तालिबान का पहला मास्टरस्ट्रोक! सरकार गठन समारोह में अमेरिका के 6 'दुश्मनों' को भेजा न्योता

अमेरिका के 6 दुश्मनों को एक साथ सरकार गठन समारोह में बुलाकार तालिबान ने बड़ी डिप्लोमेटिक चाल चली है।

काबुल, सितंबर 06: तमाम अटकलों के बीच तालिबान ने सरकार बनाने की तैयारी शुरू कर दी है और तालिबान ने कहा है कि सरकार बनाने की प्रक्रिया अंतिम मोड़ पर पहुंच चुकी है और जल्द ही तालिबान की सरकार का ऐलान कर दिया जाएगा। तालिबान ने सरकार बनाने के लिए अपने यार देशों को न्योता भेजना शुरू कर दिया है और उन्हें तालिबान की सरकार के समारोह में शामिल होने का आग्रह भेजा गया। रिपोर्ट है कि तालिबान सरकार बनाने के लिए बड़े कार्यक्रम का आयोजन करेगा और संदेश देने की कोशिश करेगा कि उसकी सरकार पहले जैसी नहीं होने वाली है।

समारोह में आएंगे तालिबान के 6 'यार'

समारोह में आएंगे तालिबान के 6 'यार'

अफगानिस्तान से आ रही रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने उन 6 देशों को अपनी सरकार के निर्माण के समारोह में शामिल होने के लिए न्योता भेजा है, वो सभी के सभी अमेरिका के दुश्मन हैं। पंजशीर घाटी पर करीब-करीब कब्जा जमाने के बाद तालिबान ने सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने पाकिस्तान, चीन, ईरान, तुर्की, कतर और रूस को निमंत्रण भेजा है। जाहिर है, तालिबान की लिस्ट देखने से ही साफ जाहिर होता है कि इन्हीं देशों ने तालिबान का पूरा साथ दिया है और इन्हीं देशों की बदौलत तालिबान आज अफगानिस्तान पर कब्जा करने में कामयाब हो पाया है। तालिबान इन देशों के साथ दोस्ती को मजबूत करना चाहता है, ताकि वो सरकार चला सके, क्योंकि यूरोपीयन यूनियन के साथ कई देशों ने कह दिया है कि वो तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं देंगे।

पाकिस्तान तालिबान की यारी

पाकिस्तान तालिबान की यारी

पाकिस्तान और तालिबान की यारी हर कोई जानता है। 1996 में बनी तालिबान की पहली सरकार को भी पाकिस्तान की तरफ से मान्यता दी गई थी और इस बार भी पाकिस्तान तालिबान की सरकार को मान्यता देने वाला है। पिछले 20 सालों से तमाम तालिबानी नेताओं को पाकिस्तान ने ही पाला-पोसा है। खुद पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख रशीद समेत कई बड़े पाकिस्तानी नेता सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर चुके हैं कि तालिबान पाकिस्तान का ही हिस्सा है और एक दिन पहले भी पंजशीर पर पाकिस्तानी एयरफोर्स की मदद से ही तालिबान ने कब्जा करने में कामयाबी हासिल की है। अमेरिका समेत अरब देशों से पाकिस्तान ने अरबों रुपये लिए और उन पैसों से पाकिस्तान ने आतंकियों को पालने का काम किया। लिहाजा अब जब पाकिस्तान का अफगानिस्तान में छद्म युद्ध कामयाब हो गया है, तो तालिबान ने पाकिस्तान को न्योता भेजा है और माना जा रहा है कि पाकिस्तान के बड़े नेता तालिबान की सरकार के समारोह में शामिल होंगे।

तालिबान के साथ खड़ा रहा चीन

तालिबान के साथ खड़ा रहा चीन

अफगानिस्तान में तालिबान लगातार कब्जा करता गया और चीन खामोश रहा। इसीलिए चीन को भी तालिबान ने न्योता भेजा है। तालिबान के आतंकी खेल को चीन का पूरा समर्थन हासिल रहा। तालिबान को सरकार चलाने के लिए पैसों की जरूरत है और चीन ने तालिबान के लिए अपने बैंक का खाता खोल दिया है। तालिबान ने चीन को अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भागीदारी निभाने का न्योता भी भेजा है, जिसे चीन स्वीकार कर चुका है। अफगानिस्तान की जमीन में अरबों रुपये के दुर्लभ खनीजों पर चीन की नजर है, लिहाजा चीन चाहता था कि अफगानिस्तान में तालिबान ही सत्ता में आए। तालिबान का प्रवक्ता बता चुका है कि तालिबान को चीन की तरफ से आर्थिक मदद हासिल होगी। वहीं, चीन अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ भी करना चाहता है, लिहाजा चीन के लिए अफगानिस्तान काफी महत्वपूर्ण है।

तुर्की-तालिबान संबंध

तुर्की-तालिबान संबंध

तालिबान को लेकर तुर्की कभी सहज नहीं रहा है, लेकिन रिपोर्ट है कि पाकिस्तान ने 'मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई' का हवाला देकर तुर्की को तालिबान के समर्थन में आने के लिए मना लिया। वहीं, तालिबान चाहता है कि काबुल एयरपोर्ट की रक्षा की जिम्मेदारी एक बार फिर से तुर्की संभाल ले। वहीं, तालिबान को लालच है कि अगर उसे तुर्की का साथ मिलता है तो उसे टेक्नोलॉजी में मदद मिलेगी। हालांकि, तालिबान को लेकर अभी तक तुर्की ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन माना जा रहा है कि पाकिस्तान की वजह से तुर्की आगे जाकर तालिबान का समर्थन कर सकता है।

कतर के साथ कीमती रिश्ता

कतर के साथ कीमती रिश्ता

तालिबान का अगर कोई सबसे अच्छा दोस्त रहा है तो वो कतर रहा है। पिछले कई सालों से कतर में ही तालिबान का आधिकारिक ऑफस रहा है, जहां से वो अमेरिका और दूसरे देशों के साथ लगातार बातचीत करता रहा है। कतर ने तालिबान का काफी साथ दिया है और कतर की राजधानी दोहा में ही तालिबान ने अमेरिका के साथ शांति समझौता पर दस्तखत किया था और फिर वही शांति समझौता होने के बाद तालिबान ने एक बार फिर से अफगानिस्तान पर कब्जा करने की जमीन तैयार की। ऐसे में माना जा रहा है कि कतर भी तालिबान के साथ आ सकता है।

ईरान के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते

ईरान के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते

ईरान शिया बहुल देश है और तालिबान कट्टन सुन्नि मुस्लिमों का संगठन। तालिबान की पिछली सरकार के दौरान ईरान और तालिबान के संबंध अच्छे नहीं थे, लेकिन इस बात तालिबान को लेकर ईरान ने नरम रूख अपनाया है। वहीं, पड़ोसी देश होने की वजह से तालिबान इस बार ईरान के साथ अच्छे संबंध बनाकर रखना चाहता है। खासकर पेट्रोल के लिए तालिबान ईरान पर ही निर्भर है। चूंकी ईरान और तालिबान का सामूहिक दुश्मन अमेरिका है, लिहाजा पिछले 20 सालों में तालिबान ने ईरान के साथ अपने संबंधों को काफी मजबूत कर लिया है। माना जाता है कि गनी सरकार को हटाने में ईरान ने तालिबान की काफी मदद की है और तालिबान के पास ईरानी ड्रोन भी देखे गये हैं। लिहाजा ईरान को भी तालिबान ने इस बार न्योता भेजा है।

रूस को न्योता, होगा समझौता?

तालिबान ने रूस को भी समारोह कार्यक्रम में न्योता दिया है और तालिबान चाहता है कि रूस की तरफ से उसकी सरकार को मान्यता मिले। रूस और अमेरिका में छत्तीस का नाता शुरू से ही रहा है और अफगानिस्तान दोनों ही देशों के लिए युद्ध का मैदान रह चुका है, वहीं, उज्बेक विद्रोहियों को खामोश करने के लिए भी तालिबान चाहता है कि उसे रूस का साथ मिले। लेकिन, रूस ने फिलहाल तालिबान की सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। भारत में रूस के राजदूत ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा

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