब पाउंड यानि 6 खरब 25 करोड़ रुपये के अत्याधुनिक हथियार हैं। उन्होंने कहा कि 'विडंबना ये है कि अमेरिका की कोई योजना नहीं है कि वो तालिबान ये ये हथियार वापस लें या फिर बायोमेट्रिक मशीन ही हासिल करे'।

अमेरिका की गलती भुगतेगी दुनिया

अमेरिका की गलती भुगतेगी दुनिया

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने स्वीकार किया कि उनके पास इस बात की 'पूरी तस्वीर' नहीं है कि अब दुश्मन के हाथों में गायब सैनिक लिस्ट का कितना हिस्सा हो सकता है।'' ब्रिटेन के रक्षा सचिव बेन वालेस ने माना है कि सैनिकों के घर लौटने के बाद कुछ ब्रिटिश सैन्य उपकरण अफगानिस्तान में छूट गये हैं। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इसमें से कोई भी 'घातक' या 'संवेदनशील' नहीं होगा। लेकिन उनका ये दावा पूरी तरह से झूठा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इनमें से छोटी-छोटी सैन्य गाड़ियां काफी आसानी से वापस ब्रिटेन भेजी जा सकती थी। लेकिन, ब्रिटेन ने ना तो बेबस मददगार अफगानों को काबुल से बाहर निकालने में दिलचस्पी दिखाई और ना ही घातक हथियार तालिबान के हाथ में ना जाए, इसकी कोई कोशिश की।

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