भुखमरी के कगार पर था भारत, तब चीन के इस दुश्मन मुल्क ने की मदद, अब 150 देशों का पेट भरता है देश
भारत अपने चावल से लगभग आधी दुनिया का पेट भरता है। बीते साल भारत ने दुनिया भर में कुल 150 देशों को 21.5 मिलियन मीट्रिक टन चावल निर्यात किया था। यह पूरी दुनिया में सबसे अधिक था।
नई दिल्ली, 18 जुलाईः भारत अपने चावल से लगभग आधी दुनिया का पेट भरता है। बीते साल भारत ने दुनिया भर में कुल 150 देशों को 21.5 मिलियन मीट्रिक टन चावल निर्यात किया था। यह पूरी दुनिया में सबसे अधिक था। दूसरे नंबर पर मौजूद वियतनाम दूसरा सबसे बड़ा चावल निर्यातक था, जिसने बीते साल दुनिया भर में लगभग 6.5 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया था।

भुखमरी के कगार पर था देश
चावल निर्यात करने वाले दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच निर्यात के इस भारी अंतर से आप समझ सकते हैं कि भारत चावल के बाजार में किस कदर अपना दबदबा रखता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब हमारे देश में खाने भर का चावल नहीं होता था। हमारा देश अपना पेट भरने के लिए दुनिया के बड़े देश की ओर देखते थे। कभी किसी अमेरिकी अखबार में भारत को भिखारियों का देश कहना भी खूब चर्चित हुआ था। आजादी के बाद ये स्थिति थी कि भारत अक्सर सूखे का सामना करता था। इस कारण फसल की उपज नहीं हो पाती है और कई जगहों पर अकाल पड़ना सामान्य बात मानी जाती थी।

ताइवान ने की मदद
ऐसे ही विपरीत समय में भारत की मदद के लिए ताइवान सामने आया था। ताइवान, का चीन से रिश्ता वैसा ही है जैसा भारत का चीन से। खैर 60 के दशक की बात है जब भारत अन्न के संकट से जूझ रहा था। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक उस वक्त यहां देश में लंबे तने वाली धान की पारंपरिक किस्में ही हुआ करती थीं। देश में अधिकतम प्रति एकड़ आठ एकड़ धान की पैदावार हुआ करती थी। ऐसे समय में हमें बौनी किस्म की ऐसी प्रजाति की जरूरत थी जो ज्यादा पैदावार दे। ऐसे में हमारी इस जरूरत को पूरा करने के लिए ताइवान सामने आया।

वैज्ञानिकों ने डेवलप की नई किस्म
ताइवान ने अपनी धान की प्रजाति ताइचुंग नेटिव-1 भारत को दी। यह कृषि के क्षेत्र में भारत को दी गई एक बड़ी मदद थी। इसके अलावा ताइवान ने भारत को चावल की एक अन्य बौनी किस्म आईआर-8 इरी भी दी। इससे भारत में चावल का खूब उत्पादन बढ़ा। साल1969 में ही हमारे वैज्ञानिकों ने इन दोनों प्रजातियों से हाइब्रिडाइजेशन (संकरण) करना शुरू किया। ओडिशा की किस्म टी-141 का ताइचुंग नेटिव-1 से हाइब्रिडाइजेशन करके जया (JAYA) नाम का धान तैयार किया गया। इसका तना 150 सेंटीमीटर से घटकर 90 का हो गया जबकि उत्पादन लगभग दोगुना यानी करीब 18 क्विंटल प्रति एकड़ हो गया। यह सिलसिला आगे जारी रहा और 80 के दशक तक हम अपने खाने भर का चावल पैदा करने लगे।

धान की खेती में आत्मनिर्भर बना देश
भारत चावल के उत्पादन में अब दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह गया। हमारा देश दुनिया में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और नंबर एक एक्सपोर्टर है। भारत का चावल निर्यात 2021 में रिकॉर्ड 21.5 मिलियन टन को छू गया, जो दुनिया के अगले चार सबसे बड़े अनाज निर्यातकों: थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और संयुक्त राज्य अमेरिका के संयुक्त शिपमेंट से भी अधिक है। चीन के बाद दुनिया के सबसे बड़े चावल उपभोक्ता भारत की वैश्विक चावल व्यापार में 40 प्रतिशत से अधिक की बाजार हिस्सेदारी है। उच्च घरेलू स्टॉक और कम स्थानीय कीमतों के कारण भारत ने पिछले दो वर्षों में भारी छूट पर चावल का निर्यात किया है। इससे एशिया और अफ्रीका के कई गरीब देशों में कई लोगों को गेहूं की बढ़ती कीमतों से जूझने में मदद मिली है।

3 अरब लोगों का पेट भरता है भारत
भारत 150 से अधिक देशों को चावल का निर्यात करता है और इसके शिपमेंट में किसी भी तरह की कमी खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकती है। भारत द्वारा निर्यात किया गया अनाज 3 अरब से अधिक लोगों का पेट भरता है। लगभग डेढ़ दशक पहले 2007 में जब भारत ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था तो वैश्विक कीमतें शिखर पर पहुंच गईं थीं। भारत से निर्यात को प्रतिबंधित करने का कोई भी कदम चावल आयात करने वाले लगभग हर देश को प्रभावित करेगा।












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