तालिबान ने TTP पर पाकिस्तान को कुछ भी ठोस आश्वासन नहीं दिया
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ गई हैं कि इससे उसके यहाँ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान मज़बूत होगा. जानिए तालिबान ने क्या कहा?
तालिबान ने पाकिस्तान के चरमपंथी समूह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर कहा है कि यह पाकिस्तान का मुद्दा है और उसका अफ़ग़ानिस्तान से कुछ लेना देना नहीं है. तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने पाकिस्तानी समाचार चैनल जियो न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में यह बात कही है.
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जियो न्यूज़ के 'जिरगा' कार्यक्रम में एंकर सलीम साफ़ी ने मुजाहिद से पूछा था कि क्या तालिबान TTP को यह कहेगा कि वो पाकिस्तान की सरकार के ख़िलाफ़ जंग न करे. इस पर मुजाहिद ने कहा कि 'ये लंबी बहस है और मेरे ख़याल में यह पाकिस्तान का मसला है. और होना ये चाहिए कि पाकिस्तानी जनता, प्रशासन और धर्मगुरु इस पर कोई निर्णय लें क्योंकि ये मामला हमारा नहीं है.'"ये मामला अफ़ग़ानिस्तान नहीं बल्कि पाकिस्तान से संबंधित है इसलिए इस पर कुछ करने की योजना भी पाकिस्तान ही बनाए."
तालिबान ने और क्या कहा
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मुजाहिद ने इसके साथ ही कहा कि 'भविष्य की सरकार इस बारे में अधिकार से कुछ कह सकेगी. हालांकि, हमारे सिद्धांत हैं कि हम अपनी ज़मीन को किसी भी देश की शांति भंग करने के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे.' एंकर सलीमा साफ़ी ने उनसे दोबारा सवाल किया कि अगर TTP अफ़ग़ान तालिबान को अपना नेता मानती है तो 'उन्हें उनकी बात सुननी होगी, चाहे वो बात उन्हें पसंद हो या न हो.' इस पर तालिबान प्रवक्ता मुजाहिद ने कहा, "TTP के मुद्दे से पाकिस्तान को निपटना है न कि अफ़ग़ानिस्तान को. पाकिस्तान, पाकिस्तानी उलेमा और उसकी जनता को उनकी जंग की वैधता पर और उनकी जवाबी रणनीति तैयार करने पर फ़ैसला लेना है."
कौन हैं पाकिस्तान तालिबान?
तहरीक-ए-तालिबान यानी पाकिस्तान तालिबान की स्थापना दिसंबर 2007 में 13 चरमपंथी गुटों ने मिलकर की थी. TTP का मक़सद पाकिस्तान में शरिया पर आधारित एक कट्टरपंथी इस्लामी शासन क़ायम करना है.
पाकिस्तान तालिबान का पाकिस्तान की सेना से टकराव बना रहता है. कुछ वक़्त पहले संगठन के प्रभाव वाले इलाक़े में पट्रोलिंग कर रहे एक पुलिसकर्मी को बुरी तरह पीटने की ख़बर सामने आई थी. साल 2014 में पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर हुई गोलीबारी में क़रीब 200 लोगों की जान चली गई थी, जिनमें ज़्यादातर छात्र थे. इस घटना के लिए TTP को ज़िम्मेदार बताया जाता है.
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पाकिस्तान साल 2014 से TTP के ठिकानों को ध्वस्त करता रहा है. लेकिन पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर मौजूद इलाक़ों में TTP का ख़ासा प्रभाव है. ये माना जाता है कि TTP के ज़्यादातर सदस्य अफ़ग़ानिस्तान में हैं और वहीं से सीमा पार हमलों की योजना बनाते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में कब तक बन सकती है सरकार?
राजधानी काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े को दो सप्ताह से भी अधिक का समय हो चुका है लेकिन वहां पर किसी भी प्रकार की कोई सरकार अभी तक नहीं बनी है. मुजाहिद से पूछा गया कि कब तक एक सरकार का गठन अफ़ग़ानिस्तान में हो सकता है? तो इस सवाल पर उन्होंने कहा कि इसको लेकर पूरी कोशिशें जारी हैं लेकिन कुछ छोटी मुश्किलों के कारण इसमें देरी आई है. उन्होंने कहा, "सबसे पहली बात यह है कि जब हम काबुल में दाख़िल हुए और प्रशासन को अपने हाथों में लिया यह बिल्कुल अप्रत्याशित था क्योंकि हम सरकार का गठन करने से पहले एक लंबी बातचीत चाहते थे ताकि एक मज़बूत सरकार बन सके."
इसके साथ ही मुजाहिद ने संकेत दिए कि तालिबान की इच्छा है कि 'युद्ध का अंत' हो और 'यहां पर हर किसी की राय और लोगों की इच्छा को दिखाने वाले सिस्टम का गठन हो.' उन्होंने कहा, "हमने इस दिशा में काफ़ी प्रगति की है लेकिन अभी भी काम जारी है. सरकार के हर पहलू पर चर्चा हो रही है और उम्मीद है कि तालिबान कुछ ही दिनों में इस मुद्दे पर घोषणा करेगा." मुजाहिद ने यह भी कहा कि इसमें देरी की वजह से रोज़ाना की गतिविधियों और व्यापार और कूटनीति जैसे मुद्दों में भी बाधा आ रही इसलिए तालिबान ने 'जल्द से जल्द एक सरकार के गठन को लेक सभी कोशिशें शुरू कर दी हैं.'
पंजशीर घाटी पर क़ब्ज़े को लेकर क्या कहा
पंजशीर घाटी ऐसी जगह है, जहाँ पर तालिबान अब तक नियंत्रण नहीं जमा पाया है और वहाँ पर उसे तालिबानी विरोधी बलों का सामना करना पड़ा है. यह बल अहमद मसूद के नेतृत्व में नेशनल रेसिस्टेंट फ़्रंट के बैनर तले लड़ रहे हैं जिसमें पूर्व सैनिक और स्थानीय लड़ाके शामिल हैं. मुजाहिद का इस पर कहना था कि तालिबान को '60 फ़ीसदी भरोसा है कि ये सभी मामले बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं.' उन्होंने कहा, "हमने यह संभव बनाने के लिए सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया है. हमने उलेमा और पूर्व जिहादी नेताओं से बात की है और लगातार संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है."
मुजाहिद को उम्मीद है कि यह मामला युद्ध की ओर नहीं जाएगा. उनको लगता है कि तालिबान ने बाक़ी अफ़ग़ान ज़िलों और प्रांतों को जिस तरह से 'बिना ताक़त का इस्तेमाल किए' क़ब्ज़े में लिया है वो इसे भी ले लेंगे. उन्होंने कहा, "हमें उम्मीद है कि पंजशीर काबुल के नियंत्रण में आ जाएगा जैसे कि वह आया है. इस तरह वहां के लोगों का सम्मान बरक़रार रहेगा और हम उन्हें सम्मान देंगे."
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तालिबान प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने बताया कि पंजशीर और तालिबान के नेताओं के बीच जो संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है, उससे साफ़ होता है कि वे युद्ध नहीं चाहते हैं. उन्होंने कहा, "अगर युद्ध भी होता है तो वो बहुत तेज़ी से होगा क्योंकि हमारे लड़ाके पंजशीर के चारों ओर हैं." उन्होंने बताया कि तालिबान लड़ाके बदख़शां, पग़मान और तखारो परवान में तैनात हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राजनेताओं से क्या बात हुई
तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण के बाद अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, पूर्व चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव ऑफ़िसर डॉक्टर अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ पूर्व उप राष्ट्रपति यूनुस क़नूनी और अब्दुल राशिद दोस्तम से भी बातचीत की है. इन राजनेताओं से मिलने का तालिबान का क्या मक़सद रहा है? इस सवाल पर तालिबान के प्रवक्ता मुजाहिद ने बताया कि इनसे कुछ राय ली गई है. उन्होंने कहा कि तालिबान चाहता है कि सरकार में वो लोग हों जिनको लोगों का समर्थन रहा है और काफ़ी चर्चा में रहते आए हैं लेकिन वो उन लोगों को शामिल करने को नज़रअंदाज़ करेंगे जो पिछले संघर्षों के केंद्र में रहे हैं.
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मुजाहिद ने बताया, "काबुल में मौजूद हम सभी नेताओं से चर्चा कर रहे हैं. हम उनके संपर्क में हैं और उनकी सलाह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है." उन्होंने यह भी बताया कि तालिबान की यह भी इच्छा है कि सरकार में 'नए चेहरे' उसका हिस्सा बनें. उनसे यह भी पूछा गया कि किस पक्ष ने अपनी क्या मांग सामने रखी है तो इस सवाल पर तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि राजनेताओं ने जो भी सलाह दी है उसको ध्यान में रखते हुए समूह आगे बढ़ेगा और उसको ध्यान में रखकर ही क़दम उठाए जाएंगे.
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